रविवार, 14 अक्तूबर 2012

कार्तिक की पियराई सांझ











अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ ।

लौटे वंशी के स्वर 
बन की गंध समेटे  
सिंदूरी बादल से 
चम्पई हुयी दिशाएं 
हलधर  के हल पर उतरी 
थकी हुयी मटमैली सांझ।

मन्दिर मे बजते शंख  
भीनी सी उठती आरती,
खेतों में फुलवारी मे  
फूटी है कस्तूरी ,
तुलसी के दिये पर उतरी 
झिलमिल करती उजियारी सांझ।

सोना उतरा है 
धान के खेत मे,
चाँदी झरने लगी   
चंदा की धूल से,
अलसाये हुये ताल में उतरी  
सिहराती रतनारी सांझ।

अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ।

15 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

परिवेश का सुन्दर चित्रण किया है आपने इस रचना में!

Yashpal Sihag ने कहा…

Is kavita to 500 sal bad padha jayega to ye kaise lagegi padhne vale ko ye soch raha hoon ise padhne ke bad.

Yashpal Sihag ने कहा…

Is kavita to 500 sal bad padha jayega to ye kaise lagegi padhne vale ko ye soch raha hoon ise padhne ke bad.

Yashpal Sihag ने कहा…

Ab mujhe pata chala ki aisa maine kyun socha, Kyunki jis gati se hum Sahrikaran ki taraf badh rahe hain. Uske utabik 500 sal bad gaon sirf nam ke honge. Bas aap aise hi kavitayen likhte rahiye taki aane vale logon ko pata chale ki hamara bharat soni ki chidiya tha. Love U.

वन्दना ने कहा…

सुन्दर चित्रण

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

अति सुन्दर चित्रण ..........

सुज्ञ ने कहा…

गजब का प्रसन्नचित मन रहा होगा जब साँझ का यह मोहक चित्रण प्रस्तुत हुआ.

अनूप शुक्ल ने कहा…

बड़ी चकाचक शाम है।

SURYABHAN CHAUDHARY ने कहा…

लाजवाब
प्रकृति के चित्रण मे आपका कोई जोड नही
ऐसे ही लिखते रहे
बहुत खूब्

DR. PAWAN K. MISHRA ने कहा…

करीब छह महीने बाद यह लिख पाया हू सूर्यभान जी जब मूड होता है तभी कलम चलती है. खुद से जबरदस्ती नही कर पाता हू. बहरहाल कोशिश मेरी पूरी रहेगी. बाकी हरि इच्छा.

रविकर ने कहा…

बढ़िया भाई जी ।।

बेनामी ने कहा…

I won't be able to thank you fully for the articles on your web-site. I know you'd put a lot of time and energy into all of them and hope you know how much I appreciate it. I hope I could do the same for someone else sometime.

Harshkant tripathi ने कहा…

Sundar chitran,,,,

Abhinav Chaurey ने कहा…

"तुलसी के दिये पर
उतरी झिलमिल करती
उजियारी सांझ।"

गोधूली बेला में गाँवों के चूल्हों से उठती खुशबू का आनंद ही कुछ और हैं.
बडी ही "गृह विरही" (nostalgic) सा भाव पैदा करती कविता है. प्रकृति प्रेम पर लिखी कवितायेँ नारी प्रेम पर लिखी कविताओं से कहीं अधिक निर्मल एवं शुद्ध होती हैं.

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

सुंदर प्रकृति चित्रण