रविवार, 14 अक्तूबर 2012

कार्तिक की पियराई सांझ











अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ ।

लौटे वंशी के स्वर 
बन की गंध समेटे  
सिंदूरी बादल से 
चम्पई हुयी दिशाएं 
हलधर  के हल पर उतरी 
थकी हुयी मटमैली सांझ।

मन्दिर मे बजते शंख  
भीनी सी उठती आरती,
खेतों में फुलवारी मे  
फूटी है कस्तूरी ,
तुलसी के दिये पर उतरी 
झिलमिल करती उजियारी सांझ।

सोना उतरा है 
धान के खेत मे,
चाँदी झरने लगी   
चंदा की धूल से,
अलसाये हुये ताल में उतरी  
सिहराती रतनारी सांझ।

अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ।