शुक्रवार, 11 मार्च 2011

आओ बन फूलों की ओर













आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर
जहां  सुबह की लाली है
मादक मोहक सांझ ढली है

जीवन निःसार नहीं है
जीवन भार नही है
यह उत्सव है अभिशाप नही
नीरसता संताप नही

आओ चले जले धुए से
खिले हुए गजरे की ओर

धुला हुआ सारा आकाश है
खिली हुई यह धरती है
चन्द्र रश्मियाँ सदियों से
यौवन में अमृत भरती है  

कंक्रीटो की दीवारों से
आओ जरा प्रकृति की ओर

समा जाय इस स्नेहमयी में
जैसे पंछी नील गगन में
बच्चे माँ के आँचल में
धारा सागर के जल में

जैसे आती नरम हवायें 
पूरब से पच्छिम की और

आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर



15 टिप्‍पणियां:

Ravindra Nath ने कहा…

सुन्दर रचना, हमे यह सिखाती है कि प्रकृति की क्या अहमियत है हमारे जीवन मे, सच प्रकृति ही हमे मशीन से आदमी बना सकती है वापस इसलिए "आओ बन फूलों की ओर सावन के झूलों की ओर"

गिरिजेश कुमार ने कहा…

"जीवन निःसार नहीं हैजीवन भार नही हैयह उत्सव है अभिशाप नहीनीरसता संताप नही"
बेहतरीन पंक्ति लिखी है| सुन्दर रचना

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

prakrati ke kareeb le jati kavita.

Badhayi.

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पैरों तले जमीन खिसक जाए!
क्या इससे मर्दानगी कम हो जाती है ?

यस चंचल ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना

ashish ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ashish ने कहा…

धरा को कंक्रीट जंगल में बदलने से रोकने उत्साहित करती रचना . खूबसूरत शब्दों में प्रकृति के करीब आने का आवाहन .

Kailash C Sharma ने कहा…

जीवन निःसार नहीं है
जीवन भार नही है
यह उत्सव है अभिशाप नही
नीरसता संताप नही
..
बहुत सार्थक सोच..सुन्दर भावमयी प्रस्तुति..

Sunil Kumar ने कहा…

जीवन निःसार नहीं है
जीवन भार नही है
यह उत्सव है अभिशाप नही
नीरसता संताप नही
सुन्दर भावमयी प्रस्तुति.

सतीश सक्सेना ने कहा…

वाह वाह ....
इस रचना की सरलता दिल को छूने में कामयाब है ! शुभकामनायें आपको !!

"पलाश" ने कहा…

प्रकृति के निकट रहे बिना हमारा जीवन कुछ भी नही ।
आपका प्रकृति प्रेम इस रचना मे बहुत सहजता से महसूस किया जा सकता है ।

Abhinav Chaurey ने कहा…

बहुत सुंदर रचना। मुझे मेरे गाँव की याद आ गयी। "कांक्रीट" शब्द कविता में थोड़ा कठोर लगता है सुनने में। यदि हम कंक्रीट के स्थान पर "पत्थर" उपयोग में ला सकते हैं।

suryabhan ने कहा…

कृत्रिमता से प्रकृति कीतरफ ले जाती सुन्दर रचना

Dr Kiran ने कहा…

aise to duniya ki har cheez pyari hai par aapki kawita sabse nyari hai

निर्मला कपिला ने कहा…

आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर
प्रकृ्ति के रंग हमे जीना सिखाते हैं। सुन्दर कविता के लिये बधाई।

अमित शर्मा ने कहा…

कंक्रीटो की दीवारों से
आओ जरा प्रकृति की ओर

लौटना ही पडेगा प्रकृति की और, नहीं तो सिर्फ प्रकृति से शेष रह जायेगी

सुन्दर रचना !