सोमवार, 10 सितंबर 2012

असीम,हुसैन और कमर पर तिरंगा लपेटने वाली माडल

दार्शनिक "काण्ट" ने कहा था कि युद्ध जरूरी है इससे लोगो मे देश समाज के प्रति जागरूकता बनी रहती है ज्यादा दिन की शांति  लोगो मे अकर्मण्यता और ऐयाशी भर देती है. इस कथन से पूर्ण सहमत तो नही हुआ जा सकता किंतु कुछ न होने से अच्छा है कि कुछ हलचल होती रहनी चाहिये वाकई इस प्रक्रिया से लोग बाग जागरूक बने रहते है. देश मे अभिव्यक्ति की चर्चा जोरो पर है कि इसकी सीमा कहा तक है अगर असीम ने राष्ट्रचिन्ह का कार्टून बनाया या फिर शंकर ने नेहरू और अम्बेडकर के कार्टून बनाये तो क्या वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पार कर गये इस पर देश दो धडो मे विभक्त है अगर असीम या शंकर ने सही किया तो मकबूल फिदा हुसैन और कमर के नीचे तिरंगे को लपेटने वाली माडल ने क्या गलत किया था. या अभिव्यक्ति और आजादी के नाम पर जो अश्लीलता फिल्मो मे निर्देशको अभिनेताओ अभिनेत्रियो द्वारा परोसा जा रहा है गलत ? नारी मुक्ति के नाम रेड लाईट एरिया का विस्तार या अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता ने नाम पर समलैंगिकता के बारे मे क्या राय बनानी चाहिये? मैने फेसबुक और ब्लाग पर  असीम के समर्थन मे तमाम धुरन्धरो को देखा लेकिन ये वही लोग है जिन्होने  ब्लाग सम्मेलन पर मेरे सवालो पर मुझे जेल भेजने की धमकी दे डाली थी.

मेरे खयाल मे इस तरह की बातो पर "इंटेशन " ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. अपने सन्देश को प्रोजेक्ट करने के पीछे मकसद क्या है बहस इस पर होनी चाहिये और यह बहस उन मुद्दो के आधार पर होनी चाहिये जो देश और समाज को प्रभावित करते हो व्यवस्था के क्रम मे. कमर ने नीचे तिरंगा लपेट कर  माडल क्या सन्देश देना चाहती है या हुसैन नंगी तस्वीरो के माध्यम से क्या सन्देश देना चाहते है असीम की नीयत क्या है मुद्दा ये होना चाहिये.
क्या आपको लगता कि असीम  प्रचार  पाने या  देशद्रोही मानसिकता से इस कार्टून को गढे होंगे. लेकिन हुसैन और उस माडल के बारे मे यह कह पाना मुश्किल है. देशद्रोह की सीमाये क्या निर्धारित की गयी है यह भी बडा पेचीदा सवाल है. इन सब बातो पर गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है तभी हम एक सही रास्ते की ओर अग्रसर हो सकते है.

14 टिप्‍पणियां:

मनोज पाण्डेय ने कहा…

ब्लॉग सम्मेलन पर पप्पू टाइप सवाल करके खुद औंधे मुंह घिर चुके हो बेटा, कौन देगा तुमको जबाब और क्यों देगा ? अगर किसी सरकारी/अर्द्ध सरकारी संस्था ने सहयोग किया होगा तो वह हिसाब ले लेगा, नहीं किया होगा तो तुम्हारे झाल बजाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा । नर्सरी कलास के लायक भी नहीं हो पता नहीं कैसे पढ़ाते होगे बच्चों को ।

DR. PAWAN K. MISHRA ने कहा…

मनोज पांडेय = ब्लागजगत के दिग्विजय सिह
और इस नीचता को देखकर तुम्हारे गुरु भी आह भरते होंगे कि मनोजवा तो शक्कर निकला और वो तो गुड ही रह गये.

रविकर फैजाबादी ने कहा…

उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

DR. PAWAN K. MISHRA ने कहा…

साथियो मनोज पाण्डेय उर्फ दिग्विजय सिह की गालिया और भद्दे एवम नीच टिप्पणियो की वजह से मैने माडरेशन लगा दिया है. ऐसे नीच लोगो से सभी को आगाह करता हू
"काटे चाटे श्वान के दुहू भाति विपरीत"

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

विचारणीय पोस्ट. ब्लॉग जगत के लोगों से उम्मीद रखता हूँ कि सभ्य एवं शालीन भाषा का प्रयोग करें.

Paramanand Gupta ने कहा…

"मनोज कुमार पाण्डेय सर " ये कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है जो अपनी माँ का अपमान करे , क्या ये सोच कर भी आप उसका साथ दे रहे हो , जरा सोचिये अग़र आपके माँ का कोइ अपमान करे तो कैसा लगेगा ............? हमारा मन तो ये सोच केर सिहर जाता है ...............

Paramanand Gupta ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Virendra Kumar Sharma ने कहा…

कितनी बार किस किस ने नहीं कहा है -"संविधान नेताओं की भाषण में पवित्र पुस्तक है व्यवहार में रखैल."वरना शाहबानों के लिए संविधान अलग नहीं होता .इस संविधान में पहला क्षेपक ज़बरिया जोड़ा गया "सेकुलर ",अध्यादेश वोटों की गिनती बढाने के लिए इस या उस वर्ग को ध्यान में रखके बारहा जोड़ें गए नाम दिया गया फलाना संविधान संशोधन और कई मर्तबा संशोधन पहले किया गया राष्ट्रपति के दस्तखत बाद में करवाए गए ,इमरजेंसी की रात ऐसा ही हुआ .भला हो थेगलिया(थेग-ड़ी-नुमा पैबंद लगी सरकारों का )अब ऐसा जुल्म नहीं हो सकता .

मकबूल फ़िदा हुसैन की नीयत ठीक नहीं थी वरना हिदू धर्म के प्रतीकों को अपमानित न करते सरस्वती -सीता किसको अगले ने छोड़ा .एक मोहम्मद साहब के कार्टून पर मुस्लिम जगत में आग लग जाती है .एक वर्ग नाराज़ हो जाएगा .साफ़ साफ़ कहने में फटती है दोगले लोगों की .

शंकर के कार्टून प्रतीकात्मक रहें हैं किसी को अपमानित करने की मंशा उनकी कभी नहीं रही .और असीम त्रिवेदी ने तो यही कहा है भैया कसाब हिदू धर्मी समाज का मुंह चिढा रहा है .शेर का शौर्य नष्ट करके इस सरकार ने उसे भेड़िया बना दिया है.जो इस देश में शौर्य का प्रतीक कभी नहीं रहा .

ऐसा न होता तो एंकाउन्टर स्पेशलिस्ट क़ी शहादत को कथित सेकुलर निशाने पे न लेते .

क्या होता नहीं है भारत देश की अस्मिता के साथ गैंग रैप रोज़ -बा -रोज़ जब अफज़ल गुरु .कसाब और एक आम फांसी शुदा एक ही पंक्ति में एक ही माफ़ी (मर्सी )की कतार में होतें हैं .नम्बर गिना ,बतलाते हैं वक्र मुखी दिग -विजये.और ओसामा बिन लादिन के सफाए पर अमरीका को भी पाठ पढातें हैं -ओसामा जी को ,प्रत्येक मृत व्यक्ति को ,कफन सबको मिलना चाहिए .दो गज ज़मीं भी इनका बस चले तो भोपाल में ओसामा बिन लादेन की समाधि बनवा दें .यही सब कहतें हैं असीम के कार्टून .बधाई उनको .कितनी तेज़ बोलतीं हैं असीम की कार्टूनी तस्वीरें जिनके कान पे कभी जूँ नहीं रेंगती उन्हें सुनाई देने लगा .

असीम ने किसकी भैंस खोल के बेच दी ?

नेता तिहाड़ खोर क्या डायना सौर से कम हैं इस दौर में जिनका स्विस बैंक खाता दिन दूना रात चौगुना हो रहा है और बेटे जी उनके जिनके हाथ में खुद प्रधान मंत्रीका रिमोट है खुद प्रधान मंत्री बनने का खाब देख रहें हैं . बतलादें आपको खाता इंदिराजी के ज़माने से चला आरहा था .इस योरोपी महिला के नाम से शुरु हुआ था ,इंदिरा जी में एक ईमानदारी थी उन्होंने साफ़ कहा भ्रष्टाचार तो आलमी रवायत है ग्लोबल फिनोमिना है कभी खुद को "मिस्टर क्लीन " बतलाने की कोशिश नहीं की और सोनिया जी ने कितनी बार नहीं कहा भ्रष्टाचार किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और हाथ आज सबके काले ही नहीं गरीब की जेब में हैं .नारा है कोंग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ .हकीकत में उसकी जेब में है .

चोर पकड़ा जाता है रंगे हाथों सरकार कहती है पकड़ा गया तो क्या पहले बहस कराओ ,सबूत लाओ .कौन सी संसद का अपमान कर दिया असीम साहब ने वह जिसकी कोई साख ही नहीं बची है ?जो गंधाने लगी है नेताओं के भ्रष्ट आचरण से .

इस सरकार के प्रधान मंत्री को तो विदेशी मीडिया भी पूडल कह चुका है .देसी लोगों की तो बात छोडिये .बुरा नहीं लगा हमें अन्दर से गो वह हमारे प्रधान मंत्री हैं.ऐसा क्यों हुआ .विचारणीय प्रश्न यह भी होना चाहिए .

तो सवाल नीयत का है असीम की नीयत पे सवाल कुछ वक्र मुखी ही उठा सकतें हैं वही मामला भी कचहरी में ले गए थे .

ये वही लेफ्टिए हैं जिन्होनें देश आज़ाद होने पर तिरंगे को मान्यता देने से इनकार कर दिया था .किस मुंह से यह तिरंगे के अपमान की बात कर रहें हैं .और वैसे भी इन रक्त रंगियों का आज नाम लेवा भी कौन रहा है ?

बोलेगा तो बिंदास बोलेगा चाहो तो भैया जी मोडरेशन में डाल दो .

आपने खुला विमर्श आमंत्रित किया आपका शुक्रिया .आपकी उम्र दराज़ हो .प्रोफ़ेसर बने आप जल्दी बा -रास्ता रीडर .

वीरुभाई ,कैंटन (मिशगन ),यू एस ए .

सतीश चंद्र सत्यार्थी ने कहा…

यही बात कल मैंने अपने ब्लॉग पर भी कही... कि अगर हम असीम के कार्टून्स को सही मानते हैं तो मकबूल फ़िदा हुसैन पर बोलने का हमें कोई अधिकार नहीं रह जायेगा..

अजय कुमार झा ने कहा…

वीरेंद्र कुमार शर्मा जी से सहमत

DR. PAWAN K. MISHRA ने कहा…

शुक्रिया वीरू भाई. सत्यार्थी जी आपकी बातो को आगे बढाते हुये कहता हू कि भारत माता को डायन कहने पर आजम खान को जेल क्यू नही होती इसीलिये असीम के प्रति सहानुभूति पनप रही है देश मे. बाकी तो भगत सिह ने असेम्बली मे बम्म मार ही दिया था.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सोचने को बाध्य करता हुआ सटीक आलेख!

आशा जोगळेकर ने कहा…

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिये पर हमारी भी जिम्मेदारी बनती है अपने देश के प्रति उसके मानचिन्हों के प्रति । अगर वे गिरे तो हम भी गिरें जरूरी तो नही ।

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

वैसे आपको खुद को पढ़ा लिखा कहते हुए शर्म आनी चाहिए थी मनोज पाण्डेय जी पढ़े लिखे लोग इस तरह कि भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं जिस तरह कि आपने किया है ये भाषा केवल अनपढों और असभ्यो की हैं तो आप समझ लिए आप क्या है .......