शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

सितम्बर अक्टूबर की शामे और राते:यद्यपि अब भी मधु झरती है

सितम्बर -अक्टूबर का महीना मुझे बसंत के महीने से कम रोमांटिक नहीं लगता सुबह की हल्की धुंध  और सरगोशियो से भरी हुई शामे मुझे हमेशा ही एक पुरकशिश रूमानियत का अहसास कराती है. ये दिन मुझे मेरे अतीत में ले जाते है और मधुर यादो के झूले में मै आराम से बैठ कर उनदिनों को करीब से देखता हूँ. मुझे याद है की जब मै मिडिल में पढता था तो स्कूल में अक्टूबर में तिमाही इम्तहान ख़त्म हो जाते थे और हम  सभी पढाई के बोझ से मुक्त होकर गिल्ली डंडा , कंचे और कामिक्सो में खो जाते थे. मुझे विज्ञान प्रगति नंदन और सुमन सौरभ पत्रिकाए बेहद प्रिय थी. खासतौर से जयप्रकाश भारती जी का संपादकीय. खेतो में धान की फसल कट गयी होती थी और जुते खेतो में से निकली सोंधी महक आज तक मेरे जेहन में बसी हुई है. मेरे भैया खेतो में रेडिओ सुनते हुए पाटा  लगाया करते थे कभी -कभी हम बैलो के पीछे पाटे  पर खड़े होकर खेतो का पूरा चक्कर लगाते. दशहरे का समय करीब होने के कारण हमलोग बास की टहनियों से धनुष और सरकंडे का बाण बनाया करते थे और फिर भयकर युध्ध  भी होता था.
कानपुर आने के बाद मेरी शामे  यहाँ पर एक जगह संजय वन है, वहा गुजरती थी. मेरे एक सुहृदय है राज कुमार जी वो और हम अक्सर वहा एक पेड़ की डाली पर बठकर प्रकृति   के सौंदर्य  में अपनी प्रेयसियो की कल्पना करते हुई देर शाम तक गीत गाते रहते थे.
राज कुमार गाना बहुत अच्छा  गाते है जब भी अक्टूबर  की शुरुआत होती है मुझे उनका गया गीत "चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था " याद आता है.  राज कुमार उस समय एक लडकी से प्यार करते थे उनके गानों में एक अजीब किस्म का मिठास मै महसूस करता जो बाद में एक टीस पैदा करता था. जब दिन ढल जाता था तो बड़ा सा चाँद पेड़ों  की शाखों के  पीछे  धीरे से  ऊपर आता था और उसकी  छन छन  के आती रौशनी मन में एक अकुलाहट भर देती थी. मै तब जान कीट्स को अपने बहुत आस पास पाता था. एक बार प्राकृतिक सुन्दरता की मदिरा पीने के लिए मै संजय वन में रात के तीसरे पहर तक बैठा रहा. आज जो कविताये आप लोग पढ़ते है उनका स्रोत यही सितम्बर अक्टूबर की शामे और राते है.एकाध का आनंद  लीजिये........


यह चित्र १९९८ का है संजय वन में अक्टूबर महीने में चाँद की रोशनी से नहाई शाम...










तीसरे पहर की चांदनी
आती निःशब्द झरोखे से
मन पुलकित हो जाता
जैसे तुम आती चुपके से

पाकर वह एकांत मुझे
बाते कहती भूली बिसरी
सारी रात जगा कर सखी
कहती जाती बाते तेरी

मन को विह्वल करती है
सुधियाँ  बीते पल छिन की
एक गहरा शून्य उभरता है
जब बाते होती जीवन की

चादनी तुम वापस जाओ
जहा रहती है वो सखी
वो बाते कहना उससे जो
बानी मेरी कह ना सकी

संसार बना निःसार प्रिये
यद्यपि अब भी मधु झरती है
शरत चंद्र के यौवन से
सुरभित कुसुमो के उपवन से

ओस की फूटती बुन्दों से
यद्यपि अब भी मधु झरती है
हरसिगार की गन्धों  से
यद्यपि अब भी मधु झरती है.............

6 टिप्‍पणियां:

Abhinav Chaurey ने कहा…

"मुझे विज्ञान प्रगति नंदन और सुमन सौरभ पत्रिकाए बेहद प्रिय थी"
इस सुभी में मई कुछ और नाम जोड़ रहा हूँ - नन्हे सम्राट, चंदामामा, बालहंस, लोटपोट, मधुमुस्कान, टिंकल, चम्पक.

मुझे प्रसन्नता है कि इनमे से एक "विज्ञानं प्रगति" में मैं स्थाई लेखक बन गया हूँ.

"धनुष और सरकंडे का बाण बनाया करते थे और फिर भयकर युध्ध भी होता था"
हा हा हा सही वर्णन है कई बार मजाक मजाक में सरकंडे के तीर बड़ी जोर से लग जाते थे.

बचपन बड़ा अनमोल होता है उसमे सारे भाव क्रोध, प्रेम, प्रतिशोध का हम पूर्ण सत्यता के साथ निर्वाह करते हैं , ना कोई आवरण न ही कोई छल. ह्रदय की बात सीधे जिह्वा पर.

Abhinav Chaurey ने कहा…

"मुझे विज्ञान प्रगति नंदन और सुमन सौरभ पत्रिकाए बेहद प्रिय थी"
इस सुभी में मई कुछ और नाम जोड़ रहा हूँ - नन्हे सम्राट, चंदामामा, बालहंस, लोटपोट, मधुमुस्कान, टिंकल, चम्पक.

मुझे प्रसन्नता है कि इनमे से एक "विज्ञानं प्रगति" में मैं स्थाई लेखक बन गया हूँ.

"धनुष और सरकंडे का बाण बनाया करते थे और फिर भयकर युध्ध भी होता था"
हा हा हा सही वर्णन है कई बार मजाक मजाक में सरकंडे के तीर बड़ी जोर से लग जाते थे.

बचपन बड़ा अनमोल होता है उसमे सारे भाव क्रोध, प्रेम, प्रतिशोध का हम पूर्ण सत्यता के साथ निर्वाह करते हैं , ना कोई आवरण न ही कोई छल. ह्रदय की बात सीधे जिह्वा पर.

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

संसार बना निःसार प्रिये
यद्यपि अब भी मधु झरती है
शरत चंद्र के यौवन से
सुरभित कुसुमो के उपवन से


अति सुन्दर................

Rajesh Kumari ने कहा…

मन को विह्वल करती है
सुधियाँ बीते पल छिन की
एक गहरा शून्य उभरता है
जब बाते होती जीवन की
बहुत प्यारी पंक्तियाँ हैं आपके ब्लॉग पर पहली बार ही आना हुआ बहुत अच्छा लगा आकर इतनी सुन्दर कविता गुदगुदाती हुई मिली जुड़ रही हूँ आपके ब्लॉग से मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है मेरा अपना ब्लॉग ---- http://hindikavitayenaapkevichaar.blogspot.in/

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

हिन्दी पखवाड़े की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
--
बहुत सुन्दर प्रविष्टी!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (16-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

pratishtha ने कहा…

dil se nikale bhavo ko khubsurati ke saath shabdo mein bhandha hai aapne.........excellent poetry pavan ji..