सोमवार, 21 मार्च 2011

तरुनाई का प्यार मुझे फिर याद आया.










अरसे  से गुम   मौसम
 फिर वापस आया
 तरुनाई का प्यार
 मुझे फिर याद आया.

बीते पल के तहखाने में 
रखा हुआ  बक्सा खोला
टूटी पेन सूखे दावात
और  फटा बस्ता खोला


एक मुड़े कागज में
तेरा नाम लिखा पाया

कुछ कटी पंक्तियाँ गानों की
अंतिम पन्ने पर
एक कहानी  झलक रही 
स्याही के धुंधले  धब्बे पर 

सूखे गुलाब की पंखुड़ियों में
तेरा अक्स उभर आया  

आँखों से  तकरार और
फिर एक  कोमल मनुहार 
भोली बातों में खिलता था 
छहों दिनों का प्यार 

 वो दुखदायी रविवार
मुझे फिर याद आया

तरुनाई का प्यार
मुझे फिर याद आया.

  









गुरुवार, 17 मार्च 2011

फागुन में धरती झूम रही है एक उदास शाम के जैसी








       


              1.
फागुन में धरती झूम रही है
मस्त नशे में घूम रही है
जग से छुपकर क्षितिज पार
नभ  के अधरों को चूम रही है.


टेसू ने ओढ़ाई  लाल चुन्दरिया
हल्दी रोली   से सजी गुजरिया  
अंग अंग हो गया बसन्ती
वैजन्ती मन में फूल रही है


हुलसित   मन तन  रंग रंगा
चंग ढोल संग बजा मंजीरा
चौताल  मचाया   हुरियारों ने   
दसों दिशा में   गूँज   रही  है.


              2.
इन  रंगों की बारिश लेकिन  
मुझ को  नही भिगो पाती  है
हर बार के जैसे ये होली
मुझे   बेरंगा करके जाती है

एक  उदास शाम के  जैसा  
जीवन  ढलता जाता  है
मै अब भी खोजता वह रस्ता  
जो मेरे गाँव को जाता है















रविवार, 13 मार्च 2011

...मुझमे तब कविता रचती है









रात रात भर महुए जब
धरती पर रस बरसाते है
फगुनाहट की मस्ती से 
गाँव गिराँव  हुलसाते  है
             
                 खेतों  में मधुगीत बसे जब
                 आँखे सपने बुना करती है
                मुझमे तब कविता  रचती है

दूर क्षितिज के आँगन से
एक राह निकलती दिखती है
नदी पहाड़  जंगल चलकर
मुझसे  होकर   जाती  है
                
                     कितने मिलते  कितने बिछड़े
                     सुधियाँ मन पुलकित करती है
                     मुझमे तब कविता रचती है

होठो पे  एक मुस्कान मिले
ज्ञान को जहा मान मिले
 मानवता विकसित होती हो 
ममता करुणा की  छाव तले
                        
                             योगी और निरोगी हो सब 
                             अभिलाषा  मन में उठती है
                             मुझमे तब कविता रचती है

बरसे चंदा की धवल धारा
नदियों का  आँचल भर जाए
लदे फदे तरु खिले पुष्प हो
मस्त कबीरा मौज में गाये
                           
                              पायल रुनझुन बंशी की धुन
                               ह्रदय में अमृत  भरती है
                               मुझमे तब कविता रचती है


                            




          

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

आओ बन फूलों की ओर













आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर
जहां  सुबह की लाली है
मादक मोहक सांझ ढली है

जीवन निःसार नहीं है
जीवन भार नही है
यह उत्सव है अभिशाप नही
नीरसता संताप नही

आओ चले जले धुए से
खिले हुए गजरे की ओर

धुला हुआ सारा आकाश है
खिली हुई यह धरती है
चन्द्र रश्मियाँ सदियों से
यौवन में अमृत भरती है  

कंक्रीटो की दीवारों से
आओ जरा प्रकृति की ओर

समा जाय इस स्नेहमयी में
जैसे पंछी नील गगन में
बच्चे माँ के आँचल में
धारा सागर के जल में

जैसे आती नरम हवायें 
पूरब से पच्छिम की और

आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर



सोमवार, 7 मार्च 2011

कुछ बच्चे है इस दुनिया में जो रात में भूखे रोते है















जिनके उपभोगसे होता है
धरती का तापीय परिवर्तन
कभी नहीं जो सो सकते है
बिना किये वातानुकूलन

मोटे गद्दों पर  सोने वालों
क्या कभी जान पाओगे
कुछ लोग भी है इस दुनियामे
जो फुटपाथों पर सोते है

सूखे के इस मौसम में
आँखों का पानी भी सूखा
कुआ ताल नदिया सब  सूखी  
गले के संग ह्रदय भी सूखा

मिनरल वाटर को पीने वालों
क्या कभी जान पाओगे
कुछ लोग भी है इस दुनिया में
दो बूँद को रोज़ तरसते है

नन्ही जर्जर काया जब
रोटी के लिए बिलखती है
उन बच्चों की माताओं की 
सूखी छाती फटती है

भारत निर्माण के निर्माताओं
क्या कभी जान पाओगे
कुछ बच्चे है इस दुनिया में
जो रात में भूखे रोते  है

गुरुवार, 3 मार्च 2011

देवी माँ और एक मालिनी का संवाद

पूर्वी भारत खासतौर से अवधी क्षेत्रो में दैवीय शक्ति से आम जनता का सीधा सहज  संपर्क  है इसे लोकगीतों के माध्यम से देखा जा सकता है. यहाँ ऊँच नीच छूट अछूत का कोई भेदभाव नहीं दीखता आइए एक पचरा गीत के माध्यम से मै आपको उस संवाद से रू ब रू कराता हूँ जो एक मालिनी और देवी माँ के बीच में होता है बस शर्त एक है कि आप उसी जनमानस के भाव से समझेगे जिस भाव में यह संवाद हुआ है
एक नीम की डाली पर देवीजी ने झूला डाला है और झूल रही है उन्हें प्यास लगती है वर्णन देखे
निमिया की डरिया मईया नावली झुलानवा
हो कि झूलई लागी ना
ओही झुरमुर बयरिया  कि मईया  झूलई लागी ना
झूलत झूलत मईया होई गयी पियासी
हो कि हेरई लागी न ओही
मालिनी के घरवा हो की हेरई लागी न
भीतर  बाटू कि  बहरे मालिनिया  हो की बुंद एक ना
हमका जल अन्चवाऊ मालिनी बूंद एक न

मालिनी क्या जवाब दे रही है

कईसे कि जल अन्चवाई मोरी जननी हो की गोदिया हमरे ना
बाटे बालक नदान्वा   हो की गोदिया हमरे ना

देवीजी की उत्तर देखे

बालक लेटावो मालिनी सोने के खाटोलवा हो की बूंद एक ना
हमका जल अन्चवाऊ मालिनी बूंद एक ना

मालिनी क्या करती है

बालक लेटाई मालिनी पाटे के खाटोलवा हो की दाहिने हाथे ना
लई के सोने के घडिलवा हो लइके रेशमे की डोरिया हो मालिनी बाए हाथे न
मालिनी कहती है
बुन एक पनिया पियाऊ  मोरी जननी हो कि भरी मुख ना
देऊ तू असिसवा हो माई भरी मुख ना

देवी जी का आशीर्वाद देखिये (हालाँकि इस आशर्वाद को लेकर तथाकथित नारीवादियो की तलवारे देवीजी पर खीच सकती है )

जुग जुग जियाई मालिनी गोदी के ललनवा हो कि
जुग जुग बढ़ाई ना तोहरे मांगे के सेंदुरवा
हो मालिनी जुग जुग बाढ़े ना