बुधवार, 9 मई 2012

लो आज नारीवाद का अंतिम संस्कार किये देता हू

आज मै नारीवाद के अंतिम संस्कार के उपलक्ष मे समस्त नारीवादियो को पिंड प्रदान करता हू सभी (काकस्वरूप मे भी आ सकते है ) का आमंत्रण  है. वैतरणी के दर्शन और रौरव नरक से झटपट मुक्ति मिलेगी गऊदान का भी झंझट भी नही है.

तो अब मै मंतर मारना चालू करता हू.
नारीवादियो का ब्रम्हवाक्य... नारी पैदा नही होती बनायी जाती है. इस सूक्त की रचयिता को दूर से प्रणाम. सिमोन डि बोवार(फ्रांसीसी)  द्वारा कहित इसी सेंटेंस ने बमचक काट रखा है. पहले इसी को लत्ता करते है. ऐक्चुअली मे एक अपराधशास्त्री हुए थे लोम्ब्रोसो(इटली वाले). उन्होने अपराध करने का प्रारूपवादी सिद्धांत दिया था जिसके अनुसार शरीर की बनावट के आधार पर अपराधी की पहचान की जाती थी. इस सिद्धांत का खंडन दूसरे अपराधशास्त्री सदरर्लैंड(अमेरिका वाले) ने अपराध का समाजशास्त्रीय सिद्धांत दिया और एक वाक्य की रचना की अपराधी पैदा नही होते बनाये जाते है. अब सिमोन ने इस वाक्य को देखा दिमाग की बत्ती जली और तुरंत ब्रम्हवाक्य गढ दिया. सुधी पाठक दोनो वाक्य देखे तो स्पष्ट हो जायेगा कि चोट्टिन सिमोन ने सदरर्लैंड के वाक्य का अपराधी हटा कर नारी जोड दिया.  अब क्या था लहर चल गयी. पर सिमोन कही न कही लेडी मैक्बेथ ग्रंथि की शिकार हो गयी और जा गिरी ज्या पाल सार्त्र (ये भी फ्रांसीसी) की गोदी मे. कहानी खतम.

लेकिन साप के जाने के बाद असली कहानी लकीर पीटने वाले/वालियो की है. इन लकीरपिटवो से मै पूछना चाहता हू क्या नारी महज सामाजिक या सांस्कृतिक शब्द ही है. क्या यह जैविक नही है. उनके शरीर की बनावट और उसमे हार्मोंस का अलग अलग होना नारी और पुरुष होने के लिये जिम्मेदार नही है. पौरुष के लिये जिम्मेदार टेस्टोरान हारमोन   शरीर को कडा और टफ बनाता है आवाज भारी करता है. इसके विपरीत् एस्ट्रोजेन कोमलता और पतली आवाज के लिये जिम्मेदार है जो नारीत्व का निर्माण करता है.  मतलब नारी पैदा होती है.
नारीवाद का दूसरा और भयंकर दौर शुरु होता है केटी मिलर के अभ्युदय से. इन्होने अंत:वस्त्रो को नारीपरतंत्रता से जोडकर देखा और समस्त नारियो को अंत:वस्त्र मुक्त होने की सलाह दी खूब अंत:वस्त्रो की होलिया जली. लोगो ने जमकर लुत्फ लिया. इन्होने खुली बहस के लिये मरद जात को चुनौती दी. एक मेयर नाम के सज्जन ने चुनौती कबूल की और बहस शुरु हुयी.  नगर की सारी जनता इस बहस को सुनने के लिये आयी हुयी थी. खूब जवाबी कीर्तन हुआ. बातो बातो मे मेयर ने कहा चलिये ठीक है आप मरद से कम नही है मरदो से एक कदम आगे ही है. अब आप मेरा बलात्कार कर दीजिये. पिन ड्राप साईलेंस. केटी के ज्ञान चक्षु खुल गये  उनको बोध हो गया.और वह बिना बोले चली गयी. बाद मे केटी ने एक साधारण व्यक्ति से विवाह कर बाकी जीवन सुखपूर्वक बिताया. लेकिन लकीरपिटवे लकीर पीटते ही रहे.
ये दोनो उद्धरण मैने इसलिये दिया क्योकि इसी के आधार पर नारीवाद का ढोल पिटता है. बाकी यदि बात वंचनाओ की हो तो उसके अनेक आयाम है. स्वतंत्रता और परतंत्रता की सापेक्ष  परिभाषाये है. अगर औरत घर मे परतंत्र है तो वह द्फ्तर मे स्वतंत्र कैसे रह सकती है वहा भी बास की गुलामी करनी पडती है. जो फौजी सीमा  पर जान देता है क्या उसको जान देने के लिये ही पैसे मिलते है. मजाक बना के रख दिया है स्त्री स्वतंत्रता शब्द को. जब जो मन हो फेचकुरियाने लगे. अरे आदमी और औरत का सम्बन्ध ताला और चाभी जैसे है अगर ताला होने को समानता मान लिया जाय तो जीवन का कमरा कभी भी आबाद नही हो सकता.
मै फिर कहता हू कि मानव व्यवस्था मे ही जी सकता है. और सेक्स का नियमन व्यवस्था का पहला और सबसे महत्वपूर्ण आधार है. जो सेक्स पर नियमन नही चाहते उनके लिये भी एक जगह है जहा वो आराम से गुजर कर सकते है और वह जगह है रेड लाईट एरिया. जो भी आदमी औरत चाहे वहा रहे पर शर्त है कि वह कभी भी व्यवस्था मे जीने की बात नही करेगे. हद हो गयी. चित भी मेरी पट भी मेरी अंटा मेरे बाप का.
जीने का आधार सम्बन्ध है. आपके घर मे खूब पैसा लेकिन सम्बन्ध ख्रराब है तो आप सही जीवन नही जी पाते या कम पैसो मे सम्बन्धो के आधार पर सुखद जीवन जीते है. वो गाना है ना.. तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है. सम्बन्धपूर्वक जीवन मे वाकई कोई कमी नही रहती. औरत के आधार पर सबन्धो  का निर्माण होता है और उसी के आधार पर सरसता भी आती है औरत को इस बात पर फख्र होना चाहिये वह परिवार की धुरी है. किंतु नारी वादियो के चक्कर मे आज स्थिति बिगाड की ओर है. इसलिये मैने यह पिंड्दान प्रोग्राम का आयोजन किया है आप भी इसमे आहुति दीजिये. स्वाहा.
इति सिद्धम