मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

डोली धरती और बरस बीते मौन के











झुरमुटों से छन के आयी
किरन आसमान से
बांसुरी बोल पड़ी
स्वागत मेहमान के

गुंजर बिहस उठे
आख़िरी पहर में
महक उठी रातरानी
मुग्ध स्वर बिहान के

पांखुरी चटकने लगी
मेरे उपवन के
अंखुवे निकले फिर
पतझारे बन के

सुधिया मुसकराने लगी
बीत गयी रैन के
डोली धरती और
बरस बीते मौन के









11 टिप्‍पणियां:

Voice of youths ने कहा…

Meri samajh se thoda bahar ho gaya...honestly!

Kavita Prasad ने कहा…

Pic is nice and poem is sweet...

ashish ने कहा…

सुँदर भव प्रवण कविता .

ramji ने कहा…

बरसों मेरे मेघ ....खेत देख देख

कहीं मटियार दोमट ....कहीं है रेख....

यस चंचल ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता

Shah Nawaz ने कहा…

सुन्दर कविता है... कुछ कठिन शब्दों के अर्थ भी लिख देते तो समझना आसान होता.

Deepak Saini ने कहा…

बहुत खूब

PRO. PAWAN K MISHRA ने कहा…

गुंजर-भ्रमर
बिहान-प्रातःकाल

PRO. PAWAN K MISHRA ने कहा…

धन्यवाद शाहनवाज़ भाई
गुंजर शब्द का प्रयोग मैंने भ्रमर के अर्थ में किया है इससे पहले ये शब्द भ्रमर का पर्याय था की नही मुझे नही मालूम पर भ्रमर के गुंजन से मैंने ये शब्द गढ़ा उम्मीद है आप सब को पसंद आएगा

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत सुंदर। हार्दिक बधाई।

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भगवान के अवतारों से बचिए...
जीवन के निचोड़ से बनते हैं फ़लसफे़।

Riteshhhh... Blogs... ने कहा…

dhanyawaad itni uttam kavita ke liye.