शुक्रवार, 11 मार्च 2011

आओ बन फूलों की ओर













आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर
जहां  सुबह की लाली है
मादक मोहक सांझ ढली है

जीवन निःसार नहीं है
जीवन भार नही है
यह उत्सव है अभिशाप नही
नीरसता संताप नही

आओ चले जले धुए से
खिले हुए गजरे की ओर

धुला हुआ सारा आकाश है
खिली हुई यह धरती है
चन्द्र रश्मियाँ सदियों से
यौवन में अमृत भरती है  

कंक्रीटो की दीवारों से
आओ जरा प्रकृति की ओर

समा जाय इस स्नेहमयी में
जैसे पंछी नील गगन में
बच्चे माँ के आँचल में
धारा सागर के जल में

जैसे आती नरम हवायें 
पूरब से पच्छिम की और

आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर