रविवार, 4 मार्च 2012

...तुम नहीं आये











बीता रात का तीसरा पहर
तुम नहीं आये
आधा हुआ चंदा पिघलकर
तुम नहीं आये

मै अकेला हूँ यहाँ पर
यादो की चादर ओढ़कर
रात भर पीता रहा
ओस में चांदनी घोलकर

फूल खिले है ताजे या तुम
अपने होठ भिगोये हो
हवा हुयी है गीली सी क्यों
शायद तुम भी रोये हो

अब सही जाती नहीं प्रिय
एक पल की भी जुदाई
देखकर बैठा अकेला
मुझ पे हसती है जुन्हाई

बुलबुलें भी उड़ गयी है
रात सारी गीत गाकर
किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

3 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

आयेंगे। कब तक नहीं आयेंगे। :)

ashish ने कहा…

जरुर आएगी , इतनी शिद्दत से जो याद किया .

वन्दना ने कहा…

जरूर आयेंगे ………इतनी शिद्दत से जो पुकारा है।