बुधवार, 12 सितंबर 2012

हम करेगे छेडछाड सैकडो बार














तुम सब कितने अच्छे हो
तुम सब कितने भोले हो
बिलकुल भेड बकरियो से
बिलकुल नरम चारे से
तुम्हारी सहनशीलता की हम
जग मे गाथा गाते है

हम करेगे छेडछाड सैकडो बार
इस भानुमती के पिटारे से
जिसे तुम संविधान कह कर पूजते हो
जिसकी दुहाई दे दे कर लूट ले जाते है
हम माल देश का, छीन लेते है निवाला
हर इक भुक्खे बच्चे का भी
तुम कुछ नही कर पाओगे
क्योकि हम दुहाई देंगे संविधान की
और हसेंगे तुम्हारी मूर्खता पर

5 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

आज का यही है यथार्थ

Paramanand Gupta ने कहा…

"और हसेंगे तुम्हारी मूर्खता पर"
आज कल यही हो रहा है हम सब उनके सामने मुर्ख बने हुए है ,लेकिन अब हमें जगना होगा उनको सबक सिखाना होगा |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर और सार्थक!
आज इन्हीं इरादों की जरूरत है!

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

"और हसेंगे तुम्हारी मूर्खता पर"
सार्थक कविता...........

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

"और हसेंगे तुम्हारी मूर्खता पर"
बहुत ही सुन्दर............