शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

रात की गोद मे चाँद आकर गिरा

 









बर्फ की आग से दग्ध चन्दन हुये 
खो गये शब्द लब थरथराते रहे,
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.

एक सूखी नदी फिर सरस हो गयी 
नेह की इक घटा जो बरस कर गयी,
मन पिघलते रहे भीग जाते रहे.
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.

मधुरस उडेलती गूंजती बांसुरी
मधुबनी तान पे झूमती पैंजनी,
गीत के बोल पर सुर सजाते रहे.
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.

प्राण के अर्थ अब हो गये है नये
प्रात होता नही अब किरन फूटते,
यौवन के नये अर्थ पाते रहे. 
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.