मंगलवार, 17 मई 2011

जेठ की दुपहरी में बूँद बूँद पिघला सूरज










जेठ की दुपहरी में
बूँद बूँद पिघला सूरज
आग की नदी
क्षितिज से उतर कर
बहने लगी धरती पर
दहकने लगे पलाश
अमलताश से आम  तक
जा पहुची पीली  ज्वालायें
आंवा हुए दुआर ओसार
झौंस गए कुआं तलाव
आग की नदी ने
सोख लिया नमी
हवाओं की, दिल की
अब चारों ओर
बंजर अंधड़ सांय सांय
करता घूम रहा है
किसी प्रेत की तरह