शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

To Dr Anwar Jamal On अब बताईये कि आपको मेरी किस बात पर ऐतराज़ है ?


प्रिय जमाल जी
आपसे बात करने के बाद पाया कि आप वैसे तो बिलकुल नही है जैसे कि आप प्रोजेक्ट करते है. आपको जानने के लिए मैंने पुरानी पोस्टे पलटी तो पाया आप बेहद खूबसूरत खयालो वाले हिन्दोस्तानी है. फिर क्या वजह है जो लोग अनवर जमाल से हिचकिचाते है. कुछ खगालने क़ा प्रयास किया है. मेरा मोबाइल फोन ख़राब हो गया था. इससे पहले मैंने आपकी बाते ध्यान से सुनी और कई बातो (बल्कि यू कहे कि ९९ %) पर सहमत भी था. बस एक परसेंट क़ा अंतर है यह एक परसेंट क़ा अंतर ९९ % पर भारी  पड़ता है.
आपका कहना है कि आप हिन्दू मुस्लिम एकता(मानवीय एकता ) के हिमायती है.
इस बात से मै भी इत्तेफाक रखता हूँ.
लेकिन इसका आधार में आप डार्विन वाद में ढूढ़ते है.
आपका कथन है
१.सभी धर्मो के धरम ग्रन्थ मिलावटी है केवल कुरआन सही है .
२.दूसरी क़ौमों और मुसलमानों में जो बुनियादी अंतर है वह यह है कि दूसरी क़ौमों के पास वह ईशवाणी आज सुरक्षित नहीं है जो उनके ऋषियों के अंतःकरण पर अवतरित हुई थी लेकिन मुसलमानों के पास वह सुरक्षित है, न केवल उनके लिए वरन् सारी मानव जाति के लिए. इसी ईशवाणी पवित्र कुरआन में हिन्दुओं के ऋषियों का सच्चा चरित्र आज भी पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रहा है। इसी ईशवाणी पवित्र कुरआन में हिन्दुओं के ऋषियों का सच्चा चरित्र आज भी पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रहा है।
३. सनातन धरम क़ा लेटेस्ट वर्जन इसलाम को है.
४. आज दुनिया का कोई भी आदमी बिना कुरआन की मदद के अपने ऋषि से जुड़ ही नहीं सकता।
मुझे घुमाफिरा कर कहने की आदत नही आप सुनिए
१.ये धरम क़ा डार्विन वादी व्याख्या अंत में जीवन संघर्ष की ओर ले जाती है जहा योग्यतम ही जीवित रहता है. इस संघर्ष में नैतिकता समाप्त हो जाती है और जंगल राज लागू हो जाता है.
२. मै मानता हूँ कि सनातन धार्मिक साहित्य में क्षेपक आ गए है. किन्तु ये क्षेपक सभी सनातनी वैदिक धरम मर्मज्ञों को मालूम है और वे इन्हें समय समय पर शुद्धि करते रहते है. वैदिक परंपरा इस्लामिक परम्परा से तकरीबन ४००० वर्ष पुरानी है अतः प्रक्षेप जुड़ना अस्वाभाविक नही है.
३. गीता विशुद्ध रूप से सनातन, वैदिक ईश वाणी है जिसके आधार पर कोई भी व्याख्या तार्किक रूप से संभव है
४. आप घुमाफिरा कर एक ही बात कहना चाहते है कि सारे धरम अब शुद्ध नही सिवाय इसलाम के और इसलिए सभी को मुक्ति पाने के लिए सही धरम को अपनाना चाहिए. यहाँ आपका सीधा सीधा इशारा इसलाम कुबूलियत की तरफ होता है.
५.आपसे बात करते समय मैंने तुरंत कहा था कि आपकी आवाज बहुत अच्छी है लेकिन आप की लेखनी ऐसी नहीं. आप लिखते समय किसी भी टापिक क़ा छीछालेदर कर देते है. ऋषियों के बारे में या लूत के बारे में या जील के बारे में. एक उदहारण से समझाने की कोशिश करता हूँ. अगर किसी से पूछा जाय कि विवाह सम्बन्ध क्या होता है तो उत्तर मिलेगा घरेलू जीवन में प्रवेश की इकाई. विद्वान व्यक्ति इसी तरह लिखते और समझते है किन्तु क्या जरूरी है कि विवाह संबंधो की परिभाषा में मैथुनिक संबंधो को छिछियाते हुए बताये जाय जबकि इन्ही संबंधो के आधार पर विवाह टिका होता है. आशा करता हूँ आप मेरा मतलब समझ रहे होगे.
६.आपने अलबक़राः, 284 क़ा उदाहरण देकर बताया " हम उस (ईश्वर) के रसूलों (ऋषियों) में से किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।"
यहाँ आप खुद मिलावट कर रहे है ईश्वर या ऋषी आपकी अवाधारनाये है ना कि कुरआन या हदीस की. यह व्याख्या ओरिएन्तेद है. ये बात तो सही है कि ईश्वर भेदभाव नहीं करता लेकिन सिर्फ ऋषियों के संधर्भ में ही नही waran सम्पूर्ण प्राणिमात्र में. इस बात में कोई नई बात नहीं है किन्तु आप गलत चीज़  में सही बात फिट करने क़ा प्रयास करते है.
७. हिदुओ और अंग्रेजो की समस्या ही नही पूरे विश्व में यही समस्या है कि अपनी ढपली के सुर को बेहतरीन मानते है.
मुझे इस बात की अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि आपने माना कि हर धरम एक ही सत्य की बात करता है. फिर भेदभाव क्यू इसके उत्तर में मैंने पावर इक्सर्साइज की बात कही थी.
मुझे इस बात की अत्यधिक खुशी है कि आप एक नेक मुसलमान है और इसलाम की तन मन धन से सेवा कर रहे है लेकिन प्रिय अनवर जी मै एक परसेंट भी भेदभाव नही चाहता ये एक परसेंट भेद गुरील्ला और आदमी की प्रजाति के लिए जिम्मेदार है.
आप ज्ञानवान है कोई शक नही. किन्तु ज्ञान क़ा सही उपयोग कीजिये मानवता आपकी आभारी रहेगी.






47 टिप्‍पणियां:

अमित शर्मा ने कहा…

श्री जमाल साहेब के लिए जो बात अन्दर घुमड़ती है, वह आपने सटीक रूप से व्यक्त की है . यह बिलकुल सही है की ९९% रूप से सम्पूर्ण मानवीय जमाल साहेब पर उनका १% कट्टरवादी या हठधर्मी स्वरुप ---- की मैं जो मानता/समझता हूँ वही सम्पूर्ण शुद्ध सत्य है बाकी सब अशुद्ध--- भारी पड़ जाता है, और उनके सुन्दर विचाराभिव्यक्ती से भी अनजाना भय होता है. इस बात का क्या पैमाना है की किस की मान्यता सही है और किस की गलत (उपासना पद्दती के मामले में ) जिस बात का लांछन हम किसी के ऊपर थोपतें है तो वही लांछन हमारी मान्यता पर भी प्रहारिक है, यह क्यों भूलतें है हम आपस में एक दूसरें की मान्यताओं को लांछित करते समय ??
निश्चल भाव प्रेषण के लिए बधाई आपको, आशा है श्री जमाल साहब आपके माध्यम से मेरे जैसे शुभेच्छुओं की भावनाओं को भी समझ पायेंगे.
बाकी तो जो "राम रची राखा"

एस.एम.मासूम ने कहा…

पवन जी आपने इस लेख का लिंक दिया , बात तो अनवर जमाल से कि गयी है, मैं यहाँ क्या कहूँ? चलिए कुछ इस्लाम के बारे मैं बता देता हूँ...

हर इंसान जिस धर्म को मानता है उसी को सही कहता है. मुसलमान कि नजर मैं कुरान सही और मुकम्मल किताब है , फ़िक्र कि बात यह है कि क्या मुसलमान यह कहता है कि बाइबल ग़लत है? नहीं मुसलमान यह कहता है कि बाइबल अल्लाह कि किताब है और कुरान मैं हर वोह बात शामिल है जो बाइबल मैं कही गयी है.

मुसलमान यह भी कहता है कि आदम जिनसे दुनिया शुरू हुई उनका मज़हब इस्लाम था और वो मुसलमानों के पहले नबी थे. जबकि कुरान तो बहुत बाद मैं आयी. इसका मतलब यह हुआ कि हजरत आदम के इस दुनिया मैं आते ही इस्लाम भी आया और हर दौर मैं अलग अलग किताबों के ज़रिये आता ही रहा यह इस्लाम जो कुरान के साथ मुकम्मल हो गया.

इस इस्लाम ने हर दौर मैं क्या सीखाया? सिर्फ और सिर्फ इंसानियत और दुनिया मैं जीने का तरीका. कैसे समाज मैं रहो, कैसे सत्य का साथ दो, कैसे अपनी ओलाद कि तरबियत दो? और कैसे सभी इंसानों से मिल जुल के रहो.? इत्यादि..

इस नज़रिए से देखिएं तो जो भी धर्म इंसानियत का पढ़ पढाए और नफरत, एहसान फरामोशी, ज़ुल्म , इत्यादि के खिलाफ आवाज़ उठाए उसे इस्लाम कहते हैं.
.
हमारी मुश्किल यह है कि हम धर्म के सही उपदेशों पे नहीं चलते और इसी कारण इतनी सारी धर्म कि दुकानें खुल गयी हैं. और जी धर्म अमन और शांति के लिए आया था उसी के ज़रिये नफरत फैलाई जा रही है..

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ जनाब पवन कुमार मिश्रा जी ! आप मझसे 99 प्रतिशत सहमत हैं , यह एक बड़ी ख़ुशख़बरी है मेरे लिए । मैं अपने आपसे ख़ुद भी इससे कुछ कम ही सहमत हूं । मेरी तमाम बातें हरगिज़ हरगिज़ सही नहीं हो सकतीं। मेरी जो बात भी ग़लत सिद्ध हो , उसे आप छोड़ दीजिए क्योंकि वह मेरी ग़लती है, मेरे निष्कर्ष की ग़लती है और मेरी जो बातें आपको सत्य लगें , उन्हें आप अपना लीजिए क्योंकि वह मेरी निजी जागीर नहीं है । सत्य सबका है और सबसे पहले वह आपका है क्योंकि सत्य सनातन हैं और आपकी आत्मा भी सनातन है और धर्म भी सनातन है ।
आज सनातन धर्म में असंख्य मत हैं और उनमें से कोई दो मतों के दरमियान भी 99 प्रतिशत साम्य नहीं पाया जाता बल्कि तंत्रमार्गी जैसे कुछ सनातनी मत तो बहुत सी बातों में अन्य मतों के विपरीत तक आचरण करते हैं । आप न तो उन्हें धिक्कारते हैं , न उनका तिरस्कार करते हैं और न ही किसी पवित्र से पवित्र माने जाने वाले हिंदू तीर्थ में उन्हें प्रवेश से ही रोका जाता है । यहां नेट पर उनकी ढेरों वेबसाईटें मौजूद हैं , वहां भी आपको उनसे कोई हिंदू लड़ता-झगड़ता नज़र नहीं आएगा जैसा कि मुझसे लड़ते रहते हैं बल्कि अश्लील गालियां देते हैं , मुझे ही नहीं खुदा और उसके पैग़म्बर तक को। मैं इसलाम को सही मानता हूं , उस पर चलता हूं और जिस चीज़ से मुझे नफ़ा पहुंच रहा है उसी को बरतने की सलाह मैं आपको दे रहा हूं । यही स्वाभाविक तरीक़ा है। मैं भेदभाव नहीं कर सकता कि ख़ुद तो नफ़े वाली चीज़ पर चलूं और आपको नुक़्सान का रास्ता बताऊं ।
अगर आप मुझसे बेहतर रास्ता जानते हैं तो आप ख़ुद भी उस पर चलें और मुझे भी उसी पर चलने की प्रेरणा दीजिए। आपका मार्ग सत्य , श्रेष्ठ होगा तो मैं उस पर चलूंगा । मुझे तो अपना कल्याण अभीष्ट है । उस मार्ग के निर्धारण के लिए हम सभ्य तरीक़े से आपस में संवाद कर सकते हैं और अगर नहीं कर सकते बात ही न करें , कोई हरज नहीं है । मैं किसी पर अपना विचार ज़बर्दस्ती थोप नहीं रहा हूं और न ही थोप सकता हूँ ।
मैं जो बात कहता हूँ उसका प्रमाण देता हूँ लेकिन आप जो बात कहते हैं बिना प्रमाण के कहते हैं और अब वह दौर बचा नहीं है कि आपकी बात मात्र इसलिए मान ली जाए आप ब्राह्मण हैं ।
1. जैसे कि आपने बताया कि वैदिक व्यवस्था 4 हजार वर्ष पुरानी है लेकिन आप किस आधार पर ऐसा मानते हैं कोई प्रमाण आपने नहीं दिया है ?
मानव जाति तो 4 हजार वर्ष से बहुत ज्यादा पुरानी है । तब वैदिक सभ्यता से पहले कौन सी सभ्यता थी ?

2. कुरआन मेँ ईश्वर और ऋषि की अवधारणा नहीं है । ऐसा आप किस आधार पर मानते हैं इसके लिए भी आपने कोई प्रमाण नहीं दिया है ?

3. अगर आप अपना कथन सत्य सिद्ध कर देते हैं तो में आपकी बात मान लूंगा । अब बताइए कि क्या मैं कुछ ग़लत कह रहा हूँ ?

4. ऐसा तो आप भी नहीं चाहेंगे कि मैं आपकी बात पर विचार किए बिना और उसके सत्य होने की पुष्टि किए बिना ही मान लूं ?

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

जनाब अनवर साहब
१.अब तक प्रमाणिक ऐतिहासिक वर्गीकरण प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया इन पुस्तकों को देखे और इनके संदर्भो पर गौर फरमाए
1. Wonder that was India - A.L. Bhashem.
2. Ancient India Social and Culture - Luniya
3. Ancient India - an introductory outline - D.N.Jha.
4. An Advanced History of India - R.C. Majumda, H.C. Raychaudhurai, - Kalikinkar Datta
5. Ancient India - L.Mukherjee
६.प्राचीन भारत के.सी. श्रीवास्तव
आके संसयो क़ा निराकरण हो जायेगा.
२. जिनके लिए आप बार बार ऋषी शब्द क़ा इस्तेमाल कर रहे है उनका यह पर्याय वाची आपका ही गढ़ा हुआ है कुरआन या हदीस क़ा नहीं रसूल ऋषी नहीं है रसूल क़ा मतलब PROFET होता है जिसका अर्थ इश्वर के द्वारा भेजे गए बन्दे.
ये शब्दों के जाल हमें नही बुनना है. आपसे अनुरोध है कि मुहब्बत को बढ़ावा देने वाली पोस्ट लिखे ताकि दुनिया में नफरत को कम किया जा सके.
मै फिर आपसे कहता हूँ कि एक बार पीछे मुड़ कर तो देखिये .
छिन्द्रान्वेषण से कुछ हासिल नही होगा
एक परसेट का अंतर मानव जाती के सभ्यता संस्कृति के लिए उत्तरदायी है.

बलबीर सिंह (आमिर) ने कहा…

इस्लाम ने हर दौर मैं क्या सीखाया? सिर्फ और सिर्फ इंसानियत और दुनिया मैं जीने का तरीका. कैसे समाज मैं रहो, कैसे सत्य का साथ दो, कैसे अपनी ओलाद कि तरबियत दो? और कैसे सभी इंसानों से मिल जुल के रहो.

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

यह बात क्या और धरम नही सिखाते ?
जो अपने धरम से गद्दारी करता है और दूसरो को ऐसा करने को उकसाता है वह महापातक और बेईमान है धरम परिवर्तन गद्दारी क़ा दूसरा नाम है

--

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ जनाब पवन कुमार मिश्रा जी ! आप मुझे किताबों के नाम बताने के बजाए इनमें से उद्धरण दीजिए जो कि जवाब देने का क़ायदा है ।
ऋषि शब्द को रसूल का पर्यायवाची मैं नहीं बता रहा हूं बल्कि महापंडित श्री वेद प्रकाश उपाध्याय समेत बहुत से वेदज्ञ बता रहे हैं ।
देखिए ब्लाग
अंतिम अवतार
इसका लिँक आपको प्यारी मां में मिलेगा ।
ईश्वर की अवधारणा कुरआन में कैसे नहीं है ?
आपने बताया नहीं भाई ।

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Bhai Anwar ji, Agar Rishi ka matlab Rasul hai to aap log hamesha rasul shabd kyon istemal karte hain,

Maja aa gaya Dekhte hain ki kaun sa Dr. Kamjor padta hai. waise mujhe lagta hai ki Anwar saheb sahi jabab nahi de payenge

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

प्रिय अनवर जी उद्धरण देने क़ा तरीका पता है किन्तु मैंने औपचारिकता की आवश्यकता ना समझी आप कह रहे है तो मै ये काम कर देता हूँ
देखिये
१.Maxmuller,Origin and development of Religion. " There is nothing more primitive , more ancient than the hymns of the rigveda, wheder in India or the world" मुलर महोदय ने वैदिक सभ्यता को तकरीबन ३५०० वर्ष प्राचीन बताया है.
२.पी. एल गौतम, प्राचीन भारत jpm jaipur page no 126
मात्र दो उद्धरणों से काम चलेगा या और चाहिए


Rishi (Sanskrit: ṛṣi, Devanagari: ऋषि) denotes the composers of Vedic hymns. However, according to post-Vedic tradition the rishi is a "seer" to whom the Vedas were "originally revealed" through states of higher consciousness. The rishis were prominent when Vedic Hinduism took shape, as far back as some three thousand years ago.
ऋषी अवतार या रसूल नही है रसूल प्रदत्त है जबकि ऋषी क़ा पद अर्जन से मिलता है. रसूल क़ा अर्थ prophet है
आपके संशय के निराकरण के लिए मै शब्दकोष के अर्थ दे रहा हूँ .

prophet
Pronunciation

प्राफट / प्राफिट
Meanings
[Show Transliteration]
noun

1. भविष्यवक्ता (m)
2. भावीवक्ता
3. मुहम्मद साहब
4. ईश्वरदूत
5. पैगम्बर (m)

मै फिर आपसे कहता हूँ इन शब्दों के खेल से बाहर निकलिए सत्य क्या है हमें और आप दोनों को पता है.
--

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

Rishi (Sanskrit: ṛṣi, Devanagari: ऋषि) denotes the composers of Vedic hymns. However, according to post-Vedic tradition the rishi is a "seer" to whom the Vedas were "originally revealed" through states of higher consciousness. The rishis were prominent when Vedic Hinduism took shape, as far back as some three thousand years
इन पंक्तियों के आगे तकनीकी कारणों से नहीं छपा खेद है
जिन उपाध्याय जी क़ा प्रसंग आप दे रहे है ये उन्ही की पंक्तिया है आप यदि व्यक्तिगत रूप से परिचित हो तो कन्फर्म कर लीजियेगा

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

गणना में अंतर क्यों ?
@ आदरणीय पवन कुमार मिश्रा जी !
1. आपने मैक्समुलर की जो पंक्तियां quote की हैं , उनके बारे में आपने यह नहीं बताया कि ये पंक्तियाँ उनकी किस किताब से ली गई हैं ?

2. अंग्रेज़ी उद्धरण की किसी भी लाइन का अनुवाद यह नहीं बनता कि वैदिक सभ्यता 3500 वर्ष पुरानी है , आपने यह किस लाइन का अनुवाद किया है ?

3. इसी पोस्ट में आप वैदिक सभ्यता को इस्लाम से 4000 हज़ार साल पुरानी बता रहे हैं और अब आप मात्र 3500 वर्ष पुरानी बता रहे हैं ?

4. इस्लाम को अगर आप पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. के समय से भी मानें तो भी आपके गणित में लगभग 2000 वर्ष का अंतर आ गया है ?

5. इस दुविधा की स्थिति में मैं अपने अनुज भाई अमित जी से हेल्प लेना चाहूंगा और चाहूंगा कि वे हमारे सामने वस्तुस्थिति स्पष्ट करें!

6. प्रिय मनमोहक अनुज अमित जी ! वास्तव में मैक्समुलर महोदय ने वैदिक सभ्यता को कितना पुराना माना है और क्यों ?

7. क्या वास्तव में वैदिक सभ्यता मात्र 3500 वर्ष पुरानी है ?

8. क्या आप भाई मिश्रा जी के कथन से सहमत हैं ?

आप मैक्समुलर पर अच्छी स्टडी रखते हैं । आशा है कि आप हमें जानकारी देकर ज़रूर कृतार्थ करेंगे।

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

आपके इस बात में बहुत दम है कि "आप ज्ञानवान है कोई शक नही. किन्तु ज्ञान क़ा सही उपयोग कीजिये मानवता आपकी आभारी रहेगी". अगर आपके पास ज्ञान है तो फिर उसका सही इस्तेमाल करिए बजाय इसके जाती और धर्म के नाम पे दूसरों को बरगलाने और समाज को बांटने के.

अमित शर्मा ने कहा…

(छिद्र) अन्वेषी जमाल साहेब आप शायद इस बात के विशेषग्य हैं की मूलार्थ को छोड़कर मात्र शब्दों के फेर में ही पडा रहा जाए :). चर्चा बिन्दु यह था की आप (कोई भी ) किसी की आस्था के ऊपर अपनी आस्था को सही किस तरीके से सिद्ध करे, कम अस कम आपके तरीके से तो बिलकुल नहीं, क्योंकि आप जिन के अनुयायी होने का दम भरतें हैं, उनके तरीकों से आपके तरीके कतई मेल नहीं खातें है. क्योंकी श्री मोहम्मद साहेब तो इस्लाम के प्रचार के लिए सिर्फ नसीहत का ही सहारा लेते थे, ना की आप की तरह किसी की आस्था -पद्दतियों का अनर्गल रूप से उपहास करतें थे, बल्की उपहास तो खुद मुहम्मद साहेब का उड़ाया जाता था, जब वे लोगों को नसीहत करतें थे. श्री रसूल साहेब ने कभी नसीहत का दामन नहीं छोड़ा था, क्योंकि खुदा ने उने सिर्फ और सिर्फ नसीहत करने की आज्ञा दी थी ना की लोगों पर दारोगा बनने की.
और आपतो दारोगा ही नहीं मुंसिफ भी बने जा रहें है बार बार की तुम सब गलत हो और सिर्फ मैं जिसे सत्य मानता/जानता/पहचानता हूँ सिर्फ और सिर्फ वही सत्य है.
आप होते कौन है सही गलत का फैसला करने वाले जबकी स्वयं रसूल साहेब ने ही सिर्फ नसीहत करी थी और ईमान लाने का सवाल लोगों के विवेक पर छोड़ दिया था.
या फिर आप कहदीजिये की श्री मुहम्मद साहेब नसीहत पर कतई ईमान नहीं रखते थे और फजीहत( लोगों की आस्थाओं की ) से काम लेतें थे . कह दीजिये की अल्लाह का वह सच्चा बन्दा प्रेम से नहीं तलवार के धार से लोगों के जेहन में इस्लाम को सवार करने में सफल हुआ था .

अगर आप में विवेक है और इस्लाम पर वास्तव में ही आपका ईमान है तो आप लोगों को इस्लाम की दावत सिर्फ इस्लाम की नेकनीयती दिखलाकर/बतलाकर ही दीजिये, ना की किसी भी उपासना पद्दती की आलोचना करके, क्योंकी आप जो जो आरोप किसी अन्य ग्रन्थ/पद्दती पर आरोपित करेंगे, वही आरोप कुरआन-ऐ-करीम और इस्लाम पर भी नाजिल रहेगा. बात को ज़रा इत्मीनान से बैठ कर सोचिये महाशय !

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

इस लिए मैंने दो उद्धरण दिए है यदि प्रथम से बात समझ में नही आती तो है तो द्वितीय देखा जाय. निराशा की बात है आप ने वह देखा नही मैंने तकरीबन ४००० वर्ष की बात की थी
पुरातात्विक प्रमाण भी देखे जाय और कोई सभ्यता एक दिन में ना बनती है ना ख़त्म होती है वैदिक सभ्यता आज भी अव्यक्त रूप में जीवित है. कालक्रम कानिर्धारण में व्यावहारिक पहलुओ क़ा समावेश होना चाहिए.
बंधुवर अमित शर्मा जी ने अपनी बात रख दी है कृपया उसको समझने की चेष्टा करे
फिर मै यहाँ इस बात को दोहराता हूँ कि आप अपने मंतव्य पर पुनः विचार करे आप जिस लक्ष्य को संधान करने हेतु प्रयत्नशील है उस के बारे में सोचिये क्या यह मानवता के लिए हितकारी होगा
एक बात आज की बातचीत के संधर्भ में
श्रीराम शर्मा के बारे में दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपकी सूचनाये असत्य निकली
इसका विवरण मै यहाँ देना उचित नही समझता
ना भ्रम में रहे ना भ्रम फैलाए
धरम परिवतन गद्दारी है उकसाने वाला भी उतना ही बेईमान है जितना बदलने वाला. आप मूल धरम पर वापस आने की बात करते है तो मूल धरम व्यक्ति लेकर पैदा होता है यदि मा बाप बदले जा सकते है तो धरम बदला जा सकता है
फिर वही अर्जन बनाम प्रदत्त की बात आ गयी जिस पर आपने बाद में विचार करने की बात की है
मेरी नज़र में डॉ संजय गद्दार हैं और उनको दिक्षीत करने वाला भी पाप में उतना ही सहभागी.
जो अपने धरम क़ा नही उसकी विधता पर ही सवाल उठता है अब आप यह ना कहियेगा कि इसलाम ही मूल धरम है इसलिए इसलाम स्वीकार करने में कोई परहेज़ नहीं है ऐसा कहने से मै आपको भी उसी श्रेणी क़ा समझूंगा. मुझे विश्वास है कि जिस जमाल को मै पिछले एक हप्ते से जानता हूँ वह ऐसा नहीं होगा
ये भविष्य पुराण की बाते या अल्लोप्निषद क्षेपक ग्रन्थ है कृपया विषय की व्याख्या करने में इनका प्रयोग ना करे अन्यथा आप गलत तरीको क़ा उपयोग के दोषी मने जायेगे और इस प्रकार स्वस्थ शास्त्रार्थ में विघ्न पड़ने की संभावना होगी
उम्मीद है आप मुझसे इत्तेफाक रखेगे
आमीन



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एस.एम.मासूम ने कहा…

यहाँ लेख़ भी अच्छा है और बहस भी अच्छी हो रही है लेकिन ग़लत दिशा मैं जा रही है. और यह उस समय तक होता रहेगा जब तक हम सवालों के जवाब मैं सवाल करना नहीं बंद कर देते.
.
सही तरीका यही है सवाल का जवाब तो और अपनी सहमती या असहमति तर्क के साथ दो.
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इस्लाम का उसूल है पहले मज़हब को समझो फिर जब उस के सही होने का यकीन हो जाए तो उसको मानो. धर्म पे बहस उनको करनी चाहिए जिन्हें अपने और दूसरे धर्म का ज्ञान हो. अज्ञानी जब भी बहस करेगा , नतीजे मैं प्रेम की जगह नफरत ही फैलेगी.
.

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

मासूम भाई आपसे अनुरोध है कि आप स्याह सफ़ेद करिए
आपने सही कहा कि धरम के जानकार ही इस पर बहस करे
शब्दों से खेलना धरम है क्या?

अमित शर्मा ने कहा…

श्रीमान मासूम जी ! ज़रा ज्ञानी-अज्ञानी की व्याख्या कुछ स्पष्ट कीजिये क्योंकी ऐसा ही कुछ आप पहले भी लिख चुके है. वहाँ तो श्री जमाल साहेब को आपने स्पष्ट ज्ञानी और उस दूसरे जीव ;) को अपने अज्ञानी घोषित किया था अब यहाँ भी वही आशय है या कोई अन्य.
.............................................................
पवन जी ! विषयांतर टिप्पणी के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ .

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ जनाब पवन कुमार मिश्रा जी ! मैं आपसे सहमत हूँ और मैं भी यही मानता हूँ कि धर्म परिवर्तन करना ग़द्दारी करना है। आज समाज में बड़ी मात्रा में धर्म परिवर्तन की घटनाएं देखने में आ रही हैं । लोग विभिन्न कारणों से व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। बहुत से संगठन हमारे समाज में धर्म परिवर्तन की प्रेरणा दे रहे हैं जो कि एक निंदनीय कर्म है। आखिर लोग अपने धर्म को बदलने के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं ?
ईसाई मिशनरीज़ पर आरोप लगाया जाता है कि वे लोगों को लालच देकर उनका धर्म बदल देते हैं लेकिन बहुत लोग बुद्धिस्ट भी बनते हैं और बुद्धिस्ट प्रचारक लोगों को कोई लालच नहीं देते। तब लोग अपना धर्म क्यों बदल लेते हैं ?
इसके विपरीत समाज में बहुत लोग ऐसे भी हैं जो अधर्म के काम से पलटकर धर्म पर आ जाते हैं । हर तरह के लालच को छोड़कर और हर तरह की परेशानियाँ झेलकर भी वे धर्म नहीं छोड़ते। आदमी और आदमी में इतना बड़ा अंतर क्यों है ?
कोई धर्म छोड़ रहा है और कोई अधर्म ।
लेकिन यह कैसे पता चलेगा कि कौन धर्म छोड़ रहा है और कौन अधर्म ?
मत और संप्रदाय को तो धर्म नहीं कहा जा सकता । तब धर्म क्या है ?
यह जानना जरूरी है ताकि धर्म परिवर्तन करने वाले अज्ञानी ग़द्दारों की शिनाख़्त की जा सके ।
आपके अच्छे कामोँ में मैं आपके साथ हूं ।

एस.एम.मासूम ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
एस.एम.मासूम ने कहा…

पवन जी और अमित जी @ इस पोस्ट पे जहाँ पवन जी ९९% सहमत हैं अनवर साहब , मैंने एक बार फिर से धर्म के नाम पे बहस को ग़लत राह पे जाते देखा तो मुझे टिप्पणी करनी पड़ी. और ऐसे विषयों पे बात चीत के 1 उसूल बताया .
१. सवाल का जवाब सवाल से ना दे कर जवाब दिया जाए और जवाब भी दलील के साथ दिया जाए.
धर्म पे बात करने के लिए केवल अपने धर्म का ज्ञान आवश्यक नहीं बल्कि आप को उस धर्म का भी ज्ञान होना चाहिए जिस पे आप एतराज़ कर रहे हैं. तब तो बहस सही दिशा मैं जाएगी और नतीजा भी सही निकलेगा वरना ऐसी बहस का ना करना ही बेहतर है..
.
दूसरा उसूल आज बता देता हूँ. धर्म पे बहस एक दुसरे का ज्ञान बढ़ाने के लिए किया जाए तो भी झगडे नहीं होते लेकिन इसका इस्तेमाल दुसरे के मज़हब को नीचा दिखाने के लिए किया जाए तो भी नतीजे सही नहीं निकलते.
.
इस बहस मैं मेरा कोई role नहीं. लेकिन यह बहस यदि कोई अच्छा नतीजा दे जाए और सभी मैं प्रेम भाव बढ़ जाए तो यकीनन यह ज्ञानिओं की बहस होगी और मैं भी ऐसी बात चीत मैं शामिल आगे से होना चाहूँगा. लेकिन यदि यह बहस किसी ग़लत दिशा मैं चली जाए तो यह किसी की अज्ञानता के कारण ही होगा. इसलिए मेरे अज्ञानी शब्द को किसी व्यक्ति विशेष से ना जोड़ा जाए..

एस.एम.मासूम ने कहा…

पवन मिश्रा जी @ आप ज़रा ध्यान से देखें . अमित जी ने मेरी एक सीधे से उसूल के के नवाब मैं क्या सवाल किया?
अमित जी @ यदि आप को कोई अज्ञानी कहे तो आप उस से सवाल कर सकते हैं. लेकिन यदि आप किसी और विषय पे किसी और(जीव) को , अज्ञानी कहने को इस पोस्ट पे सवाल बना के उठाएंगे तो क्या यह आप को कुछ अच्छा नतीजा दे सकता है? मैं तो किसी का बुरा नहीं मानता लेकिन आप स्वं इस बात पे विचार करें.

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

प्रिय अनवर जी आपके विचार जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई डॉ. संजय के बारे में आपका क्या विचार है ?
मासूम साहब फोन से बात करते समय अचानक बटरी ख़त्म हो गयी इसलिए माफी चाहुगा
आपके विचार सौहार्द्रता क़ा परिचय कराते है इसमें कोई संदेह नही है
@अमित शर्मा जी मासूम साहब के ये शब्द आपके उत्तर है
"इस बहस मैं मेरा कोई role नहीं. लेकिन यह बहस यदि कोई अच्छा नतीजा दे जाए और सभी मैं प्रेम भाव बढ़ जाए तो यकीनन यह ज्ञानिओं की बहस होगी और मैं भी ऐसी बात चीत मैं शामिल आगे से होना चाहूँगा. लेकिन यदि यह बहस किसी ग़लत दिशा मैं चली जाए तो यह किसी की अज्ञानता के कारण ही होगा. इसलिए मेरे अज्ञानी शब्द को किसी व्यक्ति विशेष से ना जोड़ा जाए.. "
"प्रेम गली अति सांकरी तामे दो ना समाय"
हमें अपने अपने दायरे को समझना होगा और दायरे में रह कर एक दूसरे के जज्बातों क़ा सम्मान करना होगा तभी दिलोसे मैल ख़त्म होगे.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

धर्म का ग़द्दार कौन और इल्ज़ाम किस पर ? Hypocrite
‘(छिद्र) अन्वेषी जमाल साहेब आप शायद इस बात के विशेषज्ञ हैं कि मूलार्थ को छोड़कर मात्र शब्दों के फेर में ही पड़ा रहा जाए।‘
@ मेरे मनमोहक अमित जी ! आपसे मैं एक लंबे समय से संवाद करता आ रहा हूं। क्या मैंने कभी आपको इल्ज़ाम देकर बात शुरू की है ?
जैसे कि आपने बात के शुरू में ही मुझे ‘(छिद्र)अन्वेषी‘ कह दिया है। अगर मैंने आपके साथ कभी ऐसा बर्ताव नहीं किया है तो फिर मैं भी आपके द्वारा ऐसे पुकारे जाने का मुस्तहिक़ नहीं हूं। यह सिर्फ़ एक बदतमीज़ी है। मैंने आपको बता दिया है। अब आगे से भी आप ऐसा ही करना चाहें तो आपकी मर्ज़ी। आप अपने व्यवहार के स्वामी हैं, जैसा चाहे बरतें। दुश्मनों की ज़बान से अश्लील गालियां सुनकर भी मुझे सिर्फ़ प्रसन्नता ही मिलती है। लेकिन किसी अपने से ज़रा सी बात तकलीफ़ देती है। आप मेरे हैं। यह मैं आपको शुरू में ही बता चुका हूं और यह सच है।
ख़ैर, आपके अनुसार मूल मुद्दा है ‘आस्था के सही-ग़लत के निर्धारण का‘।
ठीक है, लेकिन जब आस्था की बात चलेगी तो आस्था के स्रोत की बात भी आएगी और आस्था वालों का ज़िक्र भी आएगा। उनके ज़िक्र के बिना इस मुद्दे का निर्धारण संभव हो तो कृप्या आप उस विधि को ज़रूर बताएं। तब आपके तरीक़े से ही बात की जाएगी।
मुझे अच्छा लगा कि आपने मेरे अमल को पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. के आदर्श पर परखने की कोशिश की। आपकी कोशिश बिल्कुल ठीक है। जो बात भी कुरआन के हुक्म और उनके आदर्श के अनुकूल नहीं होगी और मेरे व्यवहार में वह पाई जाएगी तो मैं उसे तुरंत छोड़ दूंगा, चाहे आप उस बात की तरफ़ ध्यान दिलाएं या फिर कोई मुसलमान । जो भी ध्यान दिलाएगा, मैं उसका अहसानमंद रहूंगा।
एक मुसलमान को आप जैसे भाईयों से अलग करने वाली यही चीज़ तो है। आप चाहें तो किसी भी मुसलमान को इस पैमाने से नापकर उसके सही या ग़लत होने का पता कर सकते हैं लेकिन अगर मैं चाहूं कि मैं पता करूं कि अमित जी हिंदू होने का दावा तो करते हैं लेकिन वे अपने दावे में सही हैं या ग़लत तो मैं जान ही नहीं सकता कि आप किस ऋषि या ज्ञानी का अनुसरण करते हैं ?
किसी भी नाम मात्र के हिंदू भाई का कोई भरोसा ही नहीं है कि वह किस का अनुसरण कर रहा है या शायद किसी का भी अनुसरण नहीं कर रहा है ?
कृप्या मुझे भी बताइयेगा कि आपने तो मुझे नाप भी लिया और नसीहत भी कर दी और बिल्कुल ठीक किया लेकिन मैं आपको किस पैमाने से नापूं ?
आप जिस ज्ञान का अनुसरण कर रहे हैं , वह आपको किस स्रोत से मिला और किस आदर्श का अनुसरण आप कर रहे हैं ?
यह तो हो सकता है कि आप एक से ज़्यादा आदर्श सत्पुरूषों का अनुसरण कर रहे हों लेकिन ऐसा तो नहीं होना चाहिए कि आप किसी भी आदर्श का अनुसरण सिरे से कर ही न रहे हों और यहां मंच पर हिंदू धर्म की तरफ़ से बहस ऐसे कर रहे हों कि मानों पता नहीं आप धर्म में कितना आगे बढ़े हुए हों ?
अगर आप किसी आदर्श का अनुसरण ही नहीं कर रहे हैं तो फिर पहले धर्म को धारण कीजिए और फिर दूसरों को नापने और टोकने की कोशिश कीजिए।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आप एक गृहस्थ हिंदू हैं। एक गृहस्थ हिंदू का यौन जीवन कैसा होना चाहिए ?
हिंदू धर्म में स्पष्ट है। आप ईश्वर को साक्षी मानकर कहिए कि आप गृहस्थाश्रम का शास्त्रानुसार पालन कर रहे हैं।
हिंदू धर्म में विवाह को एक संस्कार माना गया है जबकि इस्लाम में उसे एक समझौता। समझौता तलाक़ से भी ख़त्म हो जाता है और किसी एक साथी की मौत से भी जबकि हिंदू विवाह संस्कार पति की मौत से भी पत्नी का संबंध अपने पति से नहीं टूटता और हिंदू धर्म में तलाक़ तो है ही नहीं। अब आप बताइये कि आज अधिकतर हिंदू भाई अपने परिवार में विवाह को एक संस्कार मानते हैं या वे उसे मुसलमानों की तरह एक समझौते में बदल चुके हैं ?
अगर आपने ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन नहीं किया है, अगर आप गृहस्थाश्रम के नियमों का पालन भी नहीं कर रहे हैं (छीछालेदर के डर से वे नियम मैं यहां पेश नहीं कर रहा हूं, आप चाहेंगे तो बता दूंगा) और 50 साल का होने के बाद वानप्रस्थ आश्रम के निर्वाह के लिए आप जंगल जाने के लिए तैयार नहीं हैं तो फिर इन आश्रमों के पालन से जी चुराने वाले आप लोग खुद हैं। आप ही वे लोग हैं जो अपनी सुविधा के मुताबिक़ अपने सिद्धांत और अपने संस्कार बदल बैठे हैं और वह भी सामूहिक रूप से। एक आदमी यदि धर्म के सिद्धांत और मान्यताएं बदले तो आप उसे धर्म परिवर्तन करने वाला ग़द्दार कहें और वही जुर्म आप करोड़ों की तादाद में मिलकर करें तो उसे आप धर्म परिवर्तन करना और अपने धर्म से ग़द्दारी करना क्यों न कहेंगे ?
हिंदू धर्म को ख़तरा हमेशा आप जैसे भितरघातियों से ही रहा है। जिन्होंने इसके नीति-नियमों के साथ हमेशा खिलवाड़ किया है और आज आप कर रहे हैं और झंडा ‘धर्म‘ का इतना ऊंचा लेकर चल रहे हैं कि दूसरों को भी सही-ग़लत का उपदेश कर रहे हैं।
बाबा पहले अपने आचरण को तो ठीक कर लीजिए।
दूसरों को ग़द्दारी का खि़ताब बेशक दीजिए लेकिन पहले अपना दामन तो पाक कर लीजिए।
किस की आस्था सही है और किसकी ग़लत, इसे बाद में तय कर लीजिएगा। पहले यह तो देख लीजिए कि अपने पल्ले आस्था है भी कि नहीं ?
आज इल्म का दौर है, तकनीक का दौर है। सच्चाई आज सबके सामने है जिसे झुठलाना आसान नहीं है।

# # # इस बात पर श्री पवन कुमार मिश्रा जी व अन्य बंधु भी ध्यान दें। डाक्टर संजय जी के बारे में आपने जानना चाहा , इसलिए मुझे मजबूरन यह कहना पड़ा, इस आशा के साथ कि 'तत्वयुक्त' होकर विचार करेंगे .

दूसरों को नापने से पहले खुद को नापें।
दूसरों को जांचने से पहले खुद को जांचें।

धर्म का ग़द्दार कौन और इल्ज़ाम किस पर ? Hypocrite

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

मुझे कही ना कही यह लग था था कि कुछ इसी तरह क़ा उत्तर अनवर जी कि तरफ से आएगा
@अनवर जमाल जी जब आप ने तय कर लिया है कि एकोअहम द्वितीयो नास्ति तो आगे कुछ कहने को नही रहा जाता है. जमाल साहब जरा गौर फरमाए मूल मुद्दे से हट कर फिर आपने पुराने अंदाज प्रकट करने शुरू किये निम्नांकित पक्तियों की व्याख्या कीजिये
[47:15] The allegory of Paradise that is promised for the righteous is this: it has rivers of unpolluted water, and rivers of fresh milk, and rivers of wine - delicious for the drinkers - and rivers of strained honey. They have all kinds of fruits therein, and forgiveness from their Lord. (Are they better) or those who abide forever in the hellfire, and drink hellish water that tears up their intestines?
यह दो बाते कैसी एक तरफ आप शराब खोरी को हराम बताते है दूसरी तरफ ये पंक्तिया .
मै फिर कह रहा हूँ दुराग्रह छोडिये इन सब से नफरत और बढ़ेगी कम नही होने वाली सच क़ा साहसपूर्ण तरीके से सामना कीजिये आप योग्यपुरुष है मानवता को आपके स्नेह की जरूरत है ना कि आपके चश्मे की
नफरत के खेल बहुत खेले गए है आखिर कब तक एक दूसरे की छीछालेदर हम करते रहेगे.

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

@ Anwar Jamal. ye link hai aapke waste

http://www.submission.org/suras/sura47.html

ashish ने कहा…

विद्वत चर्चा को बस पढ़ रहा हूँ .

Jai Hind Pandey ने कहा…

Mai sanatan hindu dharmavalambee hoon aur rishi vaani kaa mool Srimadbhagvat Geetaa hai jo sab dharmon keee samasyayon ka scientific uttar detaa hai isase jyadaa mai kuchh nahee kah saktaa ki satanat hindu dharm ke vikash hetu sab dharm bane hain atah ham sab dharmon kaa adar karate hain vah chahe islam ho yaa isaayee dharm.

Phir bhee aaj tak koi aisaa vigyaan yaa parikalpanaa nahee utpanna huyee jiske uttar santan hindu dharm me pahale se maujood n hon. Atha jo log aaj tak sanatan dharmee bane huye hain unko unko dharm pariartan karane ki jaroorat kabhee nahee hain.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ Jai hind pandev ! जो आदमी गीता जी के बारे में नहीं जानता वह आपकी तरह ही सोचना है और ऐसे ग़लत दावे करता है जिन्हें कभी साबित नहीं किया जा सकता है ।
आज ही मैंने भाई तारकेश्वर जी की पोस्ट पर एक टिप्पणी दी है ।
कृप्या आप उस पर एक नज़र डाल लीजिए -
'@ तारकेश्वर जी ! आपकी तबियत तो ठीक है न ?
आज आप क्यों तुलसी जी और पीपल जी के पीछे पड़ गए?

तेल लगाना वाक़ई बुरी बात है । तेल वहीं लगाना चाहिए जहां कि वास्तव में उसके लगाने से किसी का कष्ट दूर होता हो ।
जो करोड़ों भक्त भगवान समझकर पेड़ के तेल लगा रहे हों उनकी निंदा करके आपने महान सुधारकों जैसा काम अनायास ही कर डाला है ?

श्री कृष्ण जी गीता जी में कहते हैं कि
मैं समस्त वृक्षों में पीपल हूं । - गीता , 10 , 26
सांपों में वासुकि हूं । -गीता 10, 28
मछलियों में मगरमच्छ हूं ।
-गीता 10, 31

जब कोई हिंदू अपने बाप को साँप और मगरमच्छ नहीं कह सकता तो फिर ईश्वर का सम्मान करने का यह कौन सा तरीक़ा है ?

धन्यवाद !'

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

मेरे सवालो से चुपचाप बच कर सरक लिए जमाल साहब

Bhakt Vatsal Pathak "Vatsal" ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Bhakt Vatsal Pathak "Vatsal" ने कहा…

Mishra ji, aap pahle hi kah chuke hai k 99 per 1 hamesa bhari padta hai to zamal saab k majburi .......

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

पेय पदार्थ को अरबी में 'शराब' कहते हैं और 'तहूरा' का अर्थ पवित्र होता है। हमारा रब जन्नत में 'शराबन तहूरा' अर्थात पवित्र पेय पिलाएगा। इसमें ऐतराज़ कैसा ?
@ डा. मिश्रा जी ! आप ऐसा न सोचा करें , ख़ास तौर से मेरे बारे में । हमें तो शायद आज मालिक ने बचाया ही इसलिए है कि हम सब यहाँ मिलकर हरिचर्चा जो कर रहे हैं बिना किसी दर्भावना के । अभी जंगल से लौटते वक़्त आज मेरा एक्सीड़ेंट हो गया है। मेरे साथ पुष्कर तोमर भी थे । एक्सीडेंट नीलघोड़े की वजह से हुआ। हम दोनों के चेहरे छिल गए । शहर आकर पहले नमाज़ पढ़ी , फिर मरहम पट्टी करवाई , चश्मा दिया नए लेंस लगाने के लिए और फिर तुरंत आपके ब्लाग पर आया । आपसे हमें प्यार कितना है , अब आप समझ सकते हैं ।
अभी अभी अपने घर पहुँचा हूँ और खाना आने की इंतजार में अपना ईमेल चेक किया तो आपका यह कमेँट मिला ।
इस कमेंट के बारे में मैं यह कहना चाहूंगा कि आप इसका हिंदी अनुवाद यहां लिखें और फिर वेद पुराणों में जहां स्वर्ग नर्क का वर्णन आया है , उसे भी यहाँ लिखें । आपके ऐसा करते ही आपकी शंका मेरे जवाब दिए बिना स्वतः ही निर्मूल हो जाएगी ।
'वेद कुरआन' ब्लाग पर वेद आदि में स्वर्ग के विषय पर मैंने कुछ माह पहले एक लेख भी लिखा है , आप उसे भी देख लीजिएगा ।

दोस्त , जिसे हम प्यार करते हैं तो फिर हम उसे मरते मरते भी नहीं भूलते , याद रखना।

रह गई बात पुराने अंदाज़ की तो जब कोई ग़द्दार और छिद्रान्वेषी का इल्ज़ाम देकर बात करेगा और मेरे द्वारा टाले जाने के बावजूद मेरे विचार कुरेद कुरेद कर पूछेगा तो फिर मुझसे किसी नॉर्मल अंदाज़ की उम्मीद
रखने का कोई औचित्य नहीं है ।
अब आपने सीधे सीधे कुरआन के विषय में अपना एक प्रश्न रखा है । यह बिल्कुल एक ठीक तरीका है । अपने नॉर्मली पूछा है और मैं भी नॉर्मली ही जवाब दूंगा ।
आप मुझ पर या इस्लाम पर कुछ भी इल्ज़ाम नहीं लगा रहे हैं तो मैं भी ख़ामख़्वाह आपको कुछ न कहूंगा ।
दूसरे टिप्पणीकार भी ध्यान दें कि उग्रता दिखाने और आरोप लगाने के बाद अगर उन्हें जवाब उनकी ही शैली में मिले तो फिर इल्ज़ाम अनवर जमाल को देने के बजाए खुद को ही दें ।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

पेय पदार्थ को अरबी में 'शराब' कहते हैं और 'तहूरा' का अर्थ पवित्र होता है। हमारा रब जन्नत में 'शराबन तहूरा' अर्थात पवित्र पेय पिलाएगा। इसमें ऐतराज़ कैसा ?
@ डा. मिश्रा जी ! आप ऐसा न सोचा करें , ख़ास तौर से मेरे बारे में । हमें तो शायद आज मालिक ने बचाया ही इसलिए है कि हम सब यहाँ मिलकर हरिचर्चा जो कर रहे हैं बिना किसी दर्भावना के । अभी जंगल से लौटते वक़्त आज मेरा एक्सीड़ेंट हो गया है। मेरे साथ पुष्कर तोमर भी थे । एक्सीडेंट नीलघोड़े की वजह से हुआ। हम दोनों के चेहरे छिल गए । शहर आकर पहले नमाज़ पढ़ी , फिर मरहम पट्टी करवाई , चश्मा दिया नए लेंस लगाने के लिए और फिर तुरंत आपके ब्लाग पर आया । आपसे हमें प्यार कितना है , अब आप समझ सकते हैं ।
अभी अभी अपने घर पहुँचा हूँ और खाना आने की इंतजार में अपना ईमेल चेक किया तो आपका यह कमेँट मिला ।
इस कमेंट के बारे में मैं यह कहना चाहूंगा कि आप इसका हिंदी अनुवाद यहां लिखें और फिर वेद पुराणों में जहां स्वर्ग नर्क का वर्णन आया है , उसे भी यहाँ लिखें । आपके ऐसा करते ही आपकी शंका मेरे जवाब दिए बिना स्वतः ही निर्मूल हो जाएगी ।
'वेद कुरआन' ब्लाग पर वेद आदि में स्वर्ग के विषय पर मैंने कुछ माह पहले एक लेख भी लिखा है , आप उसे भी देख लीजिएगा ।

दोस्त , जिसे हम प्यार करते हैं तो फिर हम उसे मरते मरते भी नहीं भूलते , याद रखना।

रह गई बात पुराने अंदाज़ की तो जब कोई ग़द्दार और छिद्रान्वेषी का इल्ज़ाम देकर बात करेगा और मेरे द्वारा टाले जाने के बावजूद मेरे विचार कुरेद कुरेद कर पूछेगा तो फिर मुझसे किसी नॉर्मल अंदाज़ की उम्मीद
रखने का कोई औचित्य नहीं है ।
अब आपने सीधे सीधे कुरआन के विषय में अपना एक प्रश्न रखा है । यह बिल्कुल एक ठीक तरीका है । अपने नॉर्मली पूछा है और मैं भी नॉर्मली ही जवाब दूंगा ।
आप मुझ पर या इस्लाम पर कुछ भी इल्ज़ाम नहीं लगा रहे हैं तो मैं भी ख़ामख़्वाह आपको कुछ न कहूंगा ।
दूसरे टिप्पणीकार भी ध्यान दें कि उग्रता दिखाने और आरोप लगाने के बाद अगर उन्हें जवाब उनकी ही शैली में मिले तो फिर इल्ज़ाम अनवर जमाल को देने के बजाए खुद को ही दें ।

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

..@ अनवर जमाल और आप जो यह भितरघाती होने क़ा आरोप लगा चुके है उस बारे में कुछ नहीं
सारा मामला शब्दों के खेल क़ा है यह बंद कीजिये
खुदा क़ा खैर है आप सही सलामत रहे में ऊपर वाले से दुआ है और इस दुआ के सहारे आपका बाल भी बांका ना होगा ऐसा मेरा विस्वास है

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

..@ अनवर जमाल और आप जो यह भितरघाती होने क़ा आरोप लगा चुके है उस बारे में कुछ नहीं
सारा मामला शब्दों के खेल क़ा है यह बंद कीजिये
खुदा क़ा खैर है आप सही सलामत रहे में ऊपर वाले से दुआ है और इस दुआ के सहारे आपका बाल भी बांका ना होगा ऐसा मेरा विस्वास है

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

..@ अनवर जमाल और आप जो यह भितरघाती होने क़ा आरोप लगा चुके है उस बारे में कुछ नहीं
सारा मामला शब्दों के खेल क़ा है यह बंद कीजिये
खुदा क़ा खैर है आप सही सलामत रहे में ऊपर वाले से दुआ है और इस दुआ के सहारे आपका बाल भी बांका ना होगा ऐसा मेरा विस्वास है

अमित शर्मा ने कहा…

@ जमाल साहेब ईश्वर आपको सलामत रखे, आप जल्द ही इन चोटों से स्वस्थ हो यही प्रार्थना है.
हाँ छिद्रान्वेषी शब्द पर आपको उत्तेजित नहीं होना चहिये, क्या आप वैदिक धर्म में पैदा हुए छिद्रों (विकारों) का अन्वेषण कर सबके सामने लाने का पराक्रम नहीं कर रहें है (आप ही के अनुसार ) ?????

@ मासूम साहेब -
वह दूसरा जीव मैं खुद ही हूँ . जमाल साहेब के ब्लॉग पर पंकज सिंह राजपूत जी की टिपण्णी के प्रती आपने यही कहा था ना -----
Blogger एस.एम.मासूम said...

किसने कहा की अनवर जमाल और अमित शर्मा का धर्म युद्ध हो रहा है? ऐसी बकवास ना करें और दिलों मैं नफरत ना फैलें. एक ज्ञानी और अज्ञानी का युद्ध वैसे भी नहीं हो सकता.

November 26, 2010 11:53 पम
-------------------
पवन भैया एक बार फिर क्षमा-प्रार्थी हूँ , इस व्यक्तिगत टिपण्णी के लिए

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

अपने धर्म के वफ़ादार बनने का तरीक़ा
@ जनाब पवन कुमार मिश्रा जी ! आप अपने वर्ण 'ब्राह्मण' के अनुसार 6 काम कर सकते हैं ।
1. यज्ञ करना
2. यज्ञ कराना
3. पढ़ना
4. पढ़ाना
5. भिक्षा मांगना
6. भिक्षा देना
इनमें से आप 3 काम , पढ़ना, पढ़ाना और भिक्षा देना तो करते ही हैं । आप बाक़ी के 3 काम भी किया करें ।
आप एक वैदिक गृहस्थ हैं। जब तक आपको संतानोत्पत्ति की इच्छा न हो , मुसलमानों की तरह अपनी पत्नी के क़रीब न जाएं । पत्नी जब गर्भवती हो या बच्चे को दूध पिला रही हो , तब भी मैथुन से बचें। पत्नी जब मासिक धर्म से हो तो मुसलमानों की तरह उसे अपने साथ शय्या पर न लिटायें और उसके हाथ का पका हुआ न खायें। गर्भाधान संस्कार को भी विधिवत शास्त्रीय विधि के अनुसार संपन्न करें , जैसे कि आपने विवाह संस्कार संपन्न किया है।
आप 50 वर्ष की आयु होते ही वानप्रस्थी हो जाना ।
वैदिक धर्म के अनुसार प्रत्येक हिंदु के लिए धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की सिद्धि के लिए ऐसा करना अनिवार्य है । अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपको वैदिक जीवन पद्धति का पालन करने वाला नहीं बल्कि उसका नाश करने वाला ही माना जाएगा । अपने धर्म का त्याग करने वाले को आप ग़द्दार समझते हैं , ऐसा आपने बताया है तभी मैंने दोहराया है । अगर अपने उसूल की गिरफ्त में आप खुद ही फंस रहे हैं तो क्या आप उसूल ही बदल डालेंगे। अगर दूसरे पर चोट पड़े तो आपको कोई परवाह नहीं लेकिन अगर आप फंसे तो अनवर जमाल उसूल बदल डाले।
हरगिज़ नहीं ।
बदलना आपको होगा। जिस धर्म का झंडा आप लेकर चल रहे हैं , उस पर आपको चलना भी होगा ।
यही बात मेरे लिए भी है।
एक मुस्लिम होने के कारण मुझ पर एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण करना अनिवार्य है । मुझ पर नमाज़ और रोज़ा भी अनिवार्य है और अगर मैं एक निश्चित धन का स्वामी हूँ तो फिर ज़रूरतमंदों को ज़कात देना और हज करना भी मुझ पर फ़र्ज़ है । मेरे लिए लाज़िम है कि मैं अपने देश के क़ानून का पालन करूँ । समाज में शांति से रहूं और शांति फैलाऊं । न पाखंड ख़ुद रचूं और न किसी को रचने दूं। ईश्वर की महिमा गाऊं और उसके सत्पुरूषों का आदर करूँ और उनके आदर्श का पालन करूँ विशेषतः पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का। किसी ऋषि और नबी-रसूल का न तो ख़ुद निरादर करूं और न ही किसी और को करने दूं । सभी लोगों को एक मालिक, अल्लाह का बंदा और एक बाप आदम की औलाद समझूं। उनके साथ भलाई करूं , बुराई कभी न करूं।
जो कोई मुझ पर ज़ुल्म करे तो मैं उसे माफ़ कर दूं या बदला लूं तो केवल उतना ही जितना कि मेरे साथ किया गया है ।
पराई औरतों के साथ व्याभिचार न करूं। अपने मन में भी उनके साथ कामुक कल्पनाएं न करुं । अपनी पत्नी के साथ भी हद से न निकलूं । किसी तरह का नशा न करूं। हत्या, चोरी, ठगी, झूठ, समलैंगिकता, ब्याज लेना-देना , मिलावट करना, देशद्रोह करना, रिश्वत लेना, जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी करना, काला धन रखना, लोगों से छूतछात मानना या जाति के आधार पर उन्हें ऊंचा नीचा मानना, किसी पर ख़ुद ज़ुल्म करना या दूसरे को करते देखकर चुप रहना, बाप की विरासत में लड़कियों को हिस्सा न देना आदि हरेक जुर्म मेरे लिए पाप है , जिससे बचने का हुक्म मुझे इस्लाम देता है और मैं अपनी पूरी ताक़त के साथ इनसे बचता भी हूं और जो काम इस्लाम के अनुसार मुझ पर फ़र्ज़ हैं , उन सभी को मैं करता हूं । अगर मैं ऐसा न करूं बल्कि मैं इन नियमों को छोड़कर उनके ख़िलाफ़ करने लगूं और कोई मुझे इस फ़्रॉडगर्दी से रोके तो मैं उसी पर इल्ज़ाम धरने लगूं तो आप मुझे इस्लाम का ग़द्दार समझना और आप ऐसा समझने में बिल्कुल ठीक होंगे।
जब मैं अपने धर्म पर चलता हूँ तो आप अपने धर्म पर क्यों न चलेंगे ?
और जब आप नहीं चलेंगे तो मैं आपको वैदिक धर्म का ग़द्दार क्यों न समझूंगा ?

अगर आप चाहते हैं कि आपको वास्तव में धार्मिक माना जाए तो आप वैदिक जीवन पद्धति पर चलिए , बस।
आप मुसलमान नहीं बनना चाहते तो न बनें लेकिन भाई आप ख़ुद अपने वर्ण धर्म और संस्कारों का पालन आख़िर क्यों नहीं करते ?
आप मुझे इसका कोई तो कारण बताएं ?

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

पेरियार आपके देवताओं की मूर्तियों के गले में जूतों की माला डालकर उनका जुलूस पहले पूरे शहर में निकालते थे और फिर उन्हें ले जाकर कूड़े के ढेर पर फोड़ देते थे। आपने उनका विरोध कितनी बार किया ?
मैं जनाब पवन मिश्रा जी और अपने अनुज अमित जी का शुक्रगुज़ार हूं ।
@ अमित जी आप ख़ुदा और उसके रसूल को गालियां देने वाले भंडाफोड़ु का उत्साहवर्धन करते हैं । उसके बावजूद मैंने जब भी आपको संबोधित किया है
प्रिय मोहक मुस्कान स्वामी
मेरे मनमोहक भाई अमित जी
या
आदरणीय पंडित जी कहकर ही संबोधित किया है क्योँकि आपका मासूम तबस्सुम शुरू से ही मेरे दिल पर क़ाबिज़ है।
कटाक्ष करना मैं भी जानता हूं और ऐसा जानता हूं कि उसे हरेक आदमी ख़ूब समझेगा लेकिन उसे हरगिज़ सिद्ध नहीं कर सकता। आप ख़ुद एक बार किसी और के मामले में इसे देख चुके हैं । इस फ़न में मुझे 'उरूज' हासिल है। इसके बावजूद आप मुझे अपने प्रति कहीं एक शब्द नहीं दिखा सकते कि कहीं मैंने आपको ऐसा अपशब्द कहा हो जिसे दुर्गुण के लिए बोला जाता हो ।
अगर आप तंत्रमार्गी गोरखनाथ, बुद्ध, नानक साहब , कबीर , दयानंद जी , विवेकानंद जी , अंबेडकर और पेरियार के लिए भी पूर्व में कभी ऐसे शब्द इस्तेमाल कर चुके हों तो बताएं तब मुझे कोई ऐतराज़ न होगा। हिंदू धर्म की परंपराओं की आलोचना मुझसे ज्यादा तो इन लोगों ने की है । इनके विरोध में तो आपकी एक लफ़्ज़ बोलने की हिम्मत नहीं है जबकि बुद्ध ने आपके यज्ञ बंद कराए और पेरियार आपके देवताओं की मूर्तियों के गले में जूतों की माला डालकर उनका जुलूस पहले पूरे शहर में निकालते थे और फिर उन्हें ले जाकर कूड़े के ढेर पर फोड़ देते थे। पेरियार मेले में आज भी यही किया जाता है । उनके बारे में कभी आपने कुछ कहा हो तो बताएँ ?

अपनी पहली टिप्पणी में आप कह रहे हैं कि दूसरों की उपासना के तरीकों की आलोचना नहीं करनी चाहिए तब आपने खुद क्यों कुरबानी की आलोचना भी जमकर की और उसके लिए अपने जैसे कई दर्जन हिंदू भी आपने इकट्ठा कर लिए थे ?
क्या आप नहीं जानते थे कि कुर्बानी इस्लाम में इबादत है ?
आप अपने उसूल पर क्यों नहीं चलते ?
मेरी किसी एक पोस्ट का हवाला दीजिए कि जहाँ मैंने किसी हिंदू ऋषि , रामचंद्र जी या कृष्ण जी जैसे महापुरूष को बुरा कहा हो ?

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

जमाल साहब आपकी मति पर मुझे अब हँसी आती है
पर उपदेश कुशल बहुतेरे जे आचारही ते नर ना घनेरे वाली बात है. आप अपना घर संभालिये फिर उपदेश दीजिये
हिन्दुस्तान में जितने गंडे ताबीज़ मुसलमानों द्वारा प्रयुक्त किये जाते है जितनी मजारे बनी है उन मजारो की परस्ती में आप भी शामिल होकर गैर इस्लामिक कृत्या करते है अभी आप ग़ालिब के बुत के पास खड़े होके ग़ालिब की स्तुतिगान किया था यह सब कुफ्र है यदि आप बुत परस्त ना हो तो ग़ालिब समेत तमाम औलिया चिश्ती. जितनी भी दरगाहे है सब को कम से कम आप ज़मीदोज करके माने अन्यथा धरम पर कुछ ना लिखने की कसम खाइए या इसलाम से तौबा कीजिये
आज गली गली पीर फ़कीर औलिया जिन्न झाड़ते मिल जायेगे ये क्या है
इसलाम को सरेशाम बदनाम करने वाले फिल्म कलाकार (इसलाम में अभिनय करना हराम है.ना विश्वास हो दो देवबंदियो से पूछो) संगीत कर सूफी लोगो को सुधारों वैसे सुना है कही आप भी अभिनय कर रहे है. इसके बाद मुझसे बहस करना सिर्फ चन्द अक्षर को कॉपी करके जो बाते मुझे बता रहे है उसका कोई मतलब नही है आप भ्रम में कब तक रहेगे भ्रम से निकलिए जनाब भ्रम भी कुफ्र है
ऐसे बुतपरस्तो से खुदा इसलाम को बचाए
आमीन

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ जनाब पवन कुमार मिश्रा जी ! मैंने कब खुद मज़ारपरस्ती की है भाई ?
बल्कि जब मुझसे भाई मान जी ने एक दरगाह पर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की शिकायत की तो मैंने उन्हें वहां जाने से रोका।
क्या मज़ारपरस्ती करने वाला कभी किसी को वहां जाने से रोकता है ?
मैंने बताया कि ग़ालिब शराब पीते थे और उन्होंने समाज को नेक रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं की बल्कि वह खुद को भी नेक न बना पाए ।
क्या इसे ग़ालिब का स्तुतिगान कहा जाएगा ?

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

जनाब जमाल साहब आप शब्दों के खिलाड़ी है जैसा कि खुद कह चुके है आप से बहस करना अब मै मुनासिब नही समझता
कुछ लोग ऐसे होते है जिहे कोई बात अपने आगे समझ में नही आती आप भी उसी कोटि के प्राणी है इस रात की सुबह नही है. ऐसे ही दुर्योधन को कृष्ण जैसा योगी व्यक्ति नही समझा सका. आपको बुरा ना लगे किन्तु इन्ही रावनो कन्सो और दुर्योधनो की वजह से संग्राम होते है हुसैन भी ऐसो की वजह से ज़िंदगी भर कष्ट में रहे रसूल साहब को भी अपने निवास से भागना पडा था
मै ये बहस ख़त्म करता हूँ और शायद हमारी आपकी मुलाकात और बात भी.
बड़े अरमान से मैंने आपको प्यार किया था पर आपने उसे समझा नही या समझने की क्षमता ही नही रख पाते
बहरहाल जो भी अल विदा
आपके रास्ते कि सबसे बड़ी रुकावट मै हूँ और ताकत भी अब मै देखता हूँ कि आपकितना उड़ते है
अभी मै स्रष्टा था अब मै द्रष्टा हूँ

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

ऐ दोस्त ! अलविदा , ॐ शांति
@ मिश्रा जी ! आप मुझे इस देश का कानून तोड़ने के लिए क्यों उकसा रहे हैं ?
ग़ालिब का बुत और मज़ार मेरी प्रॉपर्टी नहीं हैं । उन्हें तोड़ने की बात कहकर आप मुझे क्राइम करने की प्रेरणा दे रहे और फिर भी अपनी मति पर हंसने के बजाए आप मेरी मति पर हंस रहे हैं ?
जहाँ गंभीर वार्तालाप चल रहा हो , वहां आप हंस क्यों रहे हैं ?
आप हंसने के बजाय तर्क दीजिए और बताईये कि मैं तो आपको वैदिक आचार और संस्कार के पालन की , देश के क़ानून के पालन की शिक्षा दे रहा हूं और उसका जवाब हाँ में देने के बजाय आप मुझे मूर्तियां और मज़ार तोड़कर जुर्म करने की दुष्प्रेरणा दे रहे हैं?
और जब मैं ऐसा जुर्म करने के लिए तैयार नहीं हूँ तो आप मुझे कंस कह रहे हैं ?
भाई मैंने कंस की तरह कब किसी का राज्य क़ब्ज़ाया या कब किसी की लड़कियां मारीं ?
आपने मुझे दुर्योधन कहा , दुर्योधन फिर भी ग़नीमत था पांडवों की अपेक्षा। पांडवो से एक लाख दरजे अच्छे तो आप ही हैं ।

जब आदमी तर्क देने के बजाय हंसने लगे और बुरे लोगों से उपाधियां देने लगे तो समझिए कि उसके पास अपने पक्ष को सत्य सिद्ध करने के लिए कोई भी तर्क मौजूद नहीं है ।
मेरी ताक़त मेरे विरोधियों का विरोध है। आपने मेरा विरोध किया , आपने मुझे मज़बूत किया। आप मुझे पढ़ते हैं तो भी आप मुझे मज़बूत ही करते हैं । आप मुझे पढ़ना बंद कर दीजिए मेरी ताक़त घटती चली जाएगी । आज आप यह प्रण कीजिए कि मेरा कोई भी ब्लाग आप हरगिज़ नहीं पढ़ेंगे।


अब आप आराम से अकेले हंसते रहिए , हम यहां से रूख़्सत होते हैं बिना हंसे ।

मालिक आपको और हमें सन्मार्ग दिखाए ।

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

"काटे चाटे श्वान के दुहु भाँती विपरीत"
मैंने तुम्हे मौका दिया था क्योकि शरण में आये लोगो को हम पनाह देते है
तुम्हे आगाह किया जाता है कि अपनी आदतों से बाज आ जाओ. क्योकि बाद में तुम्हे सिर्फ पछतावे के सिवा कुछ न मिलेगा
अल्लाह तुम पर से शैतान की छाया हटाये

manu ने कहा…

कि ग़ालिब शराब पीते थे और......

( उन्होंने समाज को नेक रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं की बल्कि वह खुद को भी नेक न बना पाए ।)



kaun kahtaa hai...............?????????????

manu ने कहा…

कि ग़ालिब शराब पीते थे और......

( उन्होंने समाज को नेक रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं की बल्कि वह खुद को भी नेक न बना पाए ।)



kaun kahtaa hai...............?????????????