रविवार, 23 जनवरी 2011

कागजो से शौच बनाम पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली का आयोजन run for saving environment

                                                                  
मैंने अपने नए ब्लॉग http://haridhari.blogspot.com/ जो पर्यावरण संक्षण के लिए समर्पित है पर इस पोस्ट को छपा था किन्तु तकनिकी कारणों से यह हमारीवानी पर दिखाई नहीं दे रही है अतः सुधी पाठको के लिए इसे यहाँ दे रहा हूँ.
 आजकल पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली निकालने का बड़ा चलन है. सवाल यह है कि इस दौड़ में भाग कौन लेता है? इसमें बड़े बड़े पूजीपति उद्योगपति अभिजात्य तबके के लोग जोर शोर से भाग लेते है. ये लोग खुद तो दौड़ कर क्या दिखाना चाहते है. हरी धरती के सबसे बड़े शत्रु यही लोग है. शौच के लिए पानी नहीं उत्तम कोटि के कागजो का प्रयोग करते है फिर पेड़ो को बचाने के लिए रैली का आयोजन करेगे.
दुनिया में मात्र ७ % अभिजात्य देशो से ५० % कार्बन का उत्सर्जन होता है. सच यह है कि सुविधाभोगी वर्ग प्रजातंत्र के सहारे सामान्यजन को अपराधबोध से ग्रस्त करता है. और इस शोर शराबे में मूल प्रश्न दबे रह जाते है.
पर्यावरणीय समस्या की गहन पड़ताल अंततः स्थापित तत्कालीन व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है. यह स्वाभाविक है कि ऐसा कोई भी प्रयास स्थापित शक्तिकेंद्रो(सरकारे) के हितो के अनुकूल नहीं हो सकता. ऐसी स्थिति में ये शक्तिकेंद्र या तो पड़ताल की दिशा मोड़ने का कार्य करते है या दमन का सहारा लेते है. वर्तमान पर्यावरणीय विमर्श में ये दोनों स्थितिया देखी जा सकती है.
हरी धरती शौच हेतु या जहा कपडे का या जल के प्रयोग प्रयोग से काम होता है वहा इस प्रकार के कागजो के प्रयोग न करने का आवाहन करती है. क्योकि इन कागजो को बनाने में जितना पानी खर्च होता है जितने पेड़ काटे जाते है उसका दसवा हिस्सा पानी भी इन कार्यों  में खर्च नहीं होता है.

14 टिप्‍पणियां:

Abhinav Chaurey ने कहा…

nice information. well i don't think even 10% of indians are using paper. post is fit for foreigners. Nice analysis.
One suggestion - don't read while dinner. he he he

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

आज कल विदेशियों सी दिखने और महसूस करने की चाह भी हिन्दुस्तानियों में घर करती जा रही है इससे वे अपने भाइयो की नजर में ऊंचा उठाना चाहते है.
कागज क़ा इस्तेमाल लिखने होना चाहिए ना कि टायलेट के लिए.

chandra ने कहा…

यह एक गंदी संस्कृति है
केवल पर्यावरण ही नहीं वरन मानव समाज के लिए कलंक है अभी भी यह आदिम युग की वहशत की याद दिलाती है.

chandra ने कहा…

आप हमेशा की तरह मेरे हीरो रहेगे चाहे कितना ही मुझे डांटे या दंड दे

Dr Kiran ने कहा…

बहुत सही मुद्दा
इसके अनेको आयाम है
यह पर्यावरण और मानवीय समाज की दुर्दशा को दर्शाता है.

Dr Kiran ने कहा…

बात आगे जय और हुक्मरानों के कानो में बजे परिवर्तन हो इसके लिए महज ब्लॉग ही नहीं अधिक प्रयास की जरूरत

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

मेरी कोशिश यही है कि सूरते बदलनी चाहिए
ब्लागिंग तो आगाज है
--

ashish ने कहा…

सटीक बात कही है . कागज का यह प्रयोग सचमुच निंदनीय है .

ManPreet Kaur ने कहा…

dr pawan jii bouth he aacha post hai aapka.... nice job... good

Pleace visit My Blog Dear Friends...
Lyrics Mantra
Music BOl

Swarajya karun ने कहा…

आपने एक अहम समस्या की ओर ध्यान खींचा है लेकिन पर्यावरण को दूषित करने के और भी कई कारण हैं, जिनके लिए धन-पशुओं को ज़िम्मेदार माना जा सकता है. जैसे-अपनी अमीरी के प्रदर्शन के लिए उनके अस्तबल में डीज़ल-पेट्रोल चलित गाड़ियों की भरमार . धुंआ -प्रदूषण फैला कर ये लोग पर्यावरण को सबसे ज्यादा बिगाड़ रहे हैं. पौलिथिन के रंग-बिरंगे पैकेटों में और प्लास्टिक की बोतलों में अपने उत्पादनों की मार्केटिंग भी आखिर कौन कर रहा है ? बेकार समझे जाने वाले पौलिथिन और प्लास्टिक के खाली डिब्बों ,पाउचों और बोतलों की रि-सायकलिंग के बारे में कोई भी गंभीरता से नहीं सोच रहा है .

एस.एम.मासूम ने कहा…

पवन जी सत्य कहा है.

"पलाश" ने कहा…

आपने बहुत विचारणीय मुद्दा उठाया है यह एक शोध का विषय है | पर्यावरण संरक्षण बनाम आधुनिकता |
बहुत गंभीरता से इसे लेने की जरूरत है

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

हरी धरती शौच हेतु या जहा कपडे का या जल के प्रयोग प्रयोग से काम होता है वहा इस प्रकार के कागजो के प्रयोग न करने का आवाहन करती है. क्योकि इन कागजो को बनाने में जितना पानी खर्च होता है जितने पेड़ काटे जाते है उसका दसवा हिस्सा पानी भी इन कार्यों में खर्च नहीं होता है.
Nice post.
26 जनवरी पर एक ख़ास अपील
कुदरत क़ानून की पाबंद है लेकिन इंसान क़ानून की पाबंदी को अपने लिए लाज़िम नहीं मानता। इंसान जिस चीज़ के बारे में अच्छी तरह जानता है कि वे चीज़ें उसे नुक्सान देंगी। वह उन्हें तब भी इस्तेमाल करता है। गुटखा, तंबाकू और शराब जैसी चीज़ों की गिनती ऐसी ही चीज़ों में होती है। दहेज लेने देने और ब्याज लेने देने को भी इंसान नुक्सानदेह मानता है लेकिन इन जैसी घृणित परंपराओं में भी कोई कमी नहीं आ रही है बल्कि ये रोज़ ब रोज़ बढ़ती ही जा रही हैं। हम अपनी सेहत और अपने समाज के प्रति किसी उसूल को सामूहिक रूप से नहीं अपना पाए हैं। यही ग़ैर ज़िम्मेदारी हमारी क़ानून और प्रशासन व्यवस्था को लेकर है। आये दिन हड़ताल करना, रोड जाम करना, जुलूस निकालना, भड़काऊ भाषण देकर समाज की शांति भंग कर देना और मौक़े पर हालात का जायज़ा लेने गए प्रशासनिक अधिकारियों से दुव्र्यवहार करना ऐसे काम हैं जो मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ भी हैं और इनसे आम आदमी बेहद परेशान हो जाता है और कई बार इनमें बेकसूरों की जान तक चली जाती है।
इस देश में क़ानून को क़ायम करने की ज़िम्मेदारी केवल सरकारी अफ़सरों की ही नहीं है बल्कि आम आदमी की भी है, हरेक नागरिक की है। 26 जनवरी के मौक़े पर इस बार हमें यही सोचना है और खुद को हरेक ऐसे काम से दूर रखना है जो कि मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ हो। मुल्क के हालात बनाने के लिए दूसरों के सुधरने की उम्मीद करने के बजाय आपको खुद के सुधार पर ध्यान देना होगा। इसी तरह अगर हरेक आदमी महज़ केवल एक आदमी को ही, यानि कि खुद अपने आप को ही सुधार ले तो हमारे पूरे मुल्क का सुधार हो जाएगा।
http://charchashalimanch.blogspot.com/2011/01/26th-january.html

Ravindra Nath ने कहा…

पवन जी आपने एकदम सही बात कही है। इसके अतिरिक्त और भी कई बातें हैं जो इनके कथनी और करनी के भेद को उजागर करती हैं - यथा शुद्धता के नाम पर डब्बा बंद वस्तुओं को बढावा (ये बोतल बंद या डब्बा बंद वस्तुए कितनी स्वास्थ्य वर्धक होती हैं अक्सर समाचारों मे आता है) , घर घर प्रशीतकों को बढावा, शायद ही कोइ पर्यावरण वादी हो जो वातानुकूलित घर मे न रहता हो (क्या पंखे से काम नही चल सकता?, इस देश मे कितने लोग इसी से काम चलाते हैं और सुखी हैं), प्रत्येक सेमीनार मे हवाईजहाज से जाना - क्या यही एक मार्ग है? बहुत सी बातें हैं, अब इसमे टट्टी कागज़ और जुड गया।