शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

भगत सिह की अध्यक्षता मे मेरा अभिभाषण

11 सितम्बर का दिन मेरे लिए अविस्मरणीय  रहा जब मैने ऐसे मंच से अपने विचार रखे जिसकी अध्यक्षता सरदार भगत सिंह  कर रहे  थे. मौक़ा था जनराज्य पार्टी द्वारा आयोजित  राष्ट्रीय अधिवेशन. यह मेरे जीवन का अद्भुत अवसर था जब मैं इस चिर युवा महापुरुष को जीवंत रूप में महसूस कर रहा था. 
अधिवेशन का मुख्य विषय भ्रष्टाचार पर अन्ना के आन्दोलन का प्रभाव  का आकलन था. उपस्थित वक्ताओं और श्रोताओं के बीच  मेरे इस बात को लेकर सहमति थी कि अन्ना के आन्दोलन से सरकार का कोइ पुर्जा हिला नहीं वरन भ्रष्टाचार को लेकर सत्ता धारी व विपक्ष में अभूतपूर्व एकता स्थापित हो गयी है. स्वामी रामदेव को डंडे के जोर से तो अन्ना को पुचकार कर, टीम में फूट डाल कर सरकार अपने मकसद में कामयाब होकर मूछों पर ताव देकर राज कर रही है.
अब अगला कदम क्या हो इस पर विचार विमर्श किया गया. मंत्रणा के पश्चात ये तय किया गया कि अब समय आ गया है जब  भगत सिंह और स्वामी विवेकानंद के   साथ वैचारिक साम्यता के आधार पर हम काम करे और राजनीती का रुख सकारात्मक दिशा में मोड़े. 
भ्रष्ट नेताओं की चुनौती स्वीकार करते हुए  यह तय किया गया कि हम राजनीति में सहभागिता करे.


नजर टेढ़ी जवानो की भिची जो मुट्ठिया हो फिर
भगत आजाद अशफाको  की रूहे झूम जाती है,
जय हिंद के जयघोष से उट्ठी सुनामी जो  
तमिलनाडु से लहरे जा हिमालय चूम आती है 
                                                       तेरे नगमे मेरे होठों पे कलमा के सरीखे है 
                                                      तेरे साए हूँ इस बात का अभिमान करता हूँ 
                                                      तेरी सुर्खी रहे कायम दो मुट्ठी राख से मेरी 
                                                      सलामे हिंद अपनी जान मै कुरबान करता हूँ 

....जय हिन्द