मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

महीना दिसम्बर हुआ










कोहरे का घूंघट ,
हौले से उतार कर ।
चम्पई फूलों से ,
रूप का सिंगार कर ॥

अम्बर ने प्यार से   ,
धरती को जब छुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

धूप गुनगुनाने लगी ,
शीत मुस्कुराने लगी ।
मौसम की ये खुमारी ,
मन को अकुलाने लगी ॥

आग का मीठापन जब ,
गुड से भीना हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

हवायें हुयी संदली ,
चाँद हुआ शबनमी ।
मोरपंख सिमट गये ,
प्रीत हुयी रेशमी ।।

बातों-बातों मे जब ,
दिन कही गुम हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥