शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

To Dr Anwar Jamal On अब बताईये कि आपको मेरी किस बात पर ऐतराज़ है ?


प्रिय जमाल जी
आपसे बात करने के बाद पाया कि आप वैसे तो बिलकुल नही है जैसे कि आप प्रोजेक्ट करते है. आपको जानने के लिए मैंने पुरानी पोस्टे पलटी तो पाया आप बेहद खूबसूरत खयालो वाले हिन्दोस्तानी है. फिर क्या वजह है जो लोग अनवर जमाल से हिचकिचाते है. कुछ खगालने क़ा प्रयास किया है. मेरा मोबाइल फोन ख़राब हो गया था. इससे पहले मैंने आपकी बाते ध्यान से सुनी और कई बातो (बल्कि यू कहे कि ९९ %) पर सहमत भी था. बस एक परसेंट क़ा अंतर है यह एक परसेंट क़ा अंतर ९९ % पर भारी  पड़ता है.
आपका कहना है कि आप हिन्दू मुस्लिम एकता(मानवीय एकता ) के हिमायती है.
इस बात से मै भी इत्तेफाक रखता हूँ.
लेकिन इसका आधार में आप डार्विन वाद में ढूढ़ते है.
आपका कथन है
१.सभी धर्मो के धरम ग्रन्थ मिलावटी है केवल कुरआन सही है .
२.दूसरी क़ौमों और मुसलमानों में जो बुनियादी अंतर है वह यह है कि दूसरी क़ौमों के पास वह ईशवाणी आज सुरक्षित नहीं है जो उनके ऋषियों के अंतःकरण पर अवतरित हुई थी लेकिन मुसलमानों के पास वह सुरक्षित है, न केवल उनके लिए वरन् सारी मानव जाति के लिए. इसी ईशवाणी पवित्र कुरआन में हिन्दुओं के ऋषियों का सच्चा चरित्र आज भी पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रहा है। इसी ईशवाणी पवित्र कुरआन में हिन्दुओं के ऋषियों का सच्चा चरित्र आज भी पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रहा है।
३. सनातन धरम क़ा लेटेस्ट वर्जन इसलाम को है.
४. आज दुनिया का कोई भी आदमी बिना कुरआन की मदद के अपने ऋषि से जुड़ ही नहीं सकता।
मुझे घुमाफिरा कर कहने की आदत नही आप सुनिए
१.ये धरम क़ा डार्विन वादी व्याख्या अंत में जीवन संघर्ष की ओर ले जाती है जहा योग्यतम ही जीवित रहता है. इस संघर्ष में नैतिकता समाप्त हो जाती है और जंगल राज लागू हो जाता है.
२. मै मानता हूँ कि सनातन धार्मिक साहित्य में क्षेपक आ गए है. किन्तु ये क्षेपक सभी सनातनी वैदिक धरम मर्मज्ञों को मालूम है और वे इन्हें समय समय पर शुद्धि करते रहते है. वैदिक परंपरा इस्लामिक परम्परा से तकरीबन ४००० वर्ष पुरानी है अतः प्रक्षेप जुड़ना अस्वाभाविक नही है.
३. गीता विशुद्ध रूप से सनातन, वैदिक ईश वाणी है जिसके आधार पर कोई भी व्याख्या तार्किक रूप से संभव है
४. आप घुमाफिरा कर एक ही बात कहना चाहते है कि सारे धरम अब शुद्ध नही सिवाय इसलाम के और इसलिए सभी को मुक्ति पाने के लिए सही धरम को अपनाना चाहिए. यहाँ आपका सीधा सीधा इशारा इसलाम कुबूलियत की तरफ होता है.
५.आपसे बात करते समय मैंने तुरंत कहा था कि आपकी आवाज बहुत अच्छी है लेकिन आप की लेखनी ऐसी नहीं. आप लिखते समय किसी भी टापिक क़ा छीछालेदर कर देते है. ऋषियों के बारे में या लूत के बारे में या जील के बारे में. एक उदहारण से समझाने की कोशिश करता हूँ. अगर किसी से पूछा जाय कि विवाह सम्बन्ध क्या होता है तो उत्तर मिलेगा घरेलू जीवन में प्रवेश की इकाई. विद्वान व्यक्ति इसी तरह लिखते और समझते है किन्तु क्या जरूरी है कि विवाह संबंधो की परिभाषा में मैथुनिक संबंधो को छिछियाते हुए बताये जाय जबकि इन्ही संबंधो के आधार पर विवाह टिका होता है. आशा करता हूँ आप मेरा मतलब समझ रहे होगे.
६.आपने अलबक़राः, 284 क़ा उदाहरण देकर बताया " हम उस (ईश्वर) के रसूलों (ऋषियों) में से किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।"
यहाँ आप खुद मिलावट कर रहे है ईश्वर या ऋषी आपकी अवाधारनाये है ना कि कुरआन या हदीस की. यह व्याख्या ओरिएन्तेद है. ये बात तो सही है कि ईश्वर भेदभाव नहीं करता लेकिन सिर्फ ऋषियों के संधर्भ में ही नही waran सम्पूर्ण प्राणिमात्र में. इस बात में कोई नई बात नहीं है किन्तु आप गलत चीज़  में सही बात फिट करने क़ा प्रयास करते है.
७. हिदुओ और अंग्रेजो की समस्या ही नही पूरे विश्व में यही समस्या है कि अपनी ढपली के सुर को बेहतरीन मानते है.
मुझे इस बात की अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि आपने माना कि हर धरम एक ही सत्य की बात करता है. फिर भेदभाव क्यू इसके उत्तर में मैंने पावर इक्सर्साइज की बात कही थी.
मुझे इस बात की अत्यधिक खुशी है कि आप एक नेक मुसलमान है और इसलाम की तन मन धन से सेवा कर रहे है लेकिन प्रिय अनवर जी मै एक परसेंट भी भेदभाव नही चाहता ये एक परसेंट भेद गुरील्ला और आदमी की प्रजाति के लिए जिम्मेदार है.
आप ज्ञानवान है कोई शक नही. किन्तु ज्ञान क़ा सही उपयोग कीजिये मानवता आपकी आभारी रहेगी.