मंगलवार, 15 नवंबर 2011

देह का मोह छोडे और इसे मानव कल्याण मे समर्पित करे.



कुछ समय पहले मै जब मृत्यु के बाद देह के बारे में सोचता था तो यह पाता था की जब जानवर मरते है तो उनके भी शरीर की कुछ न कुछ उपयोग मानव कल्याण में आ ही जाता है किन्तु  जब मानव मरता है तो उसके मरने पर ताम झाम के साथ उसे जला या दफना दिया जाता है. इस ताम झाम की कीमत मृतक के परिवार वालो को काफ़ी महगी भी पड़ती है. फिर मैंने सोचा की म्रत्यु के बाद इस नश्वर शरीर को इस तरह से मानव कल्याण में लगाया जाय . विचार आया की यदि मै मृत्योपरांत देहदान करू तो शायद  इससे बात बने . मैंने अपने मन की बात किरण से बतायी तो वह भी सहर्ष तैयार हो गयीं. अलबत्ता माँ ने विरोध किया किन्तु उन्हें किसी तरह से मना लिया. मैंने अपने संगठन अखिल भारतीय अधिकार संगठन के डॉ आलोक चांटीया जी से बात की और एक देहदान का कार्यक्रम तय हो गया. संयोग से उसी दिन ऐरो की ५ वी स्थापना दिवस भी था. और मृत्योपरांत  भी मानव कल्याण की मेरी साध को पूर्णता मिली
१२ नवम्बर को  सभा की अध्यक्षता  सी एस जे एम् मेडिकल कालेज के एनाटामी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ ए के श्रीवास्तव ने की. लखनऊ के गणमान्य नागरिक और पत्रकार  बंधुओ ने कार्यक्रम में शिरकत कर हमारे हौसलों में इजाफा किया.
इस अवसर पर ऐरो का झंडा रिंगटोन और एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया .

मै यहा एक अपील करता हू कि देह का मोह छोडे और इसे मानव कल्याण मे समर्पित करे. 


                                              दीप प्रज्ज्वलन, डॉ आलोक चांटीया, मै



शाम को डॉ जाकिर भाई के साथ अवध की सैर भी हुयी खास तौर पर नाका कोतवाली की चाय तो बहुत मजेदार थी. इस पूरी यात्रा में मेरे सारथी की भूमिका में मेरे सुहृदय राघवेन्द्रप्रताप जी थे.



5 टिप्‍पणियां:

Pallavi ने कहा…

आपकी बातों से सहमत हूँ यह काफी अच्छा विचार है आपका क्यूंकि कौन जाने किसकी मौत कैसे आनी है खैर जैसे भी आए मगर यदि देह दान से किसी का भला हो सके तो क्या बुराई है। अच्छा विचार समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Mubarak Ho

सुज्ञ ने कहा…

इस शुभ कर्म और कल्याण भावना को मेरा प्रणाम!!

शुभकामनाएं

ramji ने कहा…

दुनिया को नसीहत देने वाला कुछ नहीं कर पाता जबकि उसका स्वयं पालन करने वाला कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंच जाता है

Deepak Saini ने कहा…

प्रेरक पहल