सोमवार, 3 दिसंबर 2012

मेरे बिखरे हुये गेसू और उलझी लटें तुम्हारी राह देखती है

 


इस कविता के माध्यम से मै रत्नावली के मन मे उठे उदगारो  को रख रहा हू जो उन्होने गोस्वामी जी के वियोग मे व्यक्त किये होंगे. यदि आप मानस का हंस पढे  होंगे तो कविता के भाव और भीने हो जायेगे.









मेरे बिखरे हुये गेसू
और उलझी लटें 
तुम्हारी राह देखती है
कि तुम आओगे
एक दिन
चाहे वह मेरे जीवन का
अंतिम दिन ही क्यो ना हो
गूंथोगे मेरा जूड़ा 
मिटाओगे मेरी सिलवटें 
माथे से लेकर मन तक
उंगलिया बालो को
हौले हौले सहलायेगी
और मै तुम्हारे सीने मे
अपना मुंह  छुपा लूंगी
फिर तुम्हे देखूंगी एकटक
देखती जाऊंगी
इस तरह
तुम्हारी छवि लिये
बन्द होंगी पलके
सदा के लिये
मै उसी एक दिन की
प्रतीक्षा मे जी रही हू
बिखरे हुये गेसू और
उलझी लटों  के साथ.

11 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

झिड़की खा वापस हुवे, बनते तुलसीदास |
रत्ना की भूले सकल, राम रतन-धन पास |
राम रतन-धन पास, नहीं सौन्दर्य उपासक |
अब क्यूँ देखे आस, छोडती स्वेच्छा से हक़ |
है विछोह की लूक, बंद कर मन की खिड़की |
रविकर हो कल्याण, मिले गर रत्ना झिड़की ||

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

vandana gupta ने कहा…

सुन्दर भाव हैं मगर अगर रत्नावली की तरफ़ से है तो बहुत कुछ और समाहित किया जा सकता है।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह! बेहतरीन अभिव्यक्ति।

मानस का हंस याद करता हूँ तो तुलसी को ही पाता हूँ।:(

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

स्वेच्छा से हक कब छोड़ा था रत्ना ने,सांसारिकता के साथ आत्मिक उन्नयन की बात कही थी. पति होने के नाते,तुलसी का दायित्व था कि केवल अपना न सोच कर उसके कल्याण का विचार भी करते !

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत ही अनुपम प्रस्‍तुति

आभार आपका इस उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति के लिये

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर भावप्रणव रचना!

ramji ने कहा…

सुनकर तुलसी की कथा बन गए तुलसी दास

ब्रिंदाजी के प्रेम में विष्णू भये उदास

सकल सृष्टि को छोड़कर भये प्रेम में लीन

सगरी माया की गति लई प्रेम ने छीन

परम मनोहर रूप तजि बनि गए सालिग्राम

बिनु तुलसी (ब्रिंदा ) के कछु नहीं लागे प्रिय घनश्याम

परम तपस्वनी त्यागिनी रत्नावली ललाम

मोह पास से अलग करि दे दिया संग घनशयाम

Reena Maurya ने कहा…

bahut hi sundar rachana...
:-)

Amit Chandra ने कहा…

सुन्दर भाव लिये खुबसुरत रचना.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

रत्नावली के भाव को उसके मन को जिया है आपने इस रचना में ...