बुधवार, 4 मई 2011

जबकि रात अपने शवाब पर है.



 








नीली झील में
नहाकर चाँद
बरगद की शाखों पे
जाकर बैठ गया.

दिन भर की भागा दौड़ी
से थकी हुयी नदी
मीठी नींद  सो रही है.
रेत के बिछौने पर

अंगडाई लेती रात के
गेसू को कांपती
उँगलियों से बिखराती
सुलझाती हवाएं

धवल चांदनी को सोखते
बेला के फूल
और  झरते महुए
झूमते है गाते है  

तुम आयी  नही
अभी तक
जबकि रात अपने
शवाब पर है.