मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

सेक्स पर वर्जना क्यों?


मानव जीवन के उद्विकास के क्रम में ढेर सारे पड़ाव  आये मसलन वह कपडे पहनने लगा परिवार बना कर रहने लगा राज्य की स्थापना हुई अधिकारों और कर्तब्यो के सहारे मानव जीवन व्यवस्थित होने की और बढ़ा. सेटल्ड होना मानव का सहज स्वभाव है. किन्तु मानव उतना ही सेटल्ड होगा जितने उसमे हैवानो वाली प्रवृत्तिया कम होंगी. जानवर का सहज स्वभाव है की वह मूल प्रवृत्तियों (बेसिक इंस्टिंक्ट) के सहारे क्रिया करता  है जबकि मानव संबंधो और व्यवहार के सहारे क्रिया करता है.भोजन, नीद, सेक्स और सुरक्षा की आवश्यकता मानव और पशु दोनों को होती है. फर्क पद्धति में है. फर्क संस्कृति का है.  कच्चा मांस खाना  व्यभिचार और सुरक्षित होने के लिए खून की नदिया बहा देने का क्रम  सांस्कृतिक विकास  कम होता गया.आजकल की  सभ्यता में जो प्रवृत्तिया उभर रही है उसे देखकर लगता है कि घोर अव्यस्थितता की और हम तेजी से लुढ़कते जा रहे है. यह लुढकाव रोमांचक लगता है. यह लुढकाव आधुनिक होने का बोध करता है. समाज में आपको अलग छवि प्रदान करता है. आपको बोल्ड (बोल्ड के अनेक अर्थ है सभी पाठक अपने अपने अनुसार अर्थ लगाने के लिए स्वतंत्र है.) बनाता है.मसलन आप कपडे उतार दे तो आप निर्लज्ज नहीं बोल्ड कहलायेगे. (यदि कपडे उतरना बोल्डनेस है तो जानवर हमसे हजार गुना बोल्ड और फैशनेबुल हैं. )
आज कल ब्लॉग जगत में बोल्ड साहित्य की जोर शोर से चर्चा चल रही है.पहले तो इससे दूरी बनाना चाहा किन्तु ब्लागजगत से जुड़े होने की जिम्मेदारी  के कारण अपना मत देना जरूरी समझता  हूँ. 
सेक्स पर वर्जना क्यों?  समाज में व्यवस्था स्थापित करने में सबसे बड़ा रोड़ा आदमी कि मूल प्रव्रत्तिया ही है सेक्स की फीलिंग  जबरदस्त ढंग से मानव को उत्तेजित करती है और डिस्ट्रक्शन की और ले जाने का प्रयत्न करती है. यह परमाणु ऊर्जा से भी ज्यादा ताकतवर है जिसके सहारे जीवन आगे बढ़ता है. यदि सेक्स की फीलिंग  अनियंत्रित हो जाये तो लंका  और ट्राय जैसे साम्राज्य ध्वस्त हो जाते है. जैसे परमाणु ऊर्जा पर नियंत्रण करके हम उससे रचनात्मक एवं मानव कल्याणकारी के कर सकते है ठीक उसी प्रकार सेक्स पर भी नियंत्रण हमारे ऋषियों ने लगाया. विवाह के द्वारा परिवार की स्थापना से मानवता सभ्यता की और उन्मुख हुयी. 
अब सवाल उठता है कि साहित्य में (कालिदास से लेकर सेक्सपियर और वात्स्यायन से लेकर रोस्टर तक) जब इरोटिक देखने को मिलता है तो वंदना गुप्त जी ने उस विषय पर लिख कर कौन सा गुनाह कर दिया. यह सवाल केवल ब्लागजगत का ही नहीं है. आज यह सवाल हर उस व्यक्ति के लिए मौजूं हो गया है जो नैतिकता के प्रति ज़रा सा भी संवेदनशील है.जब आम्रपाली जैसी वेश्या सम्मानित हो सकती है तो सन्नी  लियोन क्यों नहीं?  
जवाब मै  देता हूँ. कालिदास का साहित्य अश्लील  नहीं है.यदि उन्होंने कही पर सम्भोग क्रिया या नायिका के नख शिख का वर्णन किया है तो वह जिस कलात्मकता के साथ किया है उस स्तर पर पहुचने के बाद हर कवि को वह अधिकार  और क्षमता स्वतः ही प्राप्त हो जाती है. मुझे नहीं लगता कि इस समय ब्लॉग के तथाकथित कवियों कवित्रियो में वह क्षमता और स्तर है. आज कल यह फैशन है कि कृष्ण करे तो रास लीला हम करे तो करेक्टर ढीला.  अरे पहले कृष्ण जैसे निर्लिप्त महायोगी बनकर तो दिखाओ. सारे नियम क़ानून सामान्य मनुष्यों के लिए ही है. महापुरुष ट्रांसमोरल होते है. अब कोइ  वेट लिफ्टर का बेटा  कहे कि मेरे पिताजी १०० किलो का वजन उठाते है तो मै भी उठाऊंगा तो आप उस बच्चे को क्या कहेगे. आम्रपाली  को कभी गार्गी के समतुल्य रखा गया क्या. बात सन्नी लियोन की हो या प्रियंका चोपड़ा जैसी तवायफो की. आप अपने बच्चो को बतायेगे क्या कि इनके जैसा बनो या इनको रोल माडल बनाओ. ये मनोरंजन के साधन तो बन सकते है पर सम्मान और उदाहरण के नहीं. 
होता क्या है कि हर सीकिया पहलवान में गामा पहलवान बनाने की जबरदस्त इच्छा होती है लेकिन उसके लिए वह अपना सीकियापन छोड़ने को तैयार नहीं होता या छोड़ ही नही पाता. फिर बड़ी बड़ी हांकने लगता है और बन जाता है बोल्ड.
प्रत्येक पुरुष और महिला नहाते समय नग्न होता है  तो क्या चौराहे  पर खडा होकर नंगा नहाए और बोले कि मै तो बोल्ड हूँ आप खुद सोचिये. 
डर्टी फीलिंग सबमे होती है. लेकिन उसे नियंत्रित किया जाता है. आप सुबह सुबह डर्टी प्रोसेस से गुजरते है तो क्या उस प्रोसेस की कलाकारियो को आप ब्लागजगत में इसलिए शेयर करना चाहेगे कि लोग आपको बोल्ड कहे. शर्मिन्दा होने की जगह  आप बोल्ड हो जाते हो. आपकी मूर्खता इतनी बढ़ जाती है कि आप खुद को वात्स्यायन और कालिदास से तुलना करने लगते हो. यह नौटंकी बंद होनी चाहिए. प्रेम शरीर से इतर की चीज है. शरीर वासना है तो प्य्रार उपासना. शरीर एक माध्यम  हो सकता है कितु वैसे ही जैसे पंछी  का घोसला  एक स्वस्थ समाज के निर्माण में सेक्स की बड़ी महती भूमिका है उसको सरे आम करना उसकी छीछालेदर करना और सेक्स का अपमान करना है. सेक्स को गुप्त ही रहने दो क्योकि गुप्त होना ही सेक्स की प्रकृति है. यह हर प्राणी में बाई डिफाल्ट है. 

15 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

पवन जी।
आपने भ्रमित करते उन कथनों का गहन चिंतनशील मेघा से खण्डन किया है। व्यवहारिक और समाज में यह उपस्थित है ऐसा बहाना बनाकर लोग अपनी कुंठाओं को सार्वजनिक कर देते है। आपने इस विमर्श से सत्य को भ्रम से बाहर लाया है। आभार

ashish ने कहा…

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुरुपयोग हो रहा है . वर्जनाओ को सड़क पर लाकर बोल्डनेस की संज्ञा दी जा रही है . रतिकर्म के बारे में पहले भी लिखा गया है लेकिन सलीके से .एकदम सटीक आलेख .

PARAM ARYA ने कहा…

sex ki baat alag hai aur krishnn ki baat alag hai.

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

आलेख एकदम सटीक है.....

अनूप शुक्ल ने कहा…

"होता क्या है कि हर सीकिया पहलवान में गामा पहलवान बनाने की जबरदस्त इच्छा होती है लेकिन उसके लिए वह अपना सीकियापन छोड़ने को तैयार नहीं होता या छोड़ ही नही पाता. फिर बड़ी बड़ी हांकने लगता है और बन जाता है बोल्ड."

ये शानदार है! बाकी पोस्ट चकाचक!

श्यामल सुमन ने कहा…

पवन जी - एक सशक्त आलेख - बधाई।

कहीं पढ़ा था (शायद आदरणीय अनूप भार्गव जी की पंक्तियाँ) कि-

अंग-प्रदर्शन ही फैशन तो हम कितने बड़े अभागे हैं
इस मुद्दे पर सभी जानवर हमसे कितने आगे हैं

दूसरी बात - "यद्यपि शुद्धम् लोक-विरूद्धम् ना चरणीयम् ना चरणीयम्"

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
http://www.manoramsuman.blogspot.com
http://meraayeena.blogspot.com/
http://maithilbhooshan.blogspot.com/

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

परदे मे रहने दो परदा न उठाओ

दीपक कुमार मिश्र ने कहा…

प्रेम शरीर से इतर की चीज है. शरीर वासना है तो प्य्रार उपासना.
बहुत ही सुन्दर आलेख

ramji ने कहा…

रकृति में हर प्राणी अपने स्वाभाव के अनुकूल ब्यवहार करता है, प्रकृति में हर जीव अपने ही सामान असंख्य जीव पैदा करने की महती प्रबल इच्छा रखता है , हर पेड़ अपने ही समान असंख्य पेड़ पैदा करने की प्रबल इच्छा के वसीभूत हो असंख्य फल पैदा करता है , उसी प्रकार हर जीव व् हर पशु या मनुष्य भी अपने समान असंख्य जीव पैदा करने की प्रबल इच्छा रखता है . एक बृक्ष ,अपने जीवन में असंख्य फल पैदा करता है , उसी प्रकार हर जीव व् मनुष्य भी अपने जीवन में असंख्य अपने ही समान प्राणी पैदा करने की प्रबल प्राकृतिक इच्छा रखता है , और उतने ही बार उसके मन में काम जागता है ,प्रकृति में सभी जीव समान हैं . कोइ स्वच्छंद है तो कोइ अनुशाषित , परन्तु काम को रोकना नदी की प्रबल धरा को रोकने के समान है , संसार का यही सबसे बड़ा आकर्सन है ,यही सबसे बड़ी उर्जा है , इस उर्जा को यदि सही दिशा नहीं मिलाती तो विनास होता है और यदि सही दिशा में उपयोग किया जय तो अपार आनंद ,व् शक्ति मिलती है .

अदा ने कहा…

"मुझे नहीं लगता कि इस समय ब्लॉग के तथाकथित कवियों कवित्रियो में वह क्षमता और स्तर है."
आपके इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ...विषय से परहेज नहीं है, उसे भोंडे पन से परोसने से परहेज है...
देखा जाए तो, आज तक जितने भी महान कवियों ने प्रेम कवितायें लिखी, सेक्स का पुट कमो-बेसी सबमें है परन्तु उन्हें पढ़ कर वितृष्णा तो नहीं होती...
आपका आलेख सराहनीय है..
धन्यवाद

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

शरीर वासना है तो प्य्रार उपासना. Ummada post..

केवल राम : ने कहा…

खरी - खरी कह दी आपने तो .....सबकी आँखें अब भी नहीं खुलेंगी तो कब खुलेंगी ...! सराहनीय पोस्ट के लिए बधाई ...!

"पलाश" ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रवाह ने कहा…

भावनात्मक अभिव्यक्ति अगर कामुक है तो व्यक्त भी कामुक शब्दों में ही होगी ,व्यक्त करने का तरीका व्यक्ति के ज्ञान और संस्कार पर निर्भर करता है , शब्दों का चयन और उपमा भी भावो के अनुरूप ही होगी ,मेरी समझ से ब्लॉग अब व्यक्तिगत डायरी ना हो के सामाजिक और साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक माध्यम है जो कि समाज के संस्कारगत परिवर्तन को दर्शाती है ,सामाजिक परिवर्तन से सहमत और असहमत वर्ग हमेशा से रहा है इसमे नयी बात क्या है ,अच्छी चर्चा के लिए साधुवाद

संजय अनेजा ने कहा…

बोल्ड दिखने की होड़ में लोग भद्दापन ओढ़ लेते हैं।