गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

वर्तमान आरक्षण व्यवस्था: एक विखंडनकारी अवधारणा


भारतीय संविधान के निर्माण के पश्चात अगले दस वर्षो तक आरक्षण की व्यवस्था इसलिये की गयी थी कि जो हजारो वर्षो दबे कुचले थे उन्हे उनकी जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व दिया जा सके. आरक्षण की इस मूल भावना से कोई भी इंकार नही करता. किंतु यदि ध्यान से देखा जाय तो सबसे बडी समस्या जो उभर कर सामने आती है वह इन दबे कुचले और शोषित वर्गो को पहचानने मे आती है.हजारो वर्षो से शोषित और दमित कौन है?जब हमारे संविधान निर्माता इस प्रश्न से दो चार हुये तो उन्होने इसके उत्तर मे भारतीय जाति व्यवस्था को ही आधार मान लिया और इस प्रकार आरक्षण को जाति व्यव्स्था के सहारे लागू करने का प्रयास किया गया. इस क्रम मे हमारे नीति निर्माता यह भूल गये कि इस तरह जाति व्यवस्था और भी मजबूत होकर सामने आयेगी. और ऐसा हुआ भी. जातिवाद  का जो घृणित रूप आज हम 21 वी शताब्दी मे देख रहे है शायद गत 30 से 40 वर्ष पूर्व न था. आरक्षण व्यवस्था  सकारात्मक भेदभाव की प्रक्रिया को गति देने के लिये एवम सामाजिक पिछडापन दूर करने के लिये लागू की गयी थी किंतु मूल प्रश्न कि दमित कौन है की अनदेखी बार बार हमारे नीतिकार जानबूझकर लोभ लालच के चलते करते रहे. अगर जाति को पिछडेपन का आधार माना जाय तो स्वयम शाहूजी जिनको आरक्षण की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है, सत्ता मे क्यो आते? ये सभी महापुरुष अपने पराक्रम और शौर्यता की वजह से उच्चतम शिखर तक पहुचे. ऐसे ही सैकडो उदाहरणो से इतिहास भरा पडा है. चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर शिवाजी तक हमे सत्ता मे तथाकथित पिछडो की भागीदारी देखने को मिलती है. इसके बावजूद एक वर्ग पिछडा क्यो रह गया. इसका भी उतर जाति व्यवस्था मे खोजा गया और तथाकथित अगडो  को जिम्मेदार मानकर इतिश्री कर ली गयी. मै यहा पर अगडो की एक स्थिति पर नेशनल सैपल सर्वे के कुछ आंकडे  देना चाहूगा. केवल 6.4 पर्सेंट अगडे ऐसे है जिनकी आय 925 रूपये प्रतिमाह से ऊपर है. 30पर्सेंट ग्रामीण जनसंख्या अगडो की है. 65 पर्सेंट अगडे 525 रूपये प्रतिमाह से नीचे कमा पाते है. और तो और केवल 8 पर्सेंट अगडे स्नातक है. एक बात और कि जो 52 पर्सेंट ओबीसी की आबादी का हो हल्ला मंडल आयोग द्वारा मचाया गया उसे राष्ट्रीय् नमूना सर्वेक्षण ने गलत बताया ओबीसी 52 पर्सेंट नही बल्कि 36 परसेंट है. अब भी क्या जातिगत आधार पर अगडे पिछडे का भेद किया जाना चाहिये. क्या शोषित और दलित होने का विशेषाधिकार केवल एक ही समुदाय विशेष के पास है? क्या बुद्धि और ज्ञान का ठेका सिर्फ अगडो के पास है? जाहिर सी बात है अगर ऐसा होता तो रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यो की रचना न हो पाती. मै नीतिकारो से पूछना चाहता हू कि क्या आप पहले से विशेष जाति मानसिक रूप से कमजोर और अक्षम मान कर चल रहे है? आरक्षण कोई जन्मजात अधिकार नही है कि पैदा होते ही मिल गया.जन्मजात  अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता है. जन्म से अधिकार  निश्चित करने की जो भूल पूर्व मे की गयी उसे एक और भूल करके नही सुधारा जा सकता.  जब आप दलित की बात करते है तो इसे जाति की श्रेणी मे रखा जाता है जबकि होना चाहिये कि इसे वर्ग की श्रेणी मे रखा जाता. अगर दलित जाति है तो इससे ज्यादा हास्यास्पद और निराशाजनक बात उस विशेष समुदाय के लिये क्या होगी कि वह कभी भी दलित की श्रेणी से बाहर ही नही हो पायेगा. आरक्षण ने चुनावों को जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ बदला लेने के गर्त में डाल दिया है और इसने भारतीय समाज को विखंडित कर रखा है. चुनाव जीतने में अपने लिए लाभप्रद देखते हुए समूहों को आरक्षण देना और दंगे की धमकी देना  भ्रष्टाचार है और यह राजनीतिक संकल्प की कमी है. वर्तमान समय मे आरक्षण उस एक्सपायर्ड् दवा के समान है जिसके सेवन से शरीर और रोगग्रस्त होगा.  जब भारत मे लोकतंत्र की स्थापना हुयी है तो समस्त प्रदत्त अधिकारो का उन्मूलन होना ही चाहिये अथवा लोकतंत्र की समाप्ति की घोषणा की जानी चाहिये.