बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

चाँद जागता रहा रात हुई माधुरी.










धूप फागुनी खिली
बयार बसन्ती चली,
सरसों के रंग में
मधुमाती गंध मिली.

मीत के मन प्रीत जगे
सतरंगी गीत उगे ,
धरती को मदिर कर
महुए  हैं  रतजगे.

अंग अंग दहक रहे
पोर पोर कसक रहे,
पिय से मिलने को
रोम रोम लहक रहे.

अधर दबाये हुए
पुलक रही है बावरी,
चाँद जागता रहा
रात हुई माधुरी.

5 टिप्‍पणियां:

पश्यंती शुक्ला. ने कहा…

its really nice...first time visited on ur blog but its a gud exprnce

वन्दना ने कहा…

वाह …………बहुत सुन्दर भाव संयोजन

Amit Chandra ने कहा…

शानदार. होली की बधाई.

ashish ने कहा…

महुआ टपक रहा है , आम भी बौराए .चलो बचवा गांव घुमा लाए. एकदम महुआरी से छंद .

Raravi ने कहा…

"अधर दबाये हुए
पुलक रही है बावरी,
चाँद जागता रहा
रात हुई माधुरी"
आपने तो महाप्राण निराला की याद दिला दी.बेहद सजीव और सुन्दर मनोभाव चित्रण बना है.