शुक्रवार, 15 जून 2012

आग की नदी











जेठ की दुपहरी में 
बूँद बूँद पिघला सूरज 
आग की नदी
क्षितिज से उतर कर 
बहने लगी धरती पर 
दहकने लगे पलाश
अमलताश से आम  तक
जा पहुची पीली  ज्वालायें
आंवा हुए दुआर ओसार 
झौंस गए कुआं तलाव 
आग की नदी ने 
सोख लिया नमी 
हवाओं की, दिल की
अब चारों ओर
बंजर अंधड़ सांय सांय 
करता घूम रहा है 
किसी प्रेत की तरह 

4 टिप्‍पणियां:

रश्मि ने कहा…

गरमी को अच्‍छी तरह दर्शाया है अपनी कवि‍ता में....वाह

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

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बेहतरीन रचना


दंतैल हाथी से मुड़भेड़
सरगुजा के वनों की रोमांचक कथा



♥ आपके ब्लॉग़ की चर्चा ब्लॉग4वार्ता पर ! ♥

♥ पढिए पेसल फ़ुरसती वार्ता,"ये तो बड़ा टोईंग है !!" ♥


♥सप्ताहांत की शुभकामनाएं♥

ब्लॉ.ललित शर्मा
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ana ने कहा…

garmi chayi hai apki kavita par...par sundarta ke sath