सोमवार, 21 मार्च 2011

तरुनाई का प्यार मुझे फिर याद आया.










अरसे  से गुम   मौसम
 फिर वापस आया
 तरुनाई का प्यार
 मुझे फिर याद आया.

बीते पल के तहखाने में 
रखा हुआ  बक्सा खोला
टूटी पेन सूखे दावात
और  फटा बस्ता खोला


एक मुड़े कागज में
तेरा नाम लिखा पाया

कुछ कटी पंक्तियाँ गानों की
अंतिम पन्ने पर
एक कहानी  झलक रही 
स्याही के धुंधले  धब्बे पर 

सूखे गुलाब की पंखुड़ियों में
तेरा अक्स उभर आया  

आँखों से  तकरार और
फिर एक  कोमल मनुहार 
भोली बातों में खिलता था 
छहों दिनों का प्यार 

 वो दुखदायी रविवार
मुझे फिर याद आया

तरुनाई का प्यार
मुझे फिर याद आया.

  









26 टिप्‍पणियां:

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना है.

एस.एम.मासूम ने कहा…

आँखों से तकरार
मुझे फिर याद आया
प्यार भरा मनुहार
मुझे फिर याद आया
.
बढ़िया रचना है..

किलर झपाटा ने कहा…

आह !!

ashish ने कहा…

पीछे मुड के देखना कई बार दुःख देता है . बक्से में नवीन स्मृतिया सजोंते रहो . सुन्दर कविता .

Abhinav Chaurey ने कहा…

wah pwan ji fir se ek behtareen kavita. ise padhkar mukje famous "Gloomy sunday" kavita ki yaad aa gai.

mridula pradhan ने कहा…

sundar bhawnaon se bhari ek bahut khoobsurat kavita.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत खूब। वैसे भी इन यादों को मिटने नहीं देना चाहिए।

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

दुखदायी रविवार
मुझे फिर याद आया
सुन्दर भाव एवं शब्द संयोजन

Riteshhhh... Blogs... ने कहा…

बीते पल के तहखाने में
रखा हुआ बक्सा खोला
टूटी पेन सूखे दावात
और फटा बस्ता खोला!!!

bahut badhiyaa!!!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

वैसे एक बात और कहना चाहूँगा, उस याद का यदि फोटो भी साथ में होता, तो सचमुच फोटो में चार चॉंद लग जाते।

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं।
ब्‍लॉगवाणी: अपने सुझाव अवश्‍य बताएं।

DEVESHWAR AGGRAWAL ने कहा…

याद आया वो नटखटपन
जब इस कविता को मैंने पढ़ा
आँखों में ललक चेहरे पर चमक
दिल में यादों का तूफ़ान उठा


अरसे से गुम वो मौसम
फिर वापस आया तरुनाई का प्यार
मुझे फिर याद आया.

Dr Kiran ने कहा…

आप की कविता हमेशा दिल को छु जाती है योवन की यादें आती रहनी चाहिए मन में गुदगुदी बनी रहती है इससे जीवन नीरस नहीं होता है

Ravindra Nath ने कहा…

तरुणाई का प्यार - याद आना भी दुःखदायी और भूलना भी

हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…

बहुत अच्छे भाव संमेटे हैं गीत में। लेकिन तकरार तो स्त्रीलिंग है मित्र, और आपने पुल्लिंग में प्रयोग किया है। अतः गीत संशोधन चाहता है।

शुभकामना सहित,

आचार्य परशुराम राय ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना है। पर च्युतसंस्कारत्व दोष के कारण थोड़ा अटपटापन आ गया है, जिसकी ओर श्री हरीश जी ने संकेत किया है। यह दोष नित्य दोष कहलाता है। अतएव इससे सदा बचना चाहिए। कृपया अन्यथा न लें। आभार।

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

हरीश जी और परसुराम जी आप का आभारी हूँ कि आपने मुझे इतना समय दिया किन्तु जहा तक संसोधन की बात है तो तकरार शब्द स्त्रीलिंग है इसमें कोई संदेह नही है लेकिन इसका प्रयोग स्त्रीलिंग के ही सन्दर्भ में किया गया है
आँखों से तकरार
मुझे फिर याद आया
प्यार भरा मनुहार
मुझे फिर याद आया


तकरार शब्द का प्रयोग मैंने "उसके" लिए किया है कृपया भाव एवं शब्दों को यथावत स्थापित कर व्याख्या करे
आप विद्वान द्वय का पुनः आभार

एस.एम.मासूम ने कहा…

तकरार पे तकरार
और उसपे इनकार
स्त्रीलिंग और पुल्लिंग पे व्यापार
कहां चला गया सारा प्यार
तकरार ख़त्म करो
आज प्यार ले के उधार

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

@आँखों से तकरार
मुझे फिर याद आया
प्यार भरा मनुहार
मुझे फिर याद आया.
-- इस प्रसंग में विद्वान-द्वय की बात सही है कि तकरार के साथ स्त्रीलिंग-संवेदी वाक्य-विन्यास धार्य है।

यहीं पर एक चूक और हुई है, जिसपर विद्वान-द्वय का ध्यान न जाना भी उतनी ही बड़ी चूक है क्योंकि शास्त्रीय पद में दोष-निरूपण करते हुए अति निकट की उससे भी बड़ी गलती न देखना कम अनुचित नहीं।

“मनुहार” शब्द स्वयमेव स्त्रीलिंग संग्या शब्द है। आपने लिखा है - “ प्यार भरा मनुअहार ” । इस दृष्टि से सही यह होगा - ” प्यार भरी मनुहार ” । अगर ला सकें तो इसी अनुसार याद “आयेगी” । :)

कविता ठीक है, जो दोष है वह परिमार्जनीय है। भाव इतने मोहक हैं कि सहज इस तरफ किसी का ध्यान न जाय। बेहतर लेखन की शुभकामनाओं के साथ..!

ashish ने कहा…

कविता में तकनीकी कमियों के बारे में आचार्यवर लोग अपनी अपनी बाते कर रहे है . काफी कुछ सिखने को मिलेगा हमारे जैसे काव्य शास्त्र अनभिग्य को . वैसे भाव तो स्पष्ट थे जो कविता की आत्मा होते है

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

@वैसे भाव तो स्पष्ट थे जो कविता की आत्मा होते है|
-- इस विशिष्ट दिव्यात्मा की सबने तारीफ़ ही की है। मैने भी तो कहा है , पुनः विचारें - ” भाव इतने मोहक हैं कि सहज इस तरफ किसी का ध्यान न जाय। ”

मुझे लगता है भावों की इतनी तारीफ़ कम नहीं है, पर यदि तारीफ़ में फेंचकुर फेंकना ’आत्म’ को देखना है तो आपसे मतभेद है। इस प्रक्रिया में आत्मा मरती अवश्य है, उम्मीद है कि इस संबन्ध में आप अपने तीक्ष्ण ब्लागानुभव के जरिये अभीष्ट उदाहरण खोज सकेंगे।

सायास या अनायास “तकनीकी कमियों” कहकर ऐसा न जाहिर करें कि इस संदर्भ में हमारे द्वारा छीनी-रुखानी चलाने का नीरस कार्य किया गया हो, वह भी कविता जैसी कोमल विधा के साथ ! इसे स्नेहिल क्रिया मानिये जिससे अभिव्यक्ति और भी युक्तिपूर्ण और पुख्ता ही होती है।

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर भावाभिव्यक्ति।

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

आदरणीय आशीष जी एवं प्रिय अमरेन्द्र जी भाषागत त्रुटियों को नज़रअंदाज करने वाले भावों का समर्थन करने के लिए शुक्रिया मै सीखने में यकीन रखता हूँ और मेरा मानना है कि ज्ञान किसी से कही से भी मिले ग्रहण कर लेना चाहिए
हरीश जी संशोधित गीत सामने है साथ में मै भी पुनः आप सभी का आभार मै डॉ कुमार विश्वास नही बनना चाहता आशा है कि आप सभी का मार्गदर्शन भविष्य में भी मिलता रहेगा

Dr.Rajesh Vishnoi ने कहा…

nostaligik
aah

suryabhan ने कहा…

आशीष जी से सहमत
वैसे यहाँ पर परपंच न किया जाय तो सही है छिद्रान्वेषी लोगो से अनुरोध है कि ऐसे तमाम ब्लाग है जहा वह अपनी कला का प्रदर्शन कर सकते है जैसे .... बताने की जरूरत नही
कविता कमाल की है

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

हाँ तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे ......
हाँ तुम मुझे .................

सारा सच ने कहा…

nice