बुधवार, 4 मई 2011

जबकि रात अपने शवाब पर है.



 








नीली झील में
नहाकर चाँद
बरगद की शाखों पे
जाकर बैठ गया.

दिन भर की भागा दौड़ी
से थकी हुयी नदी
मीठी नींद  सो रही है.
रेत के बिछौने पर

अंगडाई लेती रात के
गेसू को कांपती
उँगलियों से बिखराती
सुलझाती हवाएं

धवल चांदनी को सोखते
बेला के फूल
और  झरते महुए
झूमते है गाते है  

तुम आयी  नही
अभी तक
जबकि रात अपने
शवाब पर है.

















20 टिप्‍पणियां:

Ravindra Nath ने कहा…

sundar kavita, par isme koi nai baat nahi, aap to hamesha hi sundar kruti dete hain.
धवल चांदनी को सोखते
बेला के फूल
kahan se dhoodh late hain.

यस चंचल ने कहा…

वैसे तस्वीर गजब की है
बहुत खुबसूरत

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है सर!

सादर

Voice of youths ने कहा…

रोमांटिक कविता, बढियां है|

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत दु:खदायी होता है ये ज़ालिम इन्‍तज़ार...

Sunil Kumar ने कहा…

रात का शवाव पे होना और इंतजार !अब तो यही कहना पड़ेगा " मरने बाद भी मेरी आँखें खुली रही यह मेरे इंतजार की हद थी "
खुबसूरत अहसास ,बधाई

अनूप शुक्ल ने कहा…

क्या पता वो आई पी एक मैच देख रही हो!

ehsas ने कहा…

कविता की सुदंरता को चित्र ने और भी खुबसुरत कर दिया है।

गोविन्द नारायण "शांडिल्य " ने कहा…

sundar rachna

ashish ने कहा…

सुँदर अभिनव प्रयोग और मदमाती कविता . झरने की रवानी की तरह .

मनोज कुमार ने कहा…

तुम आई नहीं कि सारी रात शबाब पर है ...
वाह .... क्या बात है! सुंदर भावाभिव्यक्ति!

Dr Kiran Mishra ने कहा…

लो आ गयी ................................................

एस.एम.मासूम ने कहा…
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एस.एम.मासूम ने कहा…

दिन भर की भागा दौड़ी
से थकी हुयी नदी
मीठी नींद सो रही है.
रेत के बिछौने पर

बहुत सुंदर
.
तसव्वुर मैं बेहतरीन तस्वीर उभर आई इन पंक्तियों को पढ़ कर

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Pawan bhai, yr raat kuchh jyada lanbeekhinch rahi hai, ab to siiraj nikalna chahiye.

............
तीन भूत और चार चुड़ैलें।!
14 सप्ताह का हो गया ब्लॉग समीक्षा कॉलम।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह!
कुछ न पूछिये तसव्वुर के मजे..

Amrita Tanmay ने कहा…

भावों में बहा ले जाती हैं ये पंक्तियाँ..
कितनी प्यारी कविता.. बहुत खुबसूरत

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत सुंदर

shikha varshney ने कहा…

वाह गज़ब का खूबसूरत शब्द चित्र खींचा है.

ramji ने कहा…

सागर प्रेम रसरंग का - कूदो
और गोते खाओ - पछताओगे
तैर के किनारे पे मत जाओ
मेरा एक साथी हैं बड़ा ही भोला भाला है
मिले न उस जैसा वो जग से निराला है
मुश्किल है बहूत - किसी की
खातिर जागना अब यार - चलो सो जाएँ -
शायद आज वही- आपके सपनो में आयें ...!!