सोमवार, 19 मार्च 2012

इसे प्रेम तुम मत कहना













मुझको तुम आवाज ना देना
पलक भिगो कर नहीं देखना
मै आवारा बादल हूँ तुम
मुझे देवता मत कहना

अपना ही नहीं है ठौर कोई
बेबस करता है और कोई
हवा ने बंदी बना लिया तुम
मेरी बंदिनी मत बनना

सपनो से बसा संसार कभी
मत कहना इसको प्यार कभी
विपरीत दिशाए है अपनी
तुम मेरी संगिनी मत बनना

कल परसों में  है मिटना
कैसे कह दू तुमको अपना
अंतिम यही नियति मेरी
इसे प्रेम तुम मत कहना

7 टिप्‍पणियां:

ashish ने कहा…

कौन कहता है ये प्रेम है . ये तो मन का भ्रम है . हम मन लिए आपकी बात .

ashish ने कहा…

मान लिए

Kailash Sharma ने कहा…

सपनो से बसा संसार कभी
मत कहना इसको प्यार कभी
विपरीत दिशाए है अपनी
तुम मेरी संगिनी मत बनना

...बहुत सुंदर भावमयी रचना...

Pallavi ने कहा…

बहुत ही सुंदर भाव संयोजन...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

Shah Nawaz ने कहा…

क्या बात है भाईजान... बहुत बढ़िया!

mridula pradhan ने कहा…

bhawpoorn......

S.N SHUKLA ने कहा…

सार्थक, सुन्दर सृजन, बधाई.

कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नवीनतम प्रविष्टि पर भी पधारें.