बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

इक बार कहो ना मीत मेरे














इक बात चाहता हूँ सुनना
तुम जब जब बाते करती हो
इक बार कहो ना मीत मेरे
तुम मुझसे मुहब्बत करती हो


इस दिल को कैसे समझाऊ
लोगो को क्या मै बतलाऊ
है पूछ रहा ये जग सारा
कि तुम मेरी क्या लगती हो


इक नए विश्व कि रचना कर दू
और अंतहीन आकाश बना दूं
इक बार कांपते होठों से
तुम  कह दो मेरी धरती हो

बात जबां की दिल कहता है
मौन की भाषा को गुनता है
चाँद बता जाता है  तुम
सदियोंसे मुझ पर मरती हो


इक बार कहो ना मीत मेरे
तुम मुझसे मुहब्बत करती हो