मंगलवार, 17 मई 2011

जेठ की दुपहरी में बूँद बूँद पिघला सूरज










जेठ की दुपहरी में
बूँद बूँद पिघला सूरज
आग की नदी
क्षितिज से उतर कर
बहने लगी धरती पर
दहकने लगे पलाश
अमलताश से आम  तक
जा पहुची पीली  ज्वालायें
आंवा हुए दुआर ओसार
झौंस गए कुआं तलाव
आग की नदी ने
सोख लिया नमी
हवाओं की, दिल की
अब चारों ओर
बंजर अंधड़ सांय सांय
करता घूम रहा है
किसी प्रेत की तरह









20 टिप्‍पणियां:

यस चंचल ने कहा…

सबको गर्मी परेशां की तो उससे कोई शिकवा शिकायत कोई न कर पाया लेकिन गर्मी से आपके शिकायत का ये अंदाज बहुत अच्छा लगा
बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति ..............

एस.एम.मासूम ने कहा…

अभी मैं जौनपुर से लौटा हूँ और भाई इस गर्मी को झेल के आ रहा हूँ.

Dr Kiran Mishra ने कहा…

the river of fire
ab to 100 degree ke par ki feeling hone lagi

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Nice poem.

Neel Shukla ने कहा…

This is fabulous....m going to Guwahati can feel there new one trade of atmosphere/......

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

भयंकर गर्मी का बेहतरीन शब्दचित्र.

सादर

वन्दना ने कहा…

इस गर्मी का जीवन्त चित्रण कर दिया।

ashish ने कहा…

बहुत गर्मी है जी . झुलसाये जा रही है . बढ़िया लिखा है .

ZEAL ने कहा…

जेठ की दुपहरी में
बूँद बूँद पिघला सूरज ...

Lovely lines !

.

Voice of youths ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति

अनूप शुक्ल ने कहा…

आजै तो पानी बरसा है भाई!

: केवल राम : ने कहा…

गर्मी का जीवंत चित्रण किया है आपने इस कविता में ....बहुत सुंदर तरीके से ..शिकायत का अंदाज पसंद आया ...शुक्रिया

SURYABHAN CHAUDHARY ने कहा…

बंजर अंधड़ सांय सांय
करता घूम रहा है
किसी प्रेत की तरह
wakai
bhayankar garmi ka live telecast

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

गर्मी को स्टोर करने का मन बना रहे है अगली सर्दी के लिए

chirag ने कहा…

nice poem
really like it


mere blog par bhi aaiyega...
http://iamhereonlyforu.blogspot.com/

सुज्ञ ने कहा…

वातानुकूलित कक्ष में आपने उष्णता को महसुस करवा दिया।

दहकने लगे पलाश
अमलताश से आम तक
जा पहुची पीली ज्वालायें
आंवा हुए दुआर ओसार
झौंस गए कुआं तलाव

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छा चित्रगीत!
"चल रहा सन-सन पवन तन से पसीना ढल रहा"

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

गर्मी की विभीषिका से खेत-खलिहान, इन्सानों व पशुओं की परेशानियों का जीवन्त चित्रण अपने शब्दों व चित्रों से । लू लगने की समस्या से दो दिन तक मैं भी परेशान रहकर आज ही अपने कम्प्यूटर पर आ पाया हूँ । आभार सहित...

बेनामी ने कहा…

लखनऊ में भी यही हाल है।

---------
हंसते रहो भाई, हंसाने वाला आ गया।
ध्‍वस्‍त हो गयी प्‍यार की परिभाषा!

Surendrashukla" Bhramar" ने कहा…

प्रो पवन मिश्र जी जेठ की दुपहरी गर्मी का सुन्दर वर्णन मन को छू गया सुन्दर छवि
क्षितिज से उतर कर
बहने लगी धरती पर
दहकने लगे पलाश
अमलताश से आम तक

क्षितिज से नहीं पवन जी - गगन से उतर कर बहने लगी धरती पर
शुक्ल भ्रमर ५