सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नये साल पर शुभ का मनाये ?




"बच्चन" जी कहते है कि जो बीत गयी सो बात गयी  मै इससे ज्यादा इत्तेफाक नही रखता बीती बाते इतनी आसानी से भुला नही पाता या यो कहिये कि जेहन से जाती ही नही। बीता  वर्ष काफी आघातकारी रहा था एक उम्मीद के सहारे आगे का रास्ता तय करने को है। प्रस्तुत रचना के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश करा रहा हूँ।

नए साल पर पूरी कर
मेरे मन की मुराद मौला
मेरे वतन के सीने पर
ना हो कोई फसाद मौला।

बच्चों का आँगन ना छूटे,
बूढ़े नींद चैन की सोवें
बहने चहके चिडियों सी
माओं की गोद आबाद मौला।  

रोटी कपडा मकान
हर इक  शख्स को हासिल हो
प्यार की फ़स्ल उगाये
ज़मी रहे दिल शाद मौला। 

पाप लोभ भय दूर हो
तन से मन से जन जन से
गंगा जमुना का पानी अब
और न हो बरबाद मौला।

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

अटल जी क्यो जिये जा रहे है









वह देख रहा है
अन्धे को बाटते रेवडिया
दुर्योधन और दु:शासनो मे
वह देख रहा है चीर हरण
द्रुपदसुता के निर्वीर्य रक्षको को
हाथ पर हाथ धरे
वह देख रहा है कलपते
अभिमन्यु को पीडा से मरते
वह देख रहा है

शकुनी की कुटिल चालो से
धर्मक्षेत्र को पापक्षेत्र मे बदलते
वह देख रहा है शरशैय्या पर

लेटे हुये महायुद्ध को
वह जिये जा रहा बस्स
इसी प्रतीक्षा मे
कि योगेश्वर  के साथ
पार्थ आयेगा
धर्मध्वजा के छत्र तले
हारेगा भय और अन्धेरा

अखण्ड भारतद्वीप मे फहरेगी
सत्य और न्याय की पताका,
बस्स इसी प्रतीक्षा मे
इच्छामृत्यु भीष्म जिये जा रहा है.


भारतीय राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी बाजपेयी के जन्मदिवस पर सभी मित्रो को बधाई.
 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

मेरे बिखरे हुये गेसू और उलझी लटें तुम्हारी राह देखती है

 


इस कविता के माध्यम से मै रत्नावली के मन मे उठे उदगारो  को रख रहा हू जो उन्होने गोस्वामी जी के वियोग मे व्यक्त किये होंगे. यदि आप मानस का हंस पढे  होंगे तो कविता के भाव और भीने हो जायेगे.









मेरे बिखरे हुये गेसू
और उलझी लटें 
तुम्हारी राह देखती है
कि तुम आओगे
एक दिन
चाहे वह मेरे जीवन का
अंतिम दिन ही क्यो ना हो
गूंथोगे मेरा जूड़ा 
मिटाओगे मेरी सिलवटें 
माथे से लेकर मन तक
उंगलिया बालो को
हौले हौले सहलायेगी
और मै तुम्हारे सीने मे
अपना मुंह  छुपा लूंगी
फिर तुम्हे देखूंगी एकटक
देखती जाऊंगी
इस तरह
तुम्हारी छवि लिये
बन्द होंगी पलके
सदा के लिये
मै उसी एक दिन की
प्रतीक्षा मे जी रही हू
बिखरे हुये गेसू और
उलझी लटों  के साथ.

सोमवार, 26 नवंबर 2012

"आप" का उदय और भाजपाईयो का रुदन:एक लेखा जोखा

आम आदमी पार्टी क्या बनी भाजपा के लोग और उनके समर्थक परेशान हो गये कि यह पार्टी भाजपा के वोट काटेगी और कांग्रेस इस तरह से फिर सत्ता मे वापस आ सकती है. क्या भाजपा आम आदमी पार्टी के रहमोकरम पर है या उसे अपने पर विश्वास नही है. भारत मे संगठन कोई भी बना सकता है सिर्फ इसलिये विरोध कि तुम्हारे संगठन बनाने से हमे नुकसान हो जायेगा के आधार पर विरोध जायज नही है, दूसरी बात भाजपा अपना घर सम्भाल नही पा रही है सुषमा और जेटली गडकरी के साथ मिलकर जिताऊ  लोगो  को उभरने का मौका ही नही दे रहे है. मोदी विरोध के नाम पर भाजपा की लुटिया डुबाई जा रही है. हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे. यूपी मे स्थिति और भी बुरी है योगी आदित्य नाथ को काट छाट कर गोरखपुर तक सीमित कर दिया गया. विनय कटियार और उमा भारती जैसे दो कौडी का नेतृत्व को थोपना और कल्याण सिह जैसे फुस्स पटाखे को फिर आजमाना इतना हास्यास्पद हो गया कि क्या कहने. अब  मतदाता किधर जाये ??? तो फिर  इसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को नही मिलना चाहिये तो क्या कांग्रेस को मिलना चाहिये. कांग्रेस एक प्रेत पार्टी है जो सजीव नही बल्कि भूतो द्वारा संचालित है  ऐसे मे उससे टक्कर लेना मामूली बात नही. आम जनमानस शायद पहली बार चेतना के आधार पर मत देने के बारे मे सोच रहा है. जाति धर्म व्यक्ति के आधार पर नही कार्य और सकारात्मक मुद्दो के आधार पर की गयी वोटिंग ही सच्चे लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त करेगी.
मतदाता को बधुआ समझने वाले राजनीतिक दलो को अपनी सोच मे बदलाव करना होगा. अब जबकि राजनीति के अखाडे मे एक और पहलवान आ गया है तो उसके द्वारा प्रयोग किये जा रहे दाव पेच देखना दिलचस्प होगा और यह भी देखना होगा कि क्या उसके दाव पेच से दूसरे प्रभावित होंगे. अरविन्द के ग्रुप के और सदस्यो से बिना सहमत हुये मुझे लगता है कि यह एक ठीक ठाक  तरीका है काम करने का. मुझे प्रशांत भूषण  के कश्मीर बयान से चिढ है किंतु राम जेठमलानी का अपराध मुझे अभी ज्यादा लग रहा है. भाजपा मे रहते हुये जेठमलानी अफज़ल गुरु का मुकदमा लडते है तो भाजपा को दिक्कत नही किंतु गडकरी  के खिलाफ बोले तो सस्पेशन .यानी गडकरी देश से ज्यादा महत्वपूर्ण है, बात हजम नही हुयी. मुझे लगता है जब रोग लाईलाज हो जायेगा तब भाजपा फिर राम रोटी यात्रा की शरण मे जायेगी पर तब तक तो हाण्डी मे भात पक चुका होगा.
मैने शुरु से अरविन्द के क्रियाकलापो पर आलोचनात्मक रवैया रखा और आई ए सी कानपुर से भी दूरी रखी  बावजूद इसके अरविन्द के कदम सराहनीय है इसमे कोई दो राय नही.

बुधवार, 21 नवंबर 2012

ओ रे घटवारे, ओ रे मछवारे, ओ रे महुवारे.










ओ रे घटवारे
आना नही इस घाट रे
पानी नही बस रेत रे
बिचेगी नाव सेंत मे
सुना है फिर कही
बँधी है तेरी नदी.

ओ रे मछवारे

आना नही इस ताल रे
लगे है बडे जाल रे
घास पात उतरा रहे
तेरी बंसी मे नही
अब लगेगी सहरी.

ओ रे महुवारे

आना नही इस बाग रे
रस निचुड गये सारे
महुवे के फूल से
सुना है कही लगी
मदिरा की फैक्ट्री.



शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

रात की गोद मे चाँद आकर गिरा

 









बर्फ की आग से दग्ध चन्दन हुये 
खो गये शब्द लब थरथराते रहे,
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.

एक सूखी नदी फिर सरस हो गयी 
नेह की इक घटा जो बरस कर गयी,
मन पिघलते रहे भीग जाते रहे.
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.

मधुरस उडेलती गूंजती बांसुरी
मधुबनी तान पे झूमती पैंजनी,
गीत के बोल पर सुर सजाते रहे.
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.

प्राण के अर्थ अब हो गये है नये
प्रात होता नही अब किरन फूटते,
यौवन के नये अर्थ पाते रहे. 
रात की गोद मे चाँद आकर गिरा 
आंखो मे दो दिये झिलमिलाते रहे.

शनिवार, 10 नवंबर 2012

आईये कुछ इस तरह से दीवाली मनाये.

मित्रो एक अपील है आप लोगो से...
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दीपावली एक ऐसा त्योहार है जिसके अपने पर्यावरणीय निहितार्थ है. मौसम मे बदलाव और दीप पर्व मे घनिष्ठ सम्बन्ध है. इसे समझते हुए कृपया पर्यावरण को नुकसान पहुचाने वाली गतिविधिया ना करे. पटाखो का प्रयोग न्यूनतम करे, चाईनीज झालरो की जगह सरसो के दिये जलाये. दीपावली पर सभी मित्रो को इस कविता के साथ हार्दिक बधाई प्रेषित करता हू..... 







खेतों में  बागो  में दियना करे उजास,
मीठी सी लौ भर रही चारो ओर मिठास.

दसो दिशाओं में घुली भीनी-भीनी गंध,
कण-कण पुलकित हो उठे लूट रहे आनंद.

नयी फसल लेकर आयी घर में गुड औ धान,
लईया खील बताशों से अभिनंदित मेहमान.

गेरू गोबर माटी से लिपा पुता है गाँव,
घर से भगे दलिद्दर सर पे रखकर पाँव.

झांझ मजीरा ढोलक बाजे झूम रही चौपाल,
नाचे मन हो बावरा देकर ताल पे ताल.

फूटी मन में फुलझड़िया पूरण होगी आस,
परदेसी पिऊ आ गए गोरी  छुए  अकास.

दीवाली ने कर दिया ज्योतिर्मय संसार,
सबके आँगन में खिले सुख समृद्धि अपार.

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

यह जाडे की धूप है या "तुम".









अलसाये सकुचाये
गुलाबी ताप के टुकडे,
क्षोभमंडल पार से
उतरते है मुझ पर
और फैलते जाते है
सिंकते है रोम रोम,
पिघलती है उर्मियाँ
बिंधती है कोशिकायें
ऊष्मा की सुइयों से,
मीठी चुभन से सराबोर
देह गुनगुनाती है
एक जंगली गीत,
मै अक्सर भ्रम मे
पड जाता हूँ
कि,
यह जाडे की धूप है
या "तुम".

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

आईये मै आपको मेरे गांव का दशहरा दिखाता हू जो मैने 20 साल पहले देखा था.

त्योहारों के आने के साथ मेरे मन की व्याकुलता बढ़ जाती है और मै अपनी गुलामी  को करीब से महसूस करने लगता हूँ. आज से कोई १५-२० साल पहले ज़िंदगी में इतनी गुलामी ना थी लोग मस्ती में दो रोटी खाकर गाते नाचते जिन्दगी का लुत्फ़ उठाते थे पर आज दो के चार करने के चक्कर में एक रोटी के वास्तविक आनद से महरूम होना पड़ रहा है. मुझे याद है दशहरे के करीब आते से ही बाबूजी हम भाइयो के लिए बॉस की कैनीयो से धनुष बनाया करते और सरकंडे के बाण. उन बानो में हम बेर के कांटे भी लगा लेते थे या कभी कभी सड़क से डामर निकल कर और कुछ कपड़ा लपेट कर उसको अग्निबाण में परिवर्तित कर देते थे. एक बार मैंने जोश में आकर अग्निबाण का संधान अपने पड़ोसी की ओर कर दिया था. गनीमत थी की हमारे बड़े भाईसाहब ने ये देख लिया था और तुरंत पानी डालकर उनकी मड़ैया बचाई नहीं तो लंका में आग एक बार फिर लग जाती. मुझे बचपन में हनुमान जी बनने की बड़ी इच्छा रहती थी. हमारे परंपरागत राजमिस्त्री बग्गड़ ने मुझे एक गदा उपहारस्वरुप दी थी जो शायद आज भी गाव में रखी है उसे लेकर मै अपना मुह फुलाकर खूब धमा चौकड़ी मचाता. दशहरे वाले दिन अम्माने लौकी की बर्फी और पकवान बनाये थे मेरे ताऊ जी भी बहुत अच्छे पकवान बनाते थे. उस दिन गरम गरम पूड़ियाँ सीको में खोस कर हम सभी भाई बहन दौड़ -दौड़ कर खाते. एक बार मेरे कमलेश भैया की पूड़ी कौवा लेकर भाग गया और साथ में उनकी उंगली भी काट गया वे रोने लगे तो मै भी अनायास ही उनके सुर में सुर मिला दिया और हम भाइयो का भोपा जोर से बजाते देख कर बाबूजी अपना परंपरागत उपचार डीज़ल लगा कर किया. उनदिनों जलने काटने पर डीजल लगा दिया जाता था.
दोपहर में पड़ोस से धनुष बाण से सुसज्जित बच्चों की टोली आ धमकी हम भी कहा पीछे रहने वाले थे. हम और भैया कमलेश अपने अपने धनुष बाण सहित विरोधी दल पर टूट पड़े
इत रावन उत राम दोहाई.जयति-जयति जय परी लड़ाई
उस तरफ की सेना नेत्रित्व हमारे पटीदार वकील साहब (जो हमारे बाबूजी के चचेरे भाई लगते थे) के लड़के रबेंदर उर्फ़ खलीफा कर रहा था.अचानक वह दौड़ता हुआ आया और मेरे धनुष को तोड़ दिया. फिर मैंने अपना गदा उठाया और रावन पार्टी पर टूट पड़ा भैया भी बाण छोड़कर मल्लयुद्ध पर आगये. थोड़ी देर में मैदान साफ हो गया.
कछु मारेसि कछु मर्देसी कछु मिलयेसी धरी धूरी.  रबेंदर एंड पार्टी सर पर पाँव रख कर वापस भागी.
नहाने खाने के बाद बुआ के बेटे नग्गू और बबई आ गए वो हर साल यही आकर दसहरा मनाते थे. बड़े भैया से उन लोगो की खूब पटती थी. हम बच्चा पार्टी से बड़े भैया का ज्यादा मतलब नहीं था. हमारे गाँव में जो निचले तबके के लोग थे उनको विजयादशमी के दिन उत्सव मानने के लिए पैसे के रूप में दश्मियाना दिया जाता था. मैंने सहकारिता का पहला सबक इसी दश्मियाने से सीखा. हम शाम को अच्छे कपडे पहन कर दशमी देखने सुजानगंज को चले. बाबूजी की साइकिल पर आगे मै बैठा पीछे कमलेश भैया. बाबूजी से रामजी की बाते सुनते हुए हम मेला स्थल पर पहुचे. उन्होंने साइकल मौरिया पान वाले के यहाँ खड़ी कर दी और मेला दिखाने ले गए. मेले में सबसे पहली मुलाकात माली से हुई जो कान में रुई खोंसे सबको इतर लगा रहा था. उसने हमको भी लगाया बाबूजी ने उसको कुछ पैसे दिए. आगे कडेदीन की जलेबी की दूकान लगी थी. बाबूजी हम सबको राम जानकी मंदिर ले गए और वही रुकने को कहा फिर वह अपनी मंडली से मिलने चले गए. हमने मौका ताड़ा और निकल पड़े मेले में. दया की फोटू की दूकान से फोटू खरीदी गयी घोड़े वाले झूले पर झूला गया, बहन के लिए खिलौने(जतोला) लिया गया गुड वाली जलेबिया उडाई गयी, कुछ पटाखे लिए गये. फिर पीछे से शोरगुल हुआ हम भाग कर मंदिर में आगये. राम जी रावन का वध करने जा रहे थे.लोग नाचने गाने और जैजैकार कर रहे थे. मै राम बने लड़के को देख रहा था. फिर बाबूजी आ गए मैंने बाबूजी से राम बनाने की जिद की उन्होंने कहा कोई कपडे पहन कर या रंग रोगन से राम नहीं बन जाता राम बनना है तो सदगुण अपनाओ जो राम में थे फिर तुम राम जैसे अपने आप बन जाओगे. यह मेरा दूसरा सबक था. हम लोग राम की जय बोलते हुए रावन के पुतले के पास पहुचे और थोड़े देर में पुतला दहन होने लगा. लगभग ९ बजने को था उल्लासित भीड़ वापस घर को. हम लोग बाबूजी के साथ मगन भाव से वापस आये बड़े भैया नग्गू और बबई पहली आ चुके थे. बाबूजी गट्टे ले आये थे जो दशहरे की परंपरागत मिठाई होती है. जब गट्टे का बटवारा हुआ तो उसमे ३-४ गट्टे कम निकले थे वो दूकान वाले को कोसने लगे की उसने ठग लिया. हम जल्दी भाग कर पटाखे छुडाने चल दिए. पटाखे छुडाते समय भैया बोले निकाल गट्टे. हम लोग खूब हँसे और चुराए हुए गट्टे खाने के साथ खूब फुलझड़िया छूटी.
 " आज गाँव से 
सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
मेरे साथ ना तो
लौकी की मिठाई है
ना ही कोई भाई है
इतर लगाने वाला माली
हँसता हुआ आता है और
गायब हो जाता है
सामने काजू की बर्फी 
गिफ्टेड है पर
गट्टे वाला स्वाद नहीं है.
खासतौर से
चोरी के गट्टों का.
आज गाँव से 
सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
और याद करता हूँ
और एक कसक उठती है
दिल के सबसे नरम कोने से
तब्दील हो जाती है
आंसुओ मे 
आज कोई उंगली नही 
मेरे पास जिसे 
पकड कर मै मेला देखने जाऊ
जो मुझे जवाब दे 
मेरे दुनिया भर के सवालो का
मुझे दिला सके
बाज़ार के सारे खिलौने
आज गाँव से 
सैकड़ो मील दूर बैठा हूँ
और याद करता हूँ"

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

कार्तिक की पियराई सांझ











अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ ।

लौटे वंशी के स्वर 
बन की गंध समेटे  
सिंदूरी बादल से 
चम्पई हुयी दिशाएं 
हलधर  के हल पर उतरी 
थकी हुयी मटमैली सांझ।

मन्दिर मे बजते शंख  
भीनी सी उठती आरती,
खेतों में फुलवारी मे  
फूटी है कस्तूरी ,
तुलसी के दिये पर उतरी 
झिलमिल करती उजियारी सांझ।

सोना उतरा है 
धान के खेत मे,
चाँदी झरने लगी   
चंदा की धूल से,
अलसाये हुये ताल में उतरी  
सिहराती रतनारी सांझ।

अरहर के फूलो पे उतरी 
कार्तिक की पियराई सांझ।

सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

बनाना रिपब्लिक के अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? आज की असेम्बली मे भगत तुम नकली नही असली बम्म फोड दो.


28 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले बनाना रिपब्लिक के  अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? जवाब सुन लीजिये.. 
"इस समय देश मे एक ऐसी क्रांति की निहायत जरूरत है जो देश के ढाचे को रैडिकली चेंज कर दे... रूस के जार की तरह हिन्दुस्तान के जारो को समाप्त कर देने के बारे मे हमे सोचना होगा. फ्रांस के राजा रानी  की गति जैसी आज भारत के लुटेरो और "लुटेरिनो" की होनी चाहिये. दिमाग का दही बन गया है. आज की असेम्बली मे भगत तुम नकली नही असली बम्म फोड दो. अबकी बार तुम्हे फासी नही बल्कि फिरंगियो को  उनके सरदार सहित होगी".
फिर मेरी कलम उस क्रांतिस्वर के साथ आवाज मिलाती है प्रेम के गीत छोडकर अंगारो की फसल उगाती है.













 
उठो कि भारत बोल रहा है
गंगा का जल खौल रहा है
देश रखा है गिरवी पर,
चुपचाप सहेगे कब तक?

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !

साथी आना हाथ बढाना
एक एक कर जुडते जाना
जब तक पूरे सपने ना हो,
नही रुकेगे तब तक .

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !

तोडो भ्रष्टतंत्र का   कारा
जनजन का हो एक ही नारा
राज्य करे जनराज्य करे,
जनराज्य करेगे अब बस्स.

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !

सत्ता का व्यापार हुआ है
सत्य बहुत लाचार हुआ है
दीन दशा मे जन गण मन,
बर्दाश्त करेगे कब तक?

सांस आखिरी जब तक,
लडते रहेगे तब तक !







भ्रष्टाचारी हट्ट, भ्रष्टाचारी हट्ट
ले के रहेगे हक, जनता का जो हक



शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

सितम्बर अक्टूबर की शामे और राते:यद्यपि अब भी मधु झरती है

सितम्बर -अक्टूबर का महीना मुझे बसंत के महीने से कम रोमांटिक नहीं लगता सुबह की हल्की धुंध  और सरगोशियो से भरी हुई शामे मुझे हमेशा ही एक पुरकशिश रूमानियत का अहसास कराती है. ये दिन मुझे मेरे अतीत में ले जाते है और मधुर यादो के झूले में मै आराम से बैठ कर उनदिनों को करीब से देखता हूँ. मुझे याद है की जब मै मिडिल में पढता था तो स्कूल में अक्टूबर में तिमाही इम्तहान ख़त्म हो जाते थे और हम  सभी पढाई के बोझ से मुक्त होकर गिल्ली डंडा , कंचे और कामिक्सो में खो जाते थे. मुझे विज्ञान प्रगति नंदन और सुमन सौरभ पत्रिकाए बेहद प्रिय थी. खासतौर से जयप्रकाश भारती जी का संपादकीय. खेतो में धान की फसल कट गयी होती थी और जुते खेतो में से निकली सोंधी महक आज तक मेरे जेहन में बसी हुई है. मेरे भैया खेतो में रेडिओ सुनते हुए पाटा  लगाया करते थे कभी -कभी हम बैलो के पीछे पाटे  पर खड़े होकर खेतो का पूरा चक्कर लगाते. दशहरे का समय करीब होने के कारण हमलोग बास की टहनियों से धनुष और सरकंडे का बाण बनाया करते थे और फिर भयकर युध्ध  भी होता था.
कानपुर आने के बाद मेरी शामे  यहाँ पर एक जगह संजय वन है, वहा गुजरती थी. मेरे एक सुहृदय है राज कुमार जी वो और हम अक्सर वहा एक पेड़ की डाली पर बठकर प्रकृति   के सौंदर्य  में अपनी प्रेयसियो की कल्पना करते हुई देर शाम तक गीत गाते रहते थे.
राज कुमार गाना बहुत अच्छा  गाते है जब भी अक्टूबर  की शुरुआत होती है मुझे उनका गया गीत "चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था " याद आता है.  राज कुमार उस समय एक लडकी से प्यार करते थे उनके गानों में एक अजीब किस्म का मिठास मै महसूस करता जो बाद में एक टीस पैदा करता था. जब दिन ढल जाता था तो बड़ा सा चाँद पेड़ों  की शाखों के  पीछे  धीरे से  ऊपर आता था और उसकी  छन छन  के आती रौशनी मन में एक अकुलाहट भर देती थी. मै तब जान कीट्स को अपने बहुत आस पास पाता था. एक बार प्राकृतिक सुन्दरता की मदिरा पीने के लिए मै संजय वन में रात के तीसरे पहर तक बैठा रहा. आज जो कविताये आप लोग पढ़ते है उनका स्रोत यही सितम्बर अक्टूबर की शामे और राते है.एकाध का आनंद  लीजिये........


यह चित्र १९९८ का है संजय वन में अक्टूबर महीने में चाँद की रोशनी से नहाई शाम...










तीसरे पहर की चांदनी
आती निःशब्द झरोखे से
मन पुलकित हो जाता
जैसे तुम आती चुपके से

पाकर वह एकांत मुझे
बाते कहती भूली बिसरी
सारी रात जगा कर सखी
कहती जाती बाते तेरी

मन को विह्वल करती है
सुधियाँ  बीते पल छिन की
एक गहरा शून्य उभरता है
जब बाते होती जीवन की

चादनी तुम वापस जाओ
जहा रहती है वो सखी
वो बाते कहना उससे जो
बानी मेरी कह ना सकी

संसार बना निःसार प्रिये
यद्यपि अब भी मधु झरती है
शरत चंद्र के यौवन से
सुरभित कुसुमो के उपवन से

ओस की फूटती बुन्दों से
यद्यपि अब भी मधु झरती है
हरसिगार की गन्धों  से
यद्यपि अब भी मधु झरती है.............

बुधवार, 12 सितंबर 2012

गर्व करिये अपने देसी होने पर गर्व करिये अपनी हिन्दी पर

इस समय हिन्दी पखवाडा चल रहा है. ऐसे मे हिन्दी चर्चा और भी प्रासंगिक हो जाती है. हिंदी भाषा के उज्ज्वल स्वरूप का भान कराने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी गुणवत्ता, क्षमता, शिल्प-कौशल और सौंदर्य का सही-सही आकलन किया जाए। यदि ऐसा किया जा सके तो सहज ही सब की समझ में यह आ जाएगा कि -
1. संसार की उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है,
2. वह सबसे अधिक सरल भाषा है,
3. वह सबसे अधिक लचीली भाषा है,
4, वह एक मात्र ऐसी भाषा है जिसके अधिकतर नियम अपवादविहीन हैं तथा
5. वह सच्चे अर्थों में विश्व भाषा बनने की पूर्ण अधिकारी है।
6. हिन्दी लिखने के लिये प्रयुक्त देवनागरी लिपि अत्यन्त वैज्ञानिक है।
7. हिन्दी को संस्कृत शब्दसंपदा एवं नवीन शब्दरचनासामर्थ्य विरासत में मिली है। वह देशी भाषाओं एवं अपनी बोलियों आदि से शब्द लेने में संकोच नहीं करती। अंग्रेजी के मूल शब्द लगभग १०,००० हैं, जबकि हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से भी अधिक है।
8. हिन्दी बोलने एवं समझने वाली जनता पचास करोड़ से भी अधिक है।
9. हिन्दी का साहित्य सभी दृष्टियों से समृद्ध है।
10. हिन्दी आम जनता से जुड़ी भाषा है तथा आम जनता हिन्दी से जुड़ी हुई है। हिन्दी कभी राजाश्रय की मुहताज नहीं रही।
११. भारत के स्वतंत्रता-संग्राम की वाहिका और वर्तमान में देशप्रेम का अमूर्त-वाहन
अब मै कुछ प्रश्न आप सबके सामने रख रहा हू उम्मीद है इस पर विचार करेगे
1. हिन्दी की भारत मे क्या प्रस्थिति है?
2. अंग्रेजी बोलने वाले एक बेवकूफ की भी स्थिति समाज मे उच्च क्यो मानी जाती है?
3.शुद्ध हिन्दी बोलने वाला मसखरा है? जाहिल है? गंवार है?
4. अंग्रेजी माध्यम स्कूलो तथा अंग्रेजी युक्त उच्च शिक्षा के विरुद्ध आन्दोलन हिन्दी के रहनुमा लोग करेगे?
5.हिन्दी लिपि के सिमटाव के पीछे किसका कुचक्र है?
6. हिन्दी के अपमान की सजा का क्या प्रावधान है?

सभी पाठको से अनुरोध है कि वे सोचे और मंथन करे कि इस सन्दर्भ मे क्या किया जाना चाहिये..
जय हिन्दी जय नागरी

भडास निर्लज्जता बेशरमी की हकीकत: यह पोस्ट नही जूता है: साभार नुक्कड्

डिस्क्लैमर: मेरे मन मे किसी के लिये कोई द्वेष भाव नही है. अगर कोई यह समझ रहा है तो मात्र सन्योग है.
अब आईये दूसरे आलोचक ब्लोगर की सच्चाई से अवगत होते  हैं। नाम है पवन मिश्र । जब इनके पोस्ट लिखने के पीछे की सच्चाई मुझे जाकिर भाई से पता चली  तो मुझे बहुत हंसी आई । जाकिर भाई ने बताया  कि इन्होनें एकबार एक कार्यक्रम की पोल खोल चर्चा की थी । अब चूँकि वह कार्यक्रम सरकारी अनुदान से आयोजित था, इसलिए जांच कमिटी बैठ गयी । उन्होंने  जाकिर भाई से बोला की परिकल्पना वाले कार्यक्रम में मेरी इस बहादुरी के चर्चे करवा दो । जिस पोस्ट की ये चर्चा करवाना चाह रहे थे उसके लिंक हैं :


http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_16.html
http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_4956.html
http://kanpurbloggers.blogspot.in/2011/04/blog-post_09.html

प्रोग्राम के अगले दिन दोपहर में पवन मिश्र  ने जाकिर भाई से फेसबुक पर चैट के दौरान सबसे पहले यही पूछा कि सम्‍मेलन में इस घटना की चर्चा हुई ? जब जाकिर भाई ने मना कर दिया, तो वो फ़ुरसतिया  और अन्‍य लोगों के बारे में सवाल पूछने लगे। उस समय जाकिर आफिस में थे और किसी जरूरी काम में बिजी थे, इसलिए बातों को टाल गये। इससे पवन मिश्र का  ईगो हर्ट हो गया और अगले ही दिन अपनी भड़ास निकालने के लिए पोस्‍ट लगा दी।


मैने परिकल्पना पर टीप करना चाहा पर न हो पाया फिर मैने उसे रवीन्द्र जी के पास भेज दिया कि स्याह सफेद करले किंतु वह अभी तक दो ई मेल से आयी टीपो को तो प्रकाशित कर चुके मेरी नही प्रकाशित की और ज़ाकिर भाई भी उल्टी पुल्टी जानकारिया दबाव मे आकर दी विजय माथुर जी के साथ मैने कभी भी कोई  हर्ज वाली बात नही की अगर असहमत होना बेहूदा है तो सारी दुनिया बेहूदी है, सब को स्पष्ट करने के लिये मै बिना लाग लपेट के वह ई मेल यहा देता ज़ाकिर भाई आप भी देख लीजिये आप भी बडे जोश मे  कह रहे थे कि कार्यक्रम की चर्चा के बारे मे पूछा था.

टीप जो प्रकाशित नही हो पा रही है

Dr. Pawan K. Mishra pkmkit@gmail.com
7:33 PM (1 hour ago)

to ravindra
from: Dr. Pawan K. Mishra pkmkit@gmail.com
to: ravindra prabhat
date: Wed, Sep 12, 2012 at 7:33 PM
subject: टीप जो प्रकाशित नही हो पा रही है
mailed-by: gmail.com
 
जाकिर भाई के ऊपर क्यो प्रेशर डाल रहे है दादा वो बेचारे परेशान हो गये है कि खामखाह खोडरे मे गोड डाल दिया. उनको छोडिये मै सामने हू.
फेसबुक से चैट के दौरान उनसे किसी कार्यक्रम की बाते नही हुयी थी. जिस कार्यक्रम के आप बात कर रहे है वह शायद एक साल पुराना है और इसकी सूचना स्वयम ज़ाकिर भाई ने दी थी और कहा था कि अविनाश और आपकी एक पुस्तक ब्लागिंग के इतिहास पर छप रही है उसमे अगर ब्लागिंग से सम्बन्धित कुछ जानकारी देना चाहो तो दे दो उन्होने ही आपका मेल आईडी भी दिया था. कानपुर यूनिवर्सिटी मे नकल और उडनदस्ते का पर्दाफाश केबीए के थ्रू किया गया था सो मैने समझा कि आप उसे य्थोचित सम्मान देंगे लेकिन ऐसा ना हुआ पर उससे मुझे कोई उज्र नही यकीन मानिये.अभी ज़ाकिर भाई से बात हुयी किंतु नेट्वर्क सही ना होने से बात अधूरी रह गयी मै कभी भी व्यक्तिगत बातो को सार्वजनिक करने के पक्ष मे नही हू किंतु बात मेरे पर आन पडी है तो मै फेसबुक चैट सार्वजनिक करता हू. मै जाकिर भाई से बडे हल्के फुल्के अन्दाज मे बात करता हू. एगो अनुरोध है मनोज पाण्डे को इस मामले पर बकबक मत करने दीजियेगा. उन्हे बात करने की तमीज नही है. ज़ाकिर भाई यह भी बता रहे थे कि आप शायद मुझे नही जानते ये तो बहुत गलत बात है.खैर चैट देखिये

    Pawan Mishra

        badhaai ho
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        shukriya
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        mujhe aap par garv hai
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        smile
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        pass port wala kam ho gya?
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        abhi tak mila to nahi june se website pe status likh ke aa raha hau ki 26 june tak dispach ho jayega.
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        anup sukla ko samman kyu nhi diya?

        kanpur walo ke saath bhedbhaw

        smile
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        kaun sukla?
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        fursatiya
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        samman unko diya jata hai, jo uska samman karte hain!
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        fursatiya ji ko to dena hi chahiye tha
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        waise samman wala mamla ravindra prabhat ji dekhte hain
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        jab aap poore blog kar rahe hote hai to prejudicefree hokar kam karna chahiye

        fursatiya chuik bloggers me the aur blog ko kafi kuchh diyaa bhi hai
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        isme koi do rai nahi

        lekin ----- samman wala mamla ravindra prabhat ji dekhte hain
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        to prabhat ji ko is baat ki yaad dilaani chahiye thee aapko
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        kisi ko kuchh samjhaana aasaan hai kya?

        Aaj tak apni bibi ko to bahut kuchh samjha nahi paya....
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        KANPUR BLOGGERS ASSOCIATION ke karan CSJM UNIme jo pariwartan aaye the un ki charcha bhi nhi hui hogi

        blogging ke effects me

        Kk yadav and family ka apratim yogdan kya hai?
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        ye karyakram ek samman samaroh tha.....

        charcha ke liye kam se kam do din ka samay chahiye....
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        kanpurbloggers ke ke prati upexaniya wyawahaar hua hai

        rekha srivastav ji ko bhi bulaya aap logo ne

        ashish rai bhi gayab rahe

    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        aparna tripthi

        ye sab blog jagat me nam rakhate hai ji

        Zakir bhai

        ?

        aap bhi jawabdeh hai

        aur mitra hone ke nate mai poochh rahaa hoo
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        yahan par sirf unhi logon ko bulaya gaya, jo parikalpana samaroh men dil se aane ke ichchuk the...
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        to ise parikalpana sammelan kahate
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        warna kisi ne kaha hai ki bloggers to har gali men 3 mil jate hain
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        mai gali chhap bloggers ki bat thodi kar rha hoo mai unki bat kar rha hoo jinhone blog jagat ko rich kiya
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        shaayad aapne program ke banner ko dhyan se nahi dekha...

        aur haan is tarah ki baten chat pe sambhav nahi
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        smile
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        kabhi mulaakat hogi, tab baat hogi....
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        bilkul baharhal furastiya ji ki upexa par KBA wirodh darj karYEGA
    DrZakir Ali Rajnish
    August 28
    DrZakir Ali Rajnish

        bilkul

        smile

        ye KBA ka janmsidh adhikar hai/

        smile
    Pawan Mishra
    August 28
    Pawan Mishra

        HA HA HA

अब आप शायद संतुष्ट हो गये होंगे मै दुबारा कमेंट करने नही पढने आऊंगा अगर फिर भी कोई दिक्कत है तो ज़ाकिर जी के पास मेरा फोन न है बात कर लीजियेगा

शुभकामनाओ के साथ
डा पवन कुमार मिश्र
कानपुर्
--

With Best Regards,

Dr. Pawan K. Mishra
Assistant Professor of Industrial Sociology

हम करेगे छेडछाड सैकडो बार














तुम सब कितने अच्छे हो
तुम सब कितने भोले हो
बिलकुल भेड बकरियो से
बिलकुल नरम चारे से
तुम्हारी सहनशीलता की हम
जग मे गाथा गाते है

हम करेगे छेडछाड सैकडो बार
इस भानुमती के पिटारे से
जिसे तुम संविधान कह कर पूजते हो
जिसकी दुहाई दे दे कर लूट ले जाते है
हम माल देश का, छीन लेते है निवाला
हर इक भुक्खे बच्चे का भी
तुम कुछ नही कर पाओगे
क्योकि हम दुहाई देंगे संविधान की
और हसेंगे तुम्हारी मूर्खता पर

सोमवार, 10 सितंबर 2012

असीम,हुसैन और कमर पर तिरंगा लपेटने वाली माडल

दार्शनिक "काण्ट" ने कहा था कि युद्ध जरूरी है इससे लोगो मे देश समाज के प्रति जागरूकता बनी रहती है ज्यादा दिन की शांति  लोगो मे अकर्मण्यता और ऐयाशी भर देती है. इस कथन से पूर्ण सहमत तो नही हुआ जा सकता किंतु कुछ न होने से अच्छा है कि कुछ हलचल होती रहनी चाहिये वाकई इस प्रक्रिया से लोग बाग जागरूक बने रहते है. देश मे अभिव्यक्ति की चर्चा जोरो पर है कि इसकी सीमा कहा तक है अगर असीम ने राष्ट्रचिन्ह का कार्टून बनाया या फिर शंकर ने नेहरू और अम्बेडकर के कार्टून बनाये तो क्या वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पार कर गये इस पर देश दो धडो मे विभक्त है अगर असीम या शंकर ने सही किया तो मकबूल फिदा हुसैन और कमर के नीचे तिरंगे को लपेटने वाली माडल ने क्या गलत किया था. या अभिव्यक्ति और आजादी के नाम पर जो अश्लीलता फिल्मो मे निर्देशको अभिनेताओ अभिनेत्रियो द्वारा परोसा जा रहा है गलत ? नारी मुक्ति के नाम रेड लाईट एरिया का विस्तार या अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता ने नाम पर समलैंगिकता के बारे मे क्या राय बनानी चाहिये? मैने फेसबुक और ब्लाग पर  असीम के समर्थन मे तमाम धुरन्धरो को देखा लेकिन ये वही लोग है जिन्होने  ब्लाग सम्मेलन पर मेरे सवालो पर मुझे जेल भेजने की धमकी दे डाली थी.

मेरे खयाल मे इस तरह की बातो पर "इंटेशन " ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. अपने सन्देश को प्रोजेक्ट करने के पीछे मकसद क्या है बहस इस पर होनी चाहिये और यह बहस उन मुद्दो के आधार पर होनी चाहिये जो देश और समाज को प्रभावित करते हो व्यवस्था के क्रम मे. कमर ने नीचे तिरंगा लपेट कर  माडल क्या सन्देश देना चाहती है या हुसैन नंगी तस्वीरो के माध्यम से क्या सन्देश देना चाहते है असीम की नीयत क्या है मुद्दा ये होना चाहिये.
क्या आपको लगता कि असीम  प्रचार  पाने या  देशद्रोही मानसिकता से इस कार्टून को गढे होंगे. लेकिन हुसैन और उस माडल के बारे मे यह कह पाना मुश्किल है. देशद्रोह की सीमाये क्या निर्धारित की गयी है यह भी बडा पेचीदा सवाल है. इन सब बातो पर गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है तभी हम एक सही रास्ते की ओर अग्रसर हो सकते है.

बुधवार, 5 सितंबर 2012

एक शिक्षक दास्तान बनाम शिक्षा व्यवस्था की पोल. गर्त मे गयी शिक्षा और टीचर बना फटीचर्

ये  दास्तान एक शिक्षक  की है जो छत्रपति शाहू जी महाराज से सम्बध्द एक निजी महाविद्यालय में अध्यापन का कार्य करते है.मेरे इन मित्र का नाम है आशीष कुमार .ये विगत कई वर्षो से एक महाविद्यालय में अनुमोदित टीचर के रूप में वनस्पति विज्ञान पढ़ा  रहे है .इनके परिवार में इनकी पत्नी के अलावा दो बच्चे है और ये दोनों बच्चे लड़के है इस तरह से इनके परिवार में कुल ४ सदस्य है .इनके बड़े बेटे की उम्र लगभग १२ साल की है और छोटे बेटे की उम्र लगभग ८ साल की है .ये महाशय जिस निजी महाविद्यालय में पढाते है उस महाविद्यालय के द्वारा इनको ६ हजार मासिक का वेतन दिया जाता है.इनका छोटा बेटा कक्षा २ में एक स्कूल में पढ रहा है और इनका बड़ा बेटा किसी समय एक स्कूल में कक्षा ५ में पड़ता था पर अब नही पढ्ता है .आज इनका बड़ा बेटा मानसिक रोग का शिकार हो गया है जिसका विगत कुछ महीनो से एक मनो चिकित्सक के पास इलाज चल रहा है.पैसे के आभाव में ये अपने बच्चे का इजाज ठीक प्रकार से नहीं करवा पा रहे है.विगत कुछ महीनो से इनको जो महाविद्यालय वेतन मिलता है वह ये अपने बच्चे के इलाज पर खर्च कर देते है और जो थोड़ा बहुत पैसा बच जाता है उस से ये अपने परिवार का भरण पोषण करते है.नतिजन इनको आज काल दो वक्त की रोजी रोटी की जुगाड़ के किये जगह जगह हाथ पैर मारने  पड़ते है फिर भी इनको दोनों वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है कभी कभी तो ये नौबत रहती है की इनके परिवार को दोनों वक्त भूखा रहना पड़ता है.ये कहानी  केवल एक आशीष कुमार की नहीं है अपितु इस विश्वविद्यालय में निजी महाविद्यालय के लगभग सभी टीचर की है.निजी महाविद्यालय में चल रही नक़ल से इन महाविद्यालय के टीचर जो कुछ पहले ट्यूशन से कमा लेते थे इस नक़ल ने तो अब उनसे वो भी छीन लिया है .आज इन निजी महाविद्यालय के टीचर की हालत ये है की अगर ये मामूली रूप से बीमार भी हो जाये तो ये अपना इलाज केवल सरकारी अस्पताल में और सरकारी दवा से ही करा पाते  है अगर डॉक्टर ने बाहर  की दवा पर्चे में लिख दी है तो ये उसे खरीदने में असमर्थ है.आज निजी महाविद्यालय के शिक्षक पैसे के अभाव में बदहाल जीवन जी रहे है.सच बात तो यह है की शासन भी मौन रूप से ये सब कुछ देख रहा है.


छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के चपरासी से कम वेतन पा रहे है निजी महाविद्यालय के प्रवक्ता.
जी हां ये बात एकदम १०० फीसदी सत्य है.छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से सम्बद्ध  निजी महाविद्यालय में पढाने वाले टीचर इस विश्वविद्यालय में काम करने वाले नियमित चपरासी से भी कम वेतन पा रहे है.इस विश्वविद्यालय के निजी महाविद्यालय में पढाने वाले टीचर जो कला एवं विज्ञान स्नातक को पढाते है उनको ३  हजार से १० हजार के बीच वेतन इन निजी महाविद्यालय के प्रबंधको के द्वारा दिया जाता है बहुत से महाविद्यालय के प्रबंधक तो पूरे साल में टीचर को केवल १० या  ११ महीने तक का ही वेतन देते है.
अब जरा ये जाने की ये ५ से १० हजार का वेतन किन टीचर को दिया जाता है -ये वो टीचर है जिनका विश्वविद्यालय में अनुमोदन है.जी हां ये टीचर नेट ,पी-एच०डी ० और एम् ० फिल ० धारक होते है.इन महाविद्यालय में जो टीचर गैर अनुमोदित होते है उनको २ हजार से ५ हजार के बीच में वेतन दिया जाता है.गैर अनुमोदित टीचर से यहाँ मतलब है वो टीचर जो परास्नातक करके इन महाविद्यालय में शिक्षण कार्य कर रहे है.गैर अनुमोदित टीचर को महाविद्यालय के प्रबंधक द्वारा पूरे साल में केवल ६ से ८ महीने तक ही वेतन दिया जाता है.अगर इस विश्वविद्यालय में काम करने वाले नियमित चपरासी का वेतन देखे तो चपरासी का वेतन शायद आप निजी महाविद्यालय के टीचर के वेतन से दुगुना  देखेगे.
असल में निजी महाविद्यालय प्रबंधको की उच्च शिक्षा की दुकाने है जहां डिग्री बिकती है.इन निजी महाविद्यालय के खिलाफ विश्वविद्यालय भी कुछ नहीं करता  क्योकि इन निजी महाविद्यालय में विश्वविद्यालय के कर्मचारी और कूटा के सदस्यों के रिश्तेदारों की उच्च शिक्षा की दुकाने सजी हुयी है.एक सत्य यह भी है अगर शासन इन निजी महाविद्यालय के टीचर के वेतन के संशोधान के लिए कुछ करता भी है तो हो सकता है की ये दूकानदार हड़ताल कर दे.
आज आवश्यकता है कि सभी टीचर्स मिलकर इस इन कालाबाजारी करे वाले दूकान दरो की दुकाने बंद कराएं.
सूबे के  मुखिया जी सब कुछ चुप चाप देख रहे  है क्योंकी इसी विश्वविद्यालय में उनके विधायको ,मंत्रियो के शिक्षा की दुकाने भी सजी हुयी है.

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

दरिया होने का दम भरते तो है सनम, लेकिन डूबेगे अंजुरी भर पानी मे

पूर्वकथन्:मै यह पोस्ट  नही लिखना चाहता था पर मन मार कर जबरदस्ती लिख रहा हू केवल अपना पक्ष रखने के लिये. और लोगो के भ्रम समाप्ति के पश्चात इसे डिलीट कर दूंगा.

@क्षद्म आलोचना को अपनी अभिव्यक्ति का धार बनाने वाले एक प्रबुद्ध साहित्यकार हैं डॉ रूप चंद शास्त्री मयंकजो आधारहीन बातें करके सुर्खियां बटोर रहे हैं आजकल । आगत अतिथियों का स्वागत करके आयोजकों के फोटो को दिखाकर यह साबित करना चाह रहे हैं कि आयोजक गण सम्मानित हो रहे हैं । वहीं कानपुर के डॉ पवन कुमार मिश्र ने तो मुझपर गंभीर आरोप ही लगा दिया कि मैंने पैसे लेकर सम्मान दिया है । और भी कई तथ्यहीन आरोप हैं, उपरोक्त दोनों पोस्ट का स्नेप शॉट ले लिया गया है, कानून के विशेषज्ञों से वार्ता की जा रही है । शीघ्र ही कार्यवाही की प्रक्रिया होगी । 

रवीन्द्र जी मैने कोई आरोप नही लगाये है ये कुछ डाऊट्स थे आप उस पर अपनी स्पष्ट राय रख सकते थे किंतु ऐसा न हुआ.स्वतंत्र ब्लाग अकादमी बनाने का आज भी मै विरोध करूंगा माना कि आप ईमानदार है किंतु सब आप की तरह नही होंगे. फिर जो स्थिति होगी उसका जिम्मेदार कौन होगा? रही बात शास्त्री जी की तो बडो की कडवी बातो को भी आदर के साथ लिया जाना चाहिये. दरिया बनने का दावा करते है तो अपनी आलोचनाओ से इस तरह उखड गये कि "कानूनी कार्यवाही" की धमकी देने लगे. जरा अपने साथियो की भी अभद्र भाषा का ध्यान कर लीजियेगा.उनके साथ कैसे निपटेगे लगे हाथ यह भी बता दीजियेगा.

हम तो दरिया है अपना हुनर रखते है. दरिया का हुनर कहने से नही आ जाता. एक आलोचनात्मक कथन से  तूफान आ गया. आप दरिया है या क्या है ये आप नही तय करेगे ये आपके गुण और प्रकृति तय करती है. कोर्ट कचहरी हमारे लिये कोई इश्यू नही है इश्यू है कि जो खुद को दरिया होने का दावा करता है वह इतना उसकी मानसिकता ऐसी भी  हो सकती है सोचा न था. रही बात कुछ आपके ब्लागर मित्र मुझसे  एकाध कार्यक्रम के आयोजन की चुनौती दे रहे थे  तो जानकारी के लिये बता दू कि मैने  नेशनल सेमिनार सहित अनेको संगोष्ठिया और अकादमिक सांस्कृतिक कार्यक्रमो का आयोजन किया है. ना विश्वास हो तो ज़ाकिर भाई से पूछ लीजिये वह आपके मित्र है तो मेरे भी मित्रो मे एक है वह आपको सच बतायेगे. मै अपना यशोगान नही करना चाहता यह मुझे अत्यधिक ओछा कृत्य लगता है इसीलिये मैने भाई कृष्ण कुमार जी को भी टोका था.
बहरहाल आपके लिये एक गज़ल पेश कर रहा हू. गौर कीजियेगा...


जरा कुछ देर ठहरो तुम अभी तो बात बाकी है,
सितारे और टूटेंगे अभी तो रात बाकी है .

तुम्हारे एक इशारे पर सुना शोले दहकते है,
मगर देखो की आँखों में अभी बरसात बाकी है.

जमाने भर में चर्चा है की तुम व्यापार करते हो,
मेरे हाथो में अब भी प्यार की सौगात बाकी है.

खुदगर्जी की मूरत हो मझे मालूम है लेकिन,
तुम्हारे वास्ते मेरे अभी जज्बात बाकी है.

बना लो दूरिया कितनी हमारे दरमियानो में, 

मुकद्दर कह रहा है कि  अभी कुछ साथ बाकी है.

बस्स अंत मे यही कहूंगा कि चाद तारो की दूरी तय करने से पहले दिलो की दूरी तय कीजिये." घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,पहले यह तय हो कि इस घर को बचाये कैसे"

शुभकामनाओ के साथ 
डा पवन कुमार मिश्र
कानपुर.


रविवार, 2 सितंबर 2012

तुम पास में ठहरो















आधी रात बीत गयी बाकी  बीत जाने दो
तुम पास में ठहरो, वक्त गुज़र जाने दो.

आयेगे और मौसम आकर चले जायेगे
पर तुम्हारे जाने से, बेमतलब हो जायेगे.

शबनमी बून्दो को  फूलो पे बरस जाने दो
रात अलसाई  है, कोई गीत गुनगुनाने  दो

गुंथी हुयी लट को खुलके बिखर जाने दो 
मन हुआ  सन्दली,  प्रीत संवर जाने दो

झीलो से उठा चन्दा होठो पे उतर आने दो
तुम पास में ठहरो, वक्त गुज़र जाने दो.

बुधवार, 29 अगस्त 2012

आदरणीय रवीन्द्र प्रभात जी से कुछ सवाल: तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन और इसके मायने

डिस्क्लैमर : इस पोस्ट का उद्द्येश्य किसी को ठेस पहुचाना नही वरन कुछ संशयो  का निराकरण करना है. साथ ही लेखक  अभी तक गुटनिरपेक्ष है.

बात निकली है तो फिर दूर तलक जायेगी. मुद्दे की बात है कि ये जो तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन हुआ इसके मायने और और जो इससे निष्कर्ष निकले उनकी प्रासंगिकता क्या है? 
मै बिन्दुवार चर्चा करने की कोशिश करूंगा...
1. इस सम्मेलन को अंतर्राष्ट्रीय दरज़ा कैसे मिला? उसके मानक क्या है?
2. इस समारोह के प्रायोजक और फंडिंग करने वाले कौन थे? सम्मान सूची मे शामिल कितने लोगो से समारोह के नाम पर सम्मान के नाम पर चन्दा लिया गया. इस कार्यक्रम मे जो खर्चे आये उनको  कब सार्वजनिक किया जायेगा  एवम उनके स्रोतो की जानकारी को कितने समय मे ब्लागजगत को दिया जायेगा?
3."परिकल्पना" वालो ने जो वोटिंग करायी थी उसे सार्वजनिक कब करेगे? दशक ब्लागर दम्पत्ति का उल्लेख उसमे कही नही था तो यह सम्मान क्या तुष्टीकरण के चलते जोडा गया?
4. यह प्रश्न व्यक्तिगत है जो कि श्री के के यादव जी  से है ...
यादव जी बाकी सब ठीक है किंतु एक  बात अखरती है वह है आप जैसे विद्वान पुरुष द्वारा अपने मुह मिया मिट्ठू बनने का किया जा रहा प्रयास. आप अपने फेसबुक से लेकर जितने आपके ब्लाग है आकान्क्षा जी एवम पाखी बिटिया के फेसबुक ब्लाग है सब पर खुद के "अप्रतिम" योगदानो का यशोगान करना शुरु कर देते है जो सुहाता नही. मै माटी हिन्दी पत्रिका का प्रबन्ध सम्पादक हू उसमे भी कुछ इस तरह के प्रसंग से दो चार हुआ था. रही बात मानद उपाधियो की तो वह किस आधार पर दी जाती है कुछ दिनो मे पता चल जायेगा क्तो कि हमने बल्क आर टी आई लगाई है ताकि सत्यता सामने आये लोगो के भ्रम का शमन हो. वैसे व्यक्तिगत मै आपके स्वभाव का प्रशंसक हू मेरी बातो से अगर तकलीफ हुयी हो तो क्षमाप्रार्थी हू.  आपके और आपके परिवार द्वार किये जा रहे साहित्य उन्न्यन का समाचार एक जगह से मिल जाय काफी है आजमग़ढ ब्लागरपर भी वही यदुकुल पर भी वही जबकि इन सबके माडरेटर आप ही है.
5. सार्वजनिक रूप से सम्मेलन मे अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है और पता नही किन -किन ब्लागरो के लिये "लम्पट" शब्द का प्रयोग किया गया क्या सम्मेलन एक मकसद लोगो को गाली दिलवाना था? क्या सुभाष राय पर मानहानि का मुकदमा नही दर्ज होना चाहिये?
6. छपास रोग के चलते  ब्लाग पर जो मैटर है उसे प्रिंट मीडिया मे देकर एक तरीके से ब्लाग लेखन के साथ अन्याय नही किया जा रहा है? इसके चलते लोगो से पैसे लेकर ब्लाग पर लिखी कविता कहानी को मैगजीन मे छापना या संग्रह निकाल कर खुद पैसा बनाना क्या ठीक पद्धति है? 
7. एक अति महत्वपूर्ण प्रश्न ब्लाग अकादमी के गठन के बारे मे.....
 ब्लाग लेखन साहित्य की  ही एक विधा है फरक यह है कि कागज कलम की जगह स्क्रीन और की बोर्ड का प्रयोग किया जाता है और जैसे पुस्तक को पढकर लोग चिट्ठी के द्वारा प्रतिक्रिया देते थे, यहा सीधे टीप देते है.
फिर अलग से ब्लाग अकादमी का गठन क्यो. साहित्य अकादमी जो कि मरने के कगार पर है उसे सही तरीके से चलवाने की बात क्यो नही और उसी साहित्य अकादमी के अंतर्गत ब्लाग लेखन की विधा को समृद्ध बनाने की पहल क्यो नही. क्या इसके द्वारा कुछ बडी महत्वाकाक्षाओ की पूर्ति की उम्मीद मे आयोजक थे या अब भी है?
उम्मीद है कि  सम्मेलन के सन्योजक आदरणीय रवीन्द्र प्रभात जी और ज़ाकिर जी इन प्रश्नो का निराकरण करके ब्लागजगत और मुझे सही तथ्यो से अवगत करायेगे.
प्रतीक्षा मे
डा. पवन कुमार मिश्र ,कानपुर्




शनिवार, 21 जुलाई 2012

सोनिया,राहुल की डिग्री,पासपोर्ट की जांच हो.


आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी जिस ढंग से हुयी है उससे एक बात तो साफ हो जाती है कि इसके पीछे सोनिया और देशघाती मंत्रिमण्डल समूह का ही हाथ है. जो सरकार अफज़ल को 10 साल से मेहमाननवाजी और कसाब को 5 साल से पाल पोस रही है उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह देशभक्तो को सहन कर लेगी. सोनिया की डिग्री फर्जी है क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की? सोनिया ने जो एफिट डेविट मे उल्लेख किया है वह सच नही है. यहा की सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय की डिग्री फर्ज़ी है पर कम्ब्रिज की नही. सोनिया के सामने सूचना आयोग भी कुछ नही कर सकता और एक देशभक्त जिसने आयुर्वेद् को विश्वस्तर पर पहुचाया उसको आनन फानन मे गिरफ्तार कर लिया जाता है. राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की पूरी तैयारी हो चुकी है पर क्य किसी को राहुल् की क्वालीफिकेशन के बारे मे पता है? जाहिर है कि उत्तर नही होगा. क्यो क्योकि वह पवित्र परिवार का वारिस है. इन तथाकथित गान्धियो के पासपोर्ट कभी चेक किये गये है? राबर्ट वाड्रा को कही भी चेक नही किया जा सकता (अभी एक सूचना अधिकार के तहत यह खुलासा हुआ है कि वाड्रा की तलासी कही भी नही हो सकती )क्यो? क्योकि वह राष्ट्रीय दामाद है.
आचार्य बालकृष्ण का अपराध क्या है? 64 हजार करोड डकारने वाला कलमाडी 1.75 लाख करोड डकारने वाला राजा 15 मंत्री इन सब पर सीबी आई कोई कार्यवाई क्यो नही करती? राजनीति को धन्धा बनाने वाले आज हमारे मालिक हो गये है. अगर आज भी हम सोये रहे, टीवी देखकर सरकार को कोसकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करते रहे तो आने वाली नसले हमे माफ नही करेगी. जो जहा है वह वही से सरकारी कुक़ृत्य के खिलाफ आवाज उठाये चाहे आप फेसबुक पर हो या नुक्कड की दुकान पर ट्रेन मे हो या तांग़े पर बोलिये चुप न रहिये लोगो को जगाईये. लोगो को देशी जयचन्दो और विदेशी अताताईयो के बारे मे बताये. देश मे हो रही लूट और अत्याचार के बारे मे जागरूक करे. आवाज बुलन्द करे. क्रूर और जिद्दी लुटेरो के खिलाफ हल्ला बोलिये
भारत माता की जय्

सोमवार, 2 जुलाई 2012

...तुम भी कही भीगती होगी:












सावन की सीली हवाएं 
जब तन से मेरे टकराती है,
तुम्हारे कोमल छुअन की यादें
मुझे  पुकार जाती है.

धुली और पनियल सडको से
काफी हाउस आना,
घुमड़ते कारे बादलो की
फुआरों में भीज जाना.

तुम्हारे बालो का गीलापन
मेरे कंधे पर होता था,
सारा रेगिस्तान मेरा
उस पल को गायब होता था.

तुम्हारे साथ बिताई हुयी
हर शाम याद आती है,
जिस बात पर हंसी थी तुम
वो बात याद आती है.

आगे सावन बरसे ना बरसे
लेकिन बारिश लम्बी होगी,
मेरी आँखों के बादल से
तुम भी कही भीगती होगी.



मंगलवार, 19 जून 2012

ज़िन्दगी एएम से पीएम के बीच झूल रही

         1
ठीक छह एएम पर 
अलार्म की आवाज के साथ 
उठ जाता हू रोजाना,
जागने की कोशिश करता हू 
अधमुन्दी आंखे ढूढ लेती है 
यंत्रवत  ब्रश मंजन और अखबार,
साढे आठ बजे दफ्तर रवाना 
नौ बजे अंगूठे वाली मशीन 
बोलती है थैंक यू.
दफ्तर मे और भी रोबोटिक लोग है
विशेष लक्षणो और गुणो वाले
हाथ मिलाते है,गुड्मार्निंग सर
हल्की हल्की बुदबुदाहट भी
अस्साला हरामी कही का... 
जून के महीने की गरमी 
आठ घंटे मे पसीने का 
रंग लाल कर देती है. 
बच जाती है खून की सफेदी 

         2 
घर पहुचते पहुचते 
छह पीएम बजते है.
टीवी पर महाबहस जारी है
चौरसिया ने सडे दात निपोरते हुये 
बहस की शुरुआत की 
शकील की रे रे और
मनीष की ओढी गम्भीरता
से बहस आगे बढती है फिर,
कुकुरकाट मे तब्दील हो जाती है
दफ्तरी फाईलो को निपटाते दस पीएम
किर्र र्रर्रर इनवर्टर बोल  रहा है 
बिजली नहीं, सेवा समाप्त
ज़िन्दगी एएम से पीएम के बीच झूल रही
         3
सारी रात गुजरती है रोटी दाल के जोड़ घटाने में 
एक  मुद्दत हो गयी है ख्वाबो में तुम्हे देखे हुए. 

शुक्रवार, 15 जून 2012

आग की नदी











जेठ की दुपहरी में 
बूँद बूँद पिघला सूरज 
आग की नदी
क्षितिज से उतर कर 
बहने लगी धरती पर 
दहकने लगे पलाश
अमलताश से आम  तक
जा पहुची पीली  ज्वालायें
आंवा हुए दुआर ओसार 
झौंस गए कुआं तलाव 
आग की नदी ने 
सोख लिया नमी 
हवाओं की, दिल की
अब चारों ओर
बंजर अंधड़ सांय सांय 
करता घूम रहा है 
किसी प्रेत की तरह 

बुधवार, 9 मई 2012

लो आज नारीवाद का अंतिम संस्कार किये देता हू

आज मै नारीवाद के अंतिम संस्कार के उपलक्ष मे समस्त नारीवादियो को पिंड प्रदान करता हू सभी (काकस्वरूप मे भी आ सकते है ) का आमंत्रण  है. वैतरणी के दर्शन और रौरव नरक से झटपट मुक्ति मिलेगी गऊदान का भी झंझट भी नही है.

तो अब मै मंतर मारना चालू करता हू.
नारीवादियो का ब्रम्हवाक्य... नारी पैदा नही होती बनायी जाती है. इस सूक्त की रचयिता को दूर से प्रणाम. सिमोन डि बोवार(फ्रांसीसी)  द्वारा कहित इसी सेंटेंस ने बमचक काट रखा है. पहले इसी को लत्ता करते है. ऐक्चुअली मे एक अपराधशास्त्री हुए थे लोम्ब्रोसो(इटली वाले). उन्होने अपराध करने का प्रारूपवादी सिद्धांत दिया था जिसके अनुसार शरीर की बनावट के आधार पर अपराधी की पहचान की जाती थी. इस सिद्धांत का खंडन दूसरे अपराधशास्त्री सदरर्लैंड(अमेरिका वाले) ने अपराध का समाजशास्त्रीय सिद्धांत दिया और एक वाक्य की रचना की अपराधी पैदा नही होते बनाये जाते है. अब सिमोन ने इस वाक्य को देखा दिमाग की बत्ती जली और तुरंत ब्रम्हवाक्य गढ दिया. सुधी पाठक दोनो वाक्य देखे तो स्पष्ट हो जायेगा कि चोट्टिन सिमोन ने सदरर्लैंड के वाक्य का अपराधी हटा कर नारी जोड दिया.  अब क्या था लहर चल गयी. पर सिमोन कही न कही लेडी मैक्बेथ ग्रंथि की शिकार हो गयी और जा गिरी ज्या पाल सार्त्र (ये भी फ्रांसीसी) की गोदी मे. कहानी खतम.

लेकिन साप के जाने के बाद असली कहानी लकीर पीटने वाले/वालियो की है. इन लकीरपिटवो से मै पूछना चाहता हू क्या नारी महज सामाजिक या सांस्कृतिक शब्द ही है. क्या यह जैविक नही है. उनके शरीर की बनावट और उसमे हार्मोंस का अलग अलग होना नारी और पुरुष होने के लिये जिम्मेदार नही है. पौरुष के लिये जिम्मेदार टेस्टोरान हारमोन   शरीर को कडा और टफ बनाता है आवाज भारी करता है. इसके विपरीत् एस्ट्रोजेन कोमलता और पतली आवाज के लिये जिम्मेदार है जो नारीत्व का निर्माण करता है.  मतलब नारी पैदा होती है.
नारीवाद का दूसरा और भयंकर दौर शुरु होता है केटी मिलर के अभ्युदय से. इन्होने अंत:वस्त्रो को नारीपरतंत्रता से जोडकर देखा और समस्त नारियो को अंत:वस्त्र मुक्त होने की सलाह दी खूब अंत:वस्त्रो की होलिया जली. लोगो ने जमकर लुत्फ लिया. इन्होने खुली बहस के लिये मरद जात को चुनौती दी. एक मेयर नाम के सज्जन ने चुनौती कबूल की और बहस शुरु हुयी.  नगर की सारी जनता इस बहस को सुनने के लिये आयी हुयी थी. खूब जवाबी कीर्तन हुआ. बातो बातो मे मेयर ने कहा चलिये ठीक है आप मरद से कम नही है मरदो से एक कदम आगे ही है. अब आप मेरा बलात्कार कर दीजिये. पिन ड्राप साईलेंस. केटी के ज्ञान चक्षु खुल गये  उनको बोध हो गया.और वह बिना बोले चली गयी. बाद मे केटी ने एक साधारण व्यक्ति से विवाह कर बाकी जीवन सुखपूर्वक बिताया. लेकिन लकीरपिटवे लकीर पीटते ही रहे.
ये दोनो उद्धरण मैने इसलिये दिया क्योकि इसी के आधार पर नारीवाद का ढोल पिटता है. बाकी यदि बात वंचनाओ की हो तो उसके अनेक आयाम है. स्वतंत्रता और परतंत्रता की सापेक्ष  परिभाषाये है. अगर औरत घर मे परतंत्र है तो वह द्फ्तर मे स्वतंत्र कैसे रह सकती है वहा भी बास की गुलामी करनी पडती है. जो फौजी सीमा  पर जान देता है क्या उसको जान देने के लिये ही पैसे मिलते है. मजाक बना के रख दिया है स्त्री स्वतंत्रता शब्द को. जब जो मन हो फेचकुरियाने लगे. अरे आदमी और औरत का सम्बन्ध ताला और चाभी जैसे है अगर ताला होने को समानता मान लिया जाय तो जीवन का कमरा कभी भी आबाद नही हो सकता.
मै फिर कहता हू कि मानव व्यवस्था मे ही जी सकता है. और सेक्स का नियमन व्यवस्था का पहला और सबसे महत्वपूर्ण आधार है. जो सेक्स पर नियमन नही चाहते उनके लिये भी एक जगह है जहा वो आराम से गुजर कर सकते है और वह जगह है रेड लाईट एरिया. जो भी आदमी औरत चाहे वहा रहे पर शर्त है कि वह कभी भी व्यवस्था मे जीने की बात नही करेगे. हद हो गयी. चित भी मेरी पट भी मेरी अंटा मेरे बाप का.
जीने का आधार सम्बन्ध है. आपके घर मे खूब पैसा लेकिन सम्बन्ध ख्रराब है तो आप सही जीवन नही जी पाते या कम पैसो मे सम्बन्धो के आधार पर सुखद जीवन जीते है. वो गाना है ना.. तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है. सम्बन्धपूर्वक जीवन मे वाकई कोई कमी नही रहती. औरत के आधार पर सबन्धो  का निर्माण होता है और उसी के आधार पर सरसता भी आती है औरत को इस बात पर फख्र होना चाहिये वह परिवार की धुरी है. किंतु नारी वादियो के चक्कर मे आज स्थिति बिगाड की ओर है. इसलिये मैने यह पिंड्दान प्रोग्राम का आयोजन किया है आप भी इसमे आहुति दीजिये. स्वाहा.
इति सिद्धम