मंगलवार, 4 सितंबर 2012

दरिया होने का दम भरते तो है सनम, लेकिन डूबेगे अंजुरी भर पानी मे

पूर्वकथन्:मै यह पोस्ट  नही लिखना चाहता था पर मन मार कर जबरदस्ती लिख रहा हू केवल अपना पक्ष रखने के लिये. और लोगो के भ्रम समाप्ति के पश्चात इसे डिलीट कर दूंगा.

@क्षद्म आलोचना को अपनी अभिव्यक्ति का धार बनाने वाले एक प्रबुद्ध साहित्यकार हैं डॉ रूप चंद शास्त्री मयंकजो आधारहीन बातें करके सुर्खियां बटोर रहे हैं आजकल । आगत अतिथियों का स्वागत करके आयोजकों के फोटो को दिखाकर यह साबित करना चाह रहे हैं कि आयोजक गण सम्मानित हो रहे हैं । वहीं कानपुर के डॉ पवन कुमार मिश्र ने तो मुझपर गंभीर आरोप ही लगा दिया कि मैंने पैसे लेकर सम्मान दिया है । और भी कई तथ्यहीन आरोप हैं, उपरोक्त दोनों पोस्ट का स्नेप शॉट ले लिया गया है, कानून के विशेषज्ञों से वार्ता की जा रही है । शीघ्र ही कार्यवाही की प्रक्रिया होगी । 

रवीन्द्र जी मैने कोई आरोप नही लगाये है ये कुछ डाऊट्स थे आप उस पर अपनी स्पष्ट राय रख सकते थे किंतु ऐसा न हुआ.स्वतंत्र ब्लाग अकादमी बनाने का आज भी मै विरोध करूंगा माना कि आप ईमानदार है किंतु सब आप की तरह नही होंगे. फिर जो स्थिति होगी उसका जिम्मेदार कौन होगा? रही बात शास्त्री जी की तो बडो की कडवी बातो को भी आदर के साथ लिया जाना चाहिये. दरिया बनने का दावा करते है तो अपनी आलोचनाओ से इस तरह उखड गये कि "कानूनी कार्यवाही" की धमकी देने लगे. जरा अपने साथियो की भी अभद्र भाषा का ध्यान कर लीजियेगा.उनके साथ कैसे निपटेगे लगे हाथ यह भी बता दीजियेगा.

हम तो दरिया है अपना हुनर रखते है. दरिया का हुनर कहने से नही आ जाता. एक आलोचनात्मक कथन से  तूफान आ गया. आप दरिया है या क्या है ये आप नही तय करेगे ये आपके गुण और प्रकृति तय करती है. कोर्ट कचहरी हमारे लिये कोई इश्यू नही है इश्यू है कि जो खुद को दरिया होने का दावा करता है वह इतना उसकी मानसिकता ऐसी भी  हो सकती है सोचा न था. रही बात कुछ आपके ब्लागर मित्र मुझसे  एकाध कार्यक्रम के आयोजन की चुनौती दे रहे थे  तो जानकारी के लिये बता दू कि मैने  नेशनल सेमिनार सहित अनेको संगोष्ठिया और अकादमिक सांस्कृतिक कार्यक्रमो का आयोजन किया है. ना विश्वास हो तो ज़ाकिर भाई से पूछ लीजिये वह आपके मित्र है तो मेरे भी मित्रो मे एक है वह आपको सच बतायेगे. मै अपना यशोगान नही करना चाहता यह मुझे अत्यधिक ओछा कृत्य लगता है इसीलिये मैने भाई कृष्ण कुमार जी को भी टोका था.
बहरहाल आपके लिये एक गज़ल पेश कर रहा हू. गौर कीजियेगा...


जरा कुछ देर ठहरो तुम अभी तो बात बाकी है,
सितारे और टूटेंगे अभी तो रात बाकी है .

तुम्हारे एक इशारे पर सुना शोले दहकते है,
मगर देखो की आँखों में अभी बरसात बाकी है.

जमाने भर में चर्चा है की तुम व्यापार करते हो,
मेरे हाथो में अब भी प्यार की सौगात बाकी है.

खुदगर्जी की मूरत हो मझे मालूम है लेकिन,
तुम्हारे वास्ते मेरे अभी जज्बात बाकी है.

बना लो दूरिया कितनी हमारे दरमियानो में, 

मुकद्दर कह रहा है कि  अभी कुछ साथ बाकी है.

बस्स अंत मे यही कहूंगा कि चाद तारो की दूरी तय करने से पहले दिलो की दूरी तय कीजिये." घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,पहले यह तय हो कि इस घर को बचाये कैसे"

शुभकामनाओ के साथ 
डा पवन कुमार मिश्र
कानपुर.