मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

यह जाडे की धूप है या "तुम".









अलसाये सकुचाये
गुलाबी ताप के टुकडे,
क्षोभमंडल पार से
उतरते है मुझ पर
और फैलते जाते है
सिंकते है रोम रोम,
पिघलती है उर्मियाँ
बिंधती है कोशिकायें
ऊष्मा की सुइयों से,
मीठी चुभन से सराबोर
देह गुनगुनाती है
एक जंगली गीत,
मै अक्सर भ्रम मे
पड जाता हूँ
कि,
यह जाडे की धूप है
या "तुम".

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

आईये मै आपको मेरे गांव का दशहरा दिखाता हू जो मैने 20 साल पहले देखा था.

त्योहारों के आने के साथ मेरे मन की व्याकुलता बढ़ जाती है और मै अपनी गुलामी  को करीब से महसूस करने लगता हूँ. आज से कोई १५-२० साल पहले ज़िंदगी में इतनी गुलामी ना थी लोग मस्ती में दो रोटी खाकर गाते नाचते जिन्दगी का लुत्फ़ उठाते थे पर आज दो के चार करने के चक्कर में एक रोटी के वास्तविक आनद से महरूम होना पड़ रहा है. मुझे याद है दशहरे के करीब आते से ही बाबूजी हम भाइयो के लिए बॉस की कैनीयो से धनुष बनाया करते और सरकंडे के बाण. उन बानो में हम बेर के कांटे भी लगा लेते थे या कभी कभी सड़क से डामर निकल कर और कुछ कपड़ा लपेट कर उसको अग्निबाण में परिवर्तित कर देते थे. एक बार मैंने जोश में आकर अग्निबाण का संधान अपने पड़ोसी की ओर कर दिया था. गनीमत थी की हमारे बड़े भाईसाहब ने ये देख लिया था और तुरंत पानी डालकर उनकी मड़ैया बचाई नहीं तो लंका में आग एक बार फिर लग जाती. मुझे बचपन में हनुमान जी बनने की बड़ी इच्छा रहती थी. हमारे परंपरागत राजमिस्त्री बग्गड़ ने मुझे एक गदा उपहारस्वरुप दी थी जो शायद आज भी गाव में रखी है उसे लेकर मै अपना मुह फुलाकर खूब धमा चौकड़ी मचाता. दशहरे वाले दिन अम्माने लौकी की बर्फी और पकवान बनाये थे मेरे ताऊ जी भी बहुत अच्छे पकवान बनाते थे. उस दिन गरम गरम पूड़ियाँ सीको में खोस कर हम सभी भाई बहन दौड़ -दौड़ कर खाते. एक बार मेरे कमलेश भैया की पूड़ी कौवा लेकर भाग गया और साथ में उनकी उंगली भी काट गया वे रोने लगे तो मै भी अनायास ही उनके सुर में सुर मिला दिया और हम भाइयो का भोपा जोर से बजाते देख कर बाबूजी अपना परंपरागत उपचार डीज़ल लगा कर किया. उनदिनों जलने काटने पर डीजल लगा दिया जाता था.
दोपहर में पड़ोस से धनुष बाण से सुसज्जित बच्चों की टोली आ धमकी हम भी कहा पीछे रहने वाले थे. हम और भैया कमलेश अपने अपने धनुष बाण सहित विरोधी दल पर टूट पड़े
इत रावन उत राम दोहाई.जयति-जयति जय परी लड़ाई
उस तरफ की सेना नेत्रित्व हमारे पटीदार वकील साहब (जो हमारे बाबूजी के चचेरे भाई लगते थे) के लड़के रबेंदर उर्फ़ खलीफा कर रहा था.अचानक वह दौड़ता हुआ आया और मेरे धनुष को तोड़ दिया. फिर मैंने अपना गदा उठाया और रावन पार्टी पर टूट पड़ा भैया भी बाण छोड़कर मल्लयुद्ध पर आगये. थोड़ी देर में मैदान साफ हो गया.
कछु मारेसि कछु मर्देसी कछु मिलयेसी धरी धूरी.  रबेंदर एंड पार्टी सर पर पाँव रख कर वापस भागी.
नहाने खाने के बाद बुआ के बेटे नग्गू और बबई आ गए वो हर साल यही आकर दसहरा मनाते थे. बड़े भैया से उन लोगो की खूब पटती थी. हम बच्चा पार्टी से बड़े भैया का ज्यादा मतलब नहीं था. हमारे गाँव में जो निचले तबके के लोग थे उनको विजयादशमी के दिन उत्सव मानने के लिए पैसे के रूप में दश्मियाना दिया जाता था. मैंने सहकारिता का पहला सबक इसी दश्मियाने से सीखा. हम शाम को अच्छे कपडे पहन कर दशमी देखने सुजानगंज को चले. बाबूजी की साइकिल पर आगे मै बैठा पीछे कमलेश भैया. बाबूजी से रामजी की बाते सुनते हुए हम मेला स्थल पर पहुचे. उन्होंने साइकल मौरिया पान वाले के यहाँ खड़ी कर दी और मेला दिखाने ले गए. मेले में सबसे पहली मुलाकात माली से हुई जो कान में रुई खोंसे सबको इतर लगा रहा था. उसने हमको भी लगाया बाबूजी ने उसको कुछ पैसे दिए. आगे कडेदीन की जलेबी की दूकान लगी थी. बाबूजी हम सबको राम जानकी मंदिर ले गए और वही रुकने को कहा फिर वह अपनी मंडली से मिलने चले गए. हमने मौका ताड़ा और निकल पड़े मेले में. दया की फोटू की दूकान से फोटू खरीदी गयी घोड़े वाले झूले पर झूला गया, बहन के लिए खिलौने(जतोला) लिया गया गुड वाली जलेबिया उडाई गयी, कुछ पटाखे लिए गये. फिर पीछे से शोरगुल हुआ हम भाग कर मंदिर में आगये. राम जी रावन का वध करने जा रहे थे.लोग नाचने गाने और जैजैकार कर रहे थे. मै राम बने लड़के को देख रहा था. फिर बाबूजी आ गए मैंने बाबूजी से राम बनाने की जिद की उन्होंने कहा कोई कपडे पहन कर या रंग रोगन से राम नहीं बन जाता राम बनना है तो सदगुण अपनाओ जो राम में थे फिर तुम राम जैसे अपने आप बन जाओगे. यह मेरा दूसरा सबक था. हम लोग राम की जय बोलते हुए रावन के पुतले के पास पहुचे और थोड़े देर में पुतला दहन होने लगा. लगभग ९ बजने को था उल्लासित भीड़ वापस घर को. हम लोग बाबूजी के साथ मगन भाव से वापस आये बड़े भैया नग्गू और बबई पहली आ चुके थे. बाबूजी गट्टे ले आये थे जो दशहरे की परंपरागत मिठाई होती है. जब गट्टे का बटवारा हुआ तो उसमे ३-४ गट्टे कम निकले थे वो दूकान वाले को कोसने लगे की उसने ठग लिया. हम जल्दी भाग कर पटाखे छुडाने चल दिए. पटाखे छुडाते समय भैया बोले निकाल गट्टे. हम लोग खूब हँसे और चुराए हुए गट्टे खाने के साथ खूब फुलझड़िया छूटी.
 " आज गाँव से 
सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
मेरे साथ ना तो
लौकी की मिठाई है
ना ही कोई भाई है
इतर लगाने वाला माली
हँसता हुआ आता है और
गायब हो जाता है
सामने काजू की बर्फी 
गिफ्टेड है पर
गट्टे वाला स्वाद नहीं है.
खासतौर से
चोरी के गट्टों का.
आज गाँव से 
सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
और याद करता हूँ
और एक कसक उठती है
दिल के सबसे नरम कोने से
तब्दील हो जाती है
आंसुओ मे 
आज कोई उंगली नही 
मेरे पास जिसे 
पकड कर मै मेला देखने जाऊ
जो मुझे जवाब दे 
मेरे दुनिया भर के सवालो का
मुझे दिला सके
बाज़ार के सारे खिलौने
आज गाँव से 
सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
और याद करता हूँ"

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

कार्तिक की पियराई सांझ











अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ ।

लौटे वंशी के स्वर 
बन की गंध समेटे  
सिंदूरी बादल से 
चम्पई हुयी दिशाएं 
हलधर  के हल पर उतरी 
थकी हुयी मटमैली सांझ।

मन्दिर मे बजते शंख  
भीनी सी उठती आरती,
खेतों में फुलवारी मे  
फूटी है कस्तूरी ,
तुलसी के दिये पर उतरी 
झिलमिल करती उजियारी सांझ।

सोना उतरा है 
धान के खेत मे,
चाँदी झरने लगी   
चंदा की धूल से,
अलसाये हुये ताल में उतरी  
सिहराती रतनारी सांझ।

अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ।

सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

बनाना रिपब्लिक के अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? आज की असेम्बली मे भगत तुम नकली नही असली बम्म फोड दो.


28 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले बनाना रिपब्लिक के  अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? जवाब सुन लीजिये.. 
"इस समय देश मे एक ऐसी क्रांति की निहायत जरूरत है जो देश के ढाचे को रैडिकली चेंज कर दे... रूस के जार की तरह हिन्दुस्तान के जारो को समाप्त कर देने के बारे मे हमे सोचना होगा. फ्रांस के राजा रानी  की गति जैसी आज भारत के लुटेरो और "लुटेरिनो" की होनी चाहिये. दिमाग का दही बन गया है. आज की असेम्बली मे भगत तुम नकली नही असली बम्म फोड दो. अबकी बार तुम्हे फासी नही बल्कि फिरंगियो को  उनके सरदार सहित होगी".
फिर मेरी कलम उस क्रांतिस्वर के साथ आवाज मिलाती है प्रेम के गीत छोडकर अंगारो की फसल उगाती है.













 
उठो कि भारत बोल रहा है
गंगा का जल खौल रहा है
देश रखा है गिरवी पर,
चुपचाप सहेगे कब तक?

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !

साथी आना हाथ बढाना
एक एक कर जुडते जाना
जब तक पूरे सपने ना हो,
नही रुकेगे तब तक .

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !

तोडो भ्रष्टतंत्र का   कारा
जनजन का हो एक ही नारा
राज्य करे जनराज्य करे,
जनराज्य करेगे अब बस्स.

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !

सत्ता का व्यापार हुआ है
सत्य बहुत लाचार हुआ है
दीन दशा मे जन गण मन,
बर्दाश्त करेगे कब तक?

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !







भ्रष्टाचारी हट्ट, भ्रष्टाचारी हट्ट
ले के रहेगे हक, जनता का जो हक