सोमवार, 7 मार्च 2011

कुछ बच्चे है इस दुनिया में जो रात में भूखे रोते है















जिनके उपभोगसे होता है
धरती का तापीय परिवर्तन
कभी नहीं जो सो सकते है
बिना किये वातानुकूलन

मोटे गद्दों पर  सोने वालों
क्या कभी जान पाओगे
कुछ लोग भी है इस दुनियामे
जो फुटपाथों पर सोते है

सूखे के इस मौसम में
आँखों का पानी भी सूखा
कुआ ताल नदिया सब  सूखी  
गले के संग ह्रदय भी सूखा

मिनरल वाटर को पीने वालों
क्या कभी जान पाओगे
कुछ लोग भी है इस दुनिया में
दो बूँद को रोज़ तरसते है

नन्ही जर्जर काया जब
रोटी के लिए बिलखती है
उन बच्चों की माताओं की 
सूखी छाती फटती है

भारत निर्माण के निर्माताओं
क्या कभी जान पाओगे
कुछ बच्चे है इस दुनिया में
जो रात में भूखे रोते  है

11 टिप्‍पणियां:

यस चंचल ने कहा…

आज के देश के कर्णधार के बारे में न पूछिये उनकी नीति है 'आप भला तो जग भला' तो वो दुनिया के दर्द को कहाँ समझने वाले हैं
आज के भ्रष्ट नेताओं की सोच कुछ इस तरह है
"नीति ऐसी नेता ने अपना लिया अपने लिए
बेच देंगे इस जहाँ को सदा- सदा के लिए"
बहुत खूबसूरत

Deepak Saini ने कहा…

नन्ही जर्जर काया जब
रोटी के लिए बिलखती है
उन बच्चों की माताओं की
सूखी छाती फटती है

सारा दर्द इन पक्तियों मे सिमट आया है
सार्थक लेखन के लिए आभार

एस.एम.मासूम ने कहा…

भारत निर्माण के निर्माताओं
क्या कभी जान पाओगे
कुछ बच्चे है इस दुनिया में
जो रात में भूखे रोते है
.
विचारणीय लेकिन भरा पेट इंसान इस तरफ कहाँ ध्यान देता है.

ashish ने कहा…

सामाजिक विषमता पर प्रहर करती कविता अच्छी लगी .

अमित शर्मा ने कहा…

...........निशब्द......

ehsas ने कहा…

बिल्कुल सटीक। अगर ऐसा होता और इन सारी बातों को वो समझते तो हमारा देश कुछ और होता। पिछले वर्ष सितम्बर महीने मे मैने बचपन नाम से एक कविता लिखी थी जो बिल्कुल ऐसी ही थी। वक्त मिले तो जरूर पढ़े। आभार।

Ravindra Nath ने कहा…

सामाजिक विषमता पर सटीक कविता, अभी कुछ दिन पूर्व २५० करोड की शादी के परिप्रेक्ष्य मे यह बहुत ही ज़रूरी है कि ऐसे भोंडे प्रदर्शनों का विरोध किया जाए

http://robeendar.blogspot.com/2011/03/blog-post.html

"पलाश" ने कहा…

जिनकी आँखो मे बसता पैसा ,
जिनकी भूख मिटाता है पैसा
सोने के लिये बिछता है पैसा
रिश्ते नाते भगवान भी है पैसा

कैसे समझे वो ये बातें
मासूम बिलखती आवाजें
हम आप ही आओ मिल कर के
कुछ करने की निकाले राहे

क्या हम लोग कुछ कर सकते है , यदि हाँ तो पसल करने में देर नही करनी चाहिये ।

suryabhan ने कहा…

अमित शर्मा जी को दोहराऊंगा
निःशब्द

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Pawan bhai, dil ko chhu gayi baat.
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पैरों तले जमीन खिसक जाए!
क्या इससे मर्दानगी कम हो जाती है ?

Voice of youths ने कहा…

पवन जी काश! आपकी बात इस देश के कर्णधारों को समझ में आ पाती|