रविवार, 13 मार्च 2011

...मुझमे तब कविता रचती है









रात रात भर महुए जब
धरती पर रस बरसाते है
फगुनाहट की मस्ती से 
गाँव गिराँव  हुलसाते  है
             
                 खेतों  में मधुगीत बसे जब
                 आँखे सपने बुना करती है
                मुझमे तब कविता  रचती है

दूर क्षितिज के आँगन से
एक राह निकलती दिखती है
नदी पहाड़  जंगल चलकर
मुझसे  होकर   जाती  है
                
                     कितने मिलते  कितने बिछड़े
                     सुधियाँ मन पुलकित करती है
                     मुझमे तब कविता रचती है

होठो पे  एक मुस्कान मिले
ज्ञान को जहा मान मिले
 मानवता विकसित होती हो 
ममता करुणा की  छाव तले
                        
                             योगी और निरोगी हो सब 
                             अभिलाषा  मन में उठती है
                             मुझमे तब कविता रचती है

बरसे चंदा की धवल धारा
नदियों का  आँचल भर जाए
लदे फदे तरु खिले पुष्प हो
मस्त कबीरा मौज में गाये
                           
                              पायल रुनझुन बंशी की धुन
                               ह्रदय में अमृत  भरती है
                               मुझमे तब कविता रचती है


                            




          

23 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Sachmuch, aise hi rachti hai kavita.
---------
पैरों तले जमीन खिसक जाए!
क्या इससे मर्दानगी कम हो जाती है ?

Tarkeshwar Giri ने कहा…

मजेदार और मौसमी रस हैं

Dr Kiran ने कहा…

आप एक तकनीकी संशन में रहकर इतनी प्राकृतिक रचना कैसे कर लेते है
सारी रचनाओं में प्रकृति तत्व के दर्शन होते है

एस.एम.मासूम ने कहा…

पायल रुनझुन बंशी की धुन ह्रदय में अमृत भरती है
.
बहुत खूब भाई क्या फागुन का मज़ा ले रहे हैं

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत ही रस और भावमयी सुन्दर प्रस्तुति जो अपने साथ भावों के समंदर में बहा ले जाती है.

Rajey Sha राजे_शा ने कहा…

Life tabhi hai jab kavita rachay....

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

Ravindra Nath ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता।

इस कविता मे जिस प्रकार से घटनाओं को उकेरा गया है वह हमारे (एक आम जन के) मनः स्थिति से बिल्कुल मिलता जुलता है। हम अपने भूत के अच्छाईंयों को याद कर के खुश होते हैं (प्रारंभ के चार पद) अपनी वर्तमान दुरावस्था से व्यथित एवं रोष से भरे हुए (तदंतर दो पद) और सुखद भविष्य की कल्पना मे गतिमान (अंतिम चार पद)।

हृदय को छू लेने वाली रचना।

Ravindra Nath ने कहा…

डॉ किरन के द्वारा पू्छे गये प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा मुझे भी है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

होठो पे एक मुस्कान मिले
ज्ञान को जहा मान मिले
मानवता विकसित होती हो
ममता करुणा की छाव तले ...

भाव और मौसम के सुनहरे पलों में लिखी हुई रचना है ... बहुत लाजवाब ...

ashish ने कहा…

सुन्दर भाव , सुन्दर शब्द , सुन्दर समय पर सुन्दरता से रची गई कविता . किरन जी का जबाब दे दो , हमकोई पूछेगा तो रेडीमेड होगा जबाब अपने पास .

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

बरसे चंदा की धवल धारा
नदियों का आँचल भर जाए
लदे फदे तरु खिले पुष्प हो
मस्त कबीरा मौज में गाये
मजा आ गया जी पढ़कर.....

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

राबर्ट ब्रिगेस के एक कविता है जिसमे कवि बुलबुलों से उनके मीठे गान का कारण पूछता है तो बुलबुलें उत्तर देती है

BEAUTIFUL must be the mountains whence ye come,
And bright in the fruitful valleys the streams, wherefrom
Ye learn your song:
Where are those starry woods? O might I wander there,
Among the flowers, which in that heavenly air 5
Bloom the year long!

Nay, barren are those mountains and spent the streams:
Our song is the voice of desire, that haunts our dreams,
A throe of the heart,
Whose pining visions dim, forbidden hopes profound, 10
No dying cadence nor long sigh can sound,
For all our art.

Alone, aloud in the raptured ear of men
We pour our dark nocturnal secret; and then,
As night is withdrawn 15
From these sweet-springing meads and bursting boughs of May,
Dream, while the innumerable choir of day
Welcome the dawn.
इसका भावार्थ है कि हम बंजर प्रदेश से है जो हरियाली की तलाश में हरे भरे गीत गाती है
स्काईलार्क में कवि कहता है कि हमारे मधुरतम गीत दुखभरे भावों से निकलते है
यही बात मुझ पर भी लागू होती है
उम्मीद करता हूँ किरण भाई रवींद्र और भाई आशीष जी मुझसे सहमत होंगे
--

यस चंचल ने कहा…

वैसे राबर्ट ब्रिगेस की ये कविता हमने पिछले सत्र कक्षा १२ में पढ़ा था
बहुत कमाल की प्रस्तुति पढ़ कर मन खुश हुआ और वो महुआ का बगीचा याद आया जहाँ बचपन में खेला करते थे

अनूप शुक्ल ने कहा…

डा.किरण, आशीष राय के सवाल के जबाब पढ़ने के बाद अब क्या रहा कहने को- सिर्फ़ यही न कि बहुत सुन्दर रचना! :)

आलोकिता ने कहा…

जब कविता कोई मन को भाए
शब्द शब्द दिल में उतर जाये
मुझसे तब टिपण्णी बनती है

हहहहहहः अच्छा लगा पढना सर

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही रस और भावमयी सुन्दर प्रस्तुति| धन्यवाद|

Abhinav Chaurey ने कहा…

वाह पुनः सुंदर एवं सरल रचना। आपने अपनी काव्य रचना के प्रेरणा स्त्रोत बहुत ही सुंदर प्रकार से अभिव्यक्त किए हैं। युवा पीढ़ी को इस तरह कविता रचते देख बहुत सुकून मिलता है। अधिकतर युवा नीरस होते हैं मेरी तरह :-(

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

भाई अभिनव आप तो रसस्रोत है
ऐसा कहना आपका बड़प्पन है

"पलाश" ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
suryabhan ने कहा…

these lines remind me those english lack district poet like wordsworth shelly coleridge because their poems illustrate pastoral life of innocent shepherds

Riteshhhh... Blogs... ने कहा…

sundar rachana!!