बुधवार, 5 सितंबर 2012

एक शिक्षक दास्तान बनाम शिक्षा व्यवस्था की पोल. गर्त मे गयी शिक्षा और टीचर बना फटीचर्

ये  दास्तान एक शिक्षक  की है जो छत्रपति शाहू जी महाराज से सम्बध्द एक निजी महाविद्यालय में अध्यापन का कार्य करते है.मेरे इन मित्र का नाम है आशीष कुमार .ये विगत कई वर्षो से एक महाविद्यालय में अनुमोदित टीचर के रूप में वनस्पति विज्ञान पढ़ा  रहे है .इनके परिवार में इनकी पत्नी के अलावा दो बच्चे है और ये दोनों बच्चे लड़के है इस तरह से इनके परिवार में कुल ४ सदस्य है .इनके बड़े बेटे की उम्र लगभग १२ साल की है और छोटे बेटे की उम्र लगभग ८ साल की है .ये महाशय जिस निजी महाविद्यालय में पढाते है उस महाविद्यालय के द्वारा इनको ६ हजार मासिक का वेतन दिया जाता है.इनका छोटा बेटा कक्षा २ में एक स्कूल में पढ रहा है और इनका बड़ा बेटा किसी समय एक स्कूल में कक्षा ५ में पड़ता था पर अब नही पढ्ता है .आज इनका बड़ा बेटा मानसिक रोग का शिकार हो गया है जिसका विगत कुछ महीनो से एक मनो चिकित्सक के पास इलाज चल रहा है.पैसे के आभाव में ये अपने बच्चे का इजाज ठीक प्रकार से नहीं करवा पा रहे है.विगत कुछ महीनो से इनको जो महाविद्यालय वेतन मिलता है वह ये अपने बच्चे के इलाज पर खर्च कर देते है और जो थोड़ा बहुत पैसा बच जाता है उस से ये अपने परिवार का भरण पोषण करते है.नतिजन इनको आज काल दो वक्त की रोजी रोटी की जुगाड़ के किये जगह जगह हाथ पैर मारने  पड़ते है फिर भी इनको दोनों वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है कभी कभी तो ये नौबत रहती है की इनके परिवार को दोनों वक्त भूखा रहना पड़ता है.ये कहानी  केवल एक आशीष कुमार की नहीं है अपितु इस विश्वविद्यालय में निजी महाविद्यालय के लगभग सभी टीचर की है.निजी महाविद्यालय में चल रही नक़ल से इन महाविद्यालय के टीचर जो कुछ पहले ट्यूशन से कमा लेते थे इस नक़ल ने तो अब उनसे वो भी छीन लिया है .आज इन निजी महाविद्यालय के टीचर की हालत ये है की अगर ये मामूली रूप से बीमार भी हो जाये तो ये अपना इलाज केवल सरकारी अस्पताल में और सरकारी दवा से ही करा पाते  है अगर डॉक्टर ने बाहर  की दवा पर्चे में लिख दी है तो ये उसे खरीदने में असमर्थ है.आज निजी महाविद्यालय के शिक्षक पैसे के अभाव में बदहाल जीवन जी रहे है.सच बात तो यह है की शासन भी मौन रूप से ये सब कुछ देख रहा है.


छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के चपरासी से कम वेतन पा रहे है निजी महाविद्यालय के प्रवक्ता.
जी हां ये बात एकदम १०० फीसदी सत्य है.छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से सम्बद्ध  निजी महाविद्यालय में पढाने वाले टीचर इस विश्वविद्यालय में काम करने वाले नियमित चपरासी से भी कम वेतन पा रहे है.इस विश्वविद्यालय के निजी महाविद्यालय में पढाने वाले टीचर जो कला एवं विज्ञान स्नातक को पढाते है उनको ३  हजार से १० हजार के बीच वेतन इन निजी महाविद्यालय के प्रबंधको के द्वारा दिया जाता है बहुत से महाविद्यालय के प्रबंधक तो पूरे साल में टीचर को केवल १० या  ११ महीने तक का ही वेतन देते है.
अब जरा ये जाने की ये ५ से १० हजार का वेतन किन टीचर को दिया जाता है -ये वो टीचर है जिनका विश्वविद्यालय में अनुमोदन है.जी हां ये टीचर नेट ,पी-एच०डी ० और एम् ० फिल ० धारक होते है.इन महाविद्यालय में जो टीचर गैर अनुमोदित होते है उनको २ हजार से ५ हजार के बीच में वेतन दिया जाता है.गैर अनुमोदित टीचर से यहाँ मतलब है वो टीचर जो परास्नातक करके इन महाविद्यालय में शिक्षण कार्य कर रहे है.गैर अनुमोदित टीचर को महाविद्यालय के प्रबंधक द्वारा पूरे साल में केवल ६ से ८ महीने तक ही वेतन दिया जाता है.अगर इस विश्वविद्यालय में काम करने वाले नियमित चपरासी का वेतन देखे तो चपरासी का वेतन शायद आप निजी महाविद्यालय के टीचर के वेतन से दुगुना  देखेगे.
असल में निजी महाविद्यालय प्रबंधको की उच्च शिक्षा की दुकाने है जहां डिग्री बिकती है.इन निजी महाविद्यालय के खिलाफ विश्वविद्यालय भी कुछ नहीं करता  क्योकि इन निजी महाविद्यालय में विश्वविद्यालय के कर्मचारी और कूटा के सदस्यों के रिश्तेदारों की उच्च शिक्षा की दुकाने सजी हुयी है.एक सत्य यह भी है अगर शासन इन निजी महाविद्यालय के टीचर के वेतन के संशोधान के लिए कुछ करता भी है तो हो सकता है की ये दूकानदार हड़ताल कर दे.
आज आवश्यकता है कि सभी टीचर्स मिलकर इस इन कालाबाजारी करे वाले दूकान दरो की दुकाने बंद कराएं.
सूबे के  मुखिया जी सब कुछ चुप चाप देख रहे  है क्योंकी इसी विश्वविद्यालय में उनके विधायको ,मंत्रियो के शिक्षा की दुकाने भी सजी हुयी है.

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बृहस्पतिवार (06-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

जोरदार...

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत से प्रश्नों के उत्तर मांगती हुई सार्थक पोस्ट ...

Manu Tyagi ने कहा…

सही कहा

सुशील ने कहा…

हर शाख पर टीचर बैठा है
उल्लू अब यहाँ नहीं रहता है !

kshama ने कहा…

Aankhen khol dee aapne!

आशा जोगळेकर ने कहा…

शिक्षक का यदि ये हाल होगा
शिक्षा का हाल बेहाल होगा ।