शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

"उम्मीदवार कैसा हो जिसे हम निश्चित वोट देगे" .

कल एक मीटिंग के दौरान यह बात सामने आई की मतदाता मतदान के समय उम्मीदवार को भूल हवा के रुख के साथ अपना मत देता है.यह हवा मंडल कमंडल वादी, जातिवादी व्याक्तिमूलक या सत्ता विरोधी लहर जैसे स्रोतों से चलती है. निष्कर्ष यह है कि मतदाता मात्र साधन या माध्यम होकर रह जाता है. इस सन्दर्भ  में मैंने एक प्रयोग करने का निश्चय किया है. कानपुर की एक विधानसभा गोविन्द नगर मेरा अध्ययन क्षेत्र है. एक प्रश्नावली बना रहा हूँ  जो "उम्मीदवार कैसा हो जिसे हम निश्चित वोट देगे" के शीर्षक से है. इस प्रक्रिया में आपके सुझावों की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि  मेरा मानना है कि सीखने के क्रम में अनुभव बड़ा  काम आता है..अतः प्रश्नावली के प्रश्न कैसे हो अवगत कराईयेगा. समय सीमा २४ सितम्बर है.




शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

भगत सिह की अध्यक्षता मे मेरा अभिभाषण

11 सितम्बर का दिन मेरे लिए अविस्मरणीय  रहा जब मैने ऐसे मंच से अपने विचार रखे जिसकी अध्यक्षता सरदार भगत सिंह  कर रहे  थे. मौक़ा था जनराज्य पार्टी द्वारा आयोजित  राष्ट्रीय अधिवेशन. यह मेरे जीवन का अद्भुत अवसर था जब मैं इस चिर युवा महापुरुष को जीवंत रूप में महसूस कर रहा था. 
अधिवेशन का मुख्य विषय भ्रष्टाचार पर अन्ना के आन्दोलन का प्रभाव  का आकलन था. उपस्थित वक्ताओं और श्रोताओं के बीच  मेरे इस बात को लेकर सहमति थी कि अन्ना के आन्दोलन से सरकार का कोइ पुर्जा हिला नहीं वरन भ्रष्टाचार को लेकर सत्ता धारी व विपक्ष में अभूतपूर्व एकता स्थापित हो गयी है. स्वामी रामदेव को डंडे के जोर से तो अन्ना को पुचकार कर, टीम में फूट डाल कर सरकार अपने मकसद में कामयाब होकर मूछों पर ताव देकर राज कर रही है.
अब अगला कदम क्या हो इस पर विचार विमर्श किया गया. मंत्रणा के पश्चात ये तय किया गया कि अब समय आ गया है जब  भगत सिंह और स्वामी विवेकानंद के   साथ वैचारिक साम्यता के आधार पर हम काम करे और राजनीती का रुख सकारात्मक दिशा में मोड़े. 
भ्रष्ट नेताओं की चुनौती स्वीकार करते हुए  यह तय किया गया कि हम राजनीति में सहभागिता करे.


नजर टेढ़ी जवानो की भिची जो मुट्ठिया हो फिर
भगत आजाद अशफाको  की रूहे झूम जाती है,
जय हिंद के जयघोष से उट्ठी सुनामी जो  
तमिलनाडु से लहरे जा हिमालय चूम आती है 
                                                       तेरे नगमे मेरे होठों पे कलमा के सरीखे है 
                                                      तेरे साए हूँ इस बात का अभिमान करता हूँ 
                                                      तेरी सुर्खी रहे कायम दो मुट्ठी राख से मेरी 
                                                      सलामे हिंद अपनी जान मै कुरबान करता हूँ 

....जय हिन्द 



शनिवार, 10 सितंबर 2011

बरस बीते मौन के



लगभग ३ महीने बाद मुखातिब हुआ हूँ.इस दौरान काफी कुछ सीखने समझाने और अनुभव करने का अवसर प्राप्त हुआ. मैंने साइंस ब्लागर असोसिएशन पर कुछ वैज्ञानिक प्रयोगों की जानकारी दी है.  विगत तीन महीने मेरे जीवन मे अहम रहे .आप लोगो से आगे मै शेयर करूंगा 
अभी आप मेरी पुरानी कविता का आनंद लीजिये 







झुरमुटों से छन के आयी
किरन आसमान से
बांसुरी बोल पड़ी
स्वागत मेहमान के

गुंजर बिहस उठे
आख़िरी पहर में
महक उठी रातरानी
मुग्ध स्वर बिहान के

पांखुरी चटकने लगी
मेरे उपवन के
अंखुवे निकले फिर
पतझारे बन के

सुधिया मुसकराने लगी
बीत गयी रैन के
डोली धरती और
बरस बीते मौन के