गुरुवार, 17 मार्च 2011

फागुन में धरती झूम रही है एक उदास शाम के जैसी








       


              1.
फागुन में धरती झूम रही है
मस्त नशे में घूम रही है
जग से छुपकर क्षितिज पार
नभ  के अधरों को चूम रही है.


टेसू ने ओढ़ाई  लाल चुन्दरिया
हल्दी रोली   से सजी गुजरिया  
अंग अंग हो गया बसन्ती
वैजन्ती मन में फूल रही है


हुलसित   मन तन  रंग रंगा
चंग ढोल संग बजा मंजीरा
चौताल  मचाया   हुरियारों ने   
दसों दिशा में   गूँज   रही  है.


              2.
इन  रंगों की बारिश लेकिन  
मुझ को  नही भिगो पाती  है
हर बार के जैसे ये होली
मुझे   बेरंगा करके जाती है

एक  उदास शाम के  जैसा  
जीवन  ढलता जाता  है
मै अब भी खोजता वह रस्ता  
जो मेरे गाँव को जाता है