मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

यह जाडे की धूप है या "तुम".









अलसाये सकुचाये
गुलाबी ताप के टुकडे,
क्षोभमंडल पार से
उतरते है मुझ पर
और फैलते जाते है
सिंकते है रोम रोम,
पिघलती है उर्मियाँ
बिंधती है कोशिकायें
ऊष्मा की सुइयों से,
मीठी चुभन से सराबोर
देह गुनगुनाती है
एक जंगली गीत,
मै अक्सर भ्रम मे
पड जाता हूँ
कि,
यह जाडे की धूप है
या "तुम".

13 टिप्‍पणियां:

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत खूबसूरत जज्बात को समेटा है शब्दों में वाह

संगीता पुरी ने कहा…

वाह .. बहुत खूब

AMAN MISHRA ने कहा…

बिंधती है कोशिकायें
ऊष्मा की सुइयों से,
मीठी चुभन से सराबोर
देह गुनगुनाती है. ...

बहुत बढ़िया गुरु जी . आप की बात ही निराली है.

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

मै अक्सर भ्रम में पड़ जाता हूँ कि जाड़े की धुप हो या तुम
बहुत खूब ........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

जाड़े की धूप बहुत सुहानी लग रही है!
सुन्दर रचना..!

अनूप शुक्ल ने कहा…

भ्रम खतम हुआ कि नहीं। अच्छा है।

श्यामल सुमन ने कहा…

आहाहा -- क्या सुन्दर शब्द-चित्र आपने खींचा है? - वाह - पवन जी

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
http://www.manoramsuman.blogspot.com
http://meraayeena.blogspot.com/
http://maithilbhooshan.blogspot.com/

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

जाड़ा आ ही गया...... स्वेटर निकालनी पडेगी...:)

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत खयाल

expression ने कहा…

इतनी सोंधी और गुनगुनी छुवन है.....ये तो तुम्हीं हो...

अनु

भावना पाण्डेय ने कहा…

:)

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत ख़ूब!
आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 19-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1068 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

Reena Maurya ने कहा…

वाह||
बहुत ही खुबसूरत और प्यारे अहसास है रचना में..
बहुत सुन्दर मनभावन रचना..
:-)