मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

यह जाडे की धूप है या "तुम".









अलसाये सकुचाये
गुलाबी ताप के टुकडे,
क्षोभमंडल पार से
उतरते है मुझ पर
और फैलते जाते है
सिंकते है रोम रोम,
पिघलती है उर्मियाँ
बिंधती है कोशिकायें
ऊष्मा की सुइयों से,
मीठी चुभन से सराबोर
देह गुनगुनाती है
एक जंगली गीत,
मै अक्सर भ्रम मे
पड जाता हूँ
कि,
यह जाडे की धूप है
या "तुम".