सोमवार, 7 मई 2012

घट-घट व्यापित कौन? राम, अल्लाह, ईसा, मूसा या कोई नही.


ईश्वर क्या है? मै कभी कभी  इस प्रश्न पर तर्क वितर्क करता हूँ ,कभी  ये सोचता हूँ की सारा विश्व संयोगवश उत्पन्न हुआ है कभी सोचता हूँ कि इसके पीछे व्यवस्था निर्माण और नियमित करने वाली    कोई  शक्ति है. सयोग एक बार होता है बार बार नही हो सकता. मै यह कभी नहीं मान पाता की स्टीफन हाकिंग सही है मुझे यह लगता है की इस संसार को नियमित करने वाली कोई शक्ति है जो विभिन्न स्वरूपों में विद्यमान  है यदि उसे राम के रूप में माना जय तो राम  के रूप में अनुभव होगा रहीम के रूप में माने तो उसमे अनुभव होगा प्रत्येक कण में उसकी व्यापकता मुझे दिखती है. आप जिस रूप मे विश्वास करते है वह आपको उसी स्वरूप मे दिखती है. आप इसे तत्ववादी दर्शन कहे प्रत्यक्षवादी दर्शन कहे धार्मिक दर्शन कहे कुछ भी फर्क नही पडने वाला. आप अगर नास्तिकता मे पूर्ण और दृढ विश्वास करते है तो वह भी उसी शक्ति का एक स्वरूप है. ईश्वर कहो प्रकृति कहो राम कहो अल्लाह ईसा मूसा कुछ भी कहो उस शक्ति की अंतर्वस्तु नही बदलने वाली.यह ठीक वैसे ही है जैसे  शक्कर का मीठापन उसके चीनी कहने से नही बदलता.
ईश्वर की मूल सत्ता के अलावा जो भी  शेष है उससे केवल सामाजिक  और राजनीतिक मायने है. ईश्वर के नाम पर लड़ने वाले लोग या तो निरे मूर्ख है या चतुर राजनीतिज्ञ . ईश्वर के अस्तित्व   में ना विश्वास करने वाले लोग भी किसी ना किसी बिंदु पर प्रकृति की सत्ता स्वीकार करते है यदि  प्रकृति को हम ईश्वर की संज्ञा दे दे तो नास्तिकता की अवधारणा   ही खत्म हो    जायेगी. वस्तुतः नास्तिकता  शाब्दिक जंजाल  से ज्यादा कुछ नहीं है . धार्मिक कर्मकांड आम जन को ईश्वर से दूर  और पुरोहितो /पादरियों/मुल्लाओ इत्यादि के करीब लाते है. इस प्रकार ज्ञान का ह्रास होता  है और भक्ति भाव या दास्य भाव में वृद्धि   होती है. श्रीकृष्ण   गीता में ईश्वर प्राप्ति के लिए ज्ञान मार्ग को सर्वोच्च  बताते है. 
पदार्थ की अविनाशिता के नियम के अनुसार पदार्थ को ना तो उत्पन्न किया जा सकता है और ना ही नष्ट किया जा सकता हैकेवल रूप परिवर्तन ही संभव है. ईश्वर भी अजन्मा और अविनाशी है . इसका मतलब यह हुआ की प्रत्येक  द्रव्य में ईश्वर है. अब हम उसे रमजान अली में खोजे या बजरंग बली में खोजने वाले को अपने अपने इष्ट जरूर मिलेगे. किन्तु आगे  की कहानी राजनीतिक हो जाती है रमजान  अली और बजरंग बली के सहारे हम सत्ता पाने का ख्वाब देखने लगते हैऔर तब प्रकृति इस मूर्खता पर युध्ध रूपी अट्टहास करती है
सीधी सी बात है की किसी के मानने या ना मानने से ईश्वर की सत्ता  पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला फिर वो हाकिंग हो या कोई और