गुरुवार, 20 जनवरी 2011

चाँद जागता रहा, रात हुई माधुरी







धूप फागुनी खिली
बयार बसन्ती चली,
सरसों के रंग में
मधुमाती गंध मिली.

मीत के मन प्रीत जगे
सतरंगी गीत उगे ,
धरती को मदिर कर
महुए  हैं  रतजगे.

अंग अंग दहक रहे
पोर पोर कसक रहे,
पिय से मिलने को
रोम रोम लहक रहे.

अधर दबाये हुए
पुलक रही है बावरी,
चाँद जागता रहा
रात हुई माधुरी.











22 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

गज़ब की भावाव्यक्ति है।

Aseem ने कहा…

अच्छी कविता है पवन जी..!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

पवन भाई, आपका रूमानी अंदाज दिल छू गया। जितनी तारीफ करूं, कम है।


---------
ज्‍योतिष,अंकविद्या,हस्‍तरेख,टोना-टोटका।
सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है ?

ehsas ने कहा…

oh!very nice.

कविता रावत ने कहा…

धूप फागुनी खिली
बयार बसन्ती चली,
सरसों के रंग में
मधुमाती गंध मिली
...सुन्दर फगुनाती बसंती की चित्रमय झलक बहुत अच्छी लगी ..

Minakshi Pant ने कहा…

सुन्दर रचना !

आलोकिता ने कहा…

achi bhawpurn rachna

एस.एम.मासूम ने कहा…

मीत के मन प्रीत जगे
सतरंगी गीत उगे ,
धरती को मदिर कर
महुए हैं रतजगे.
.
अति सुंदर

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छा, सरस रोचक और गेय गीत।

आशीष मिश्रा ने कहा…

बहोत ही सुन्दर कविता

दीप्ति शर्मा ने कहा…

bahut sunder rachna
...
mere blog par
"jharna"

दीप ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है आप की भावविभोर कर देने वाली है
बहुत बहुत शुभकामना

Dr Kiran ने कहा…

kya baat hai dr saahab

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

'वाह' शब्द उस चीज़ के लिए बोला जाता है जो कि काबिले तारीफ़ होती है.
'वाह वाह' का मतलब है कि चाएज़ निहायत ही उम्दा है .लेकिन जिस चीज़ कि तारीफ़ के लिए 'वाह वाह'
लफ्ज़ भी छोटा पड़ जाये और मन में उभरने वाले अहसासात को ज़ाहिर करने के लिए कोई लफ़्ज़ न मिले तब उस रचना की अज़्मत को और उस रचनाकार की महानता को सलाम करने के लिए कोई चीज़ भेंट दी जाती है . सबसे बड़ी भेंट है जीवन का एक अंश किसी को देना , अपना समय दे देना , जो कि एक प्रशंसक देता है अपने प्रिय कलाकार को . जीवन का अर्थ है समय और धन प्राप्ति में भी समय ही खपाना पड़ता है तब कुछ मुद्रा हाथ आती है . मूल्य धन का नहीं है . मूल्य है समय का जो कि मुद्रा में रूपांतरित हो जाता है . किसी विचार का कोई मूल्य नहीं है . मूल्य उस भाव का है जो कि एक रचनाकार अपनी रचना में प्रकट करता है , मूल्य उस भाव का है जो उसका प्रशंसक उसे भेंट करते समय अपने दिल में रखता है . मूल्य उस प्रेम का है जो रचनाकार और उसके प्रशंसकों के दरमियान होता है .
आपकी यह कविता ब्लाग जगत की ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की भी एक अनुपम कृति है . इसने मुझे अन्दर तक अभिभूत कर दिया है . अपने जज़्बात को आप पर ज़ाहिर करने कि ख़ातिर एक छोटी सी भेंट आपको प्रेषित है , उसे स्वीकार करके आप मुझे शुक्रिया का मौक़ा दें . इस अनुपम रचना को मैं अपने ब्लाग 'मन की दुनिया' पर पेश कर रहा हूँ .
धन्यवाद.
http://mankiduniya.blogspot.com/2011/01/moon-on-bed.html

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

ओए होए होए...
सचमुच एक कसक सी पैदा करती है कविता...
सारा दृश्य जीवंत कर दिया है आपने.....
गज़ब.....................

Anjana (Gudia) ने कहा…

bahut sunder!

Ravindra Nath ने कहा…

पवन जी रंगा सियार आपको मक्खन मार रहा है।

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

रविन्द्र नाथ जी
एक शेर अर्ज है
इन आब्लो के पाँव से घबरा गया था मै
जी खुश हुआ है राह को पुर खार देख कर
अगर इस मौके पर हमने अनवर जमाल को प्यार नहीं दिया तो यह हमारी मुहब्बत की तौहीन होगी
बाकी
हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ
मै अपने दुश्मन को ख़त्म करना चाहता हूँ .....
अगर जमाल एक कदम आये है तो मै दस कदम आगे बढ़ कर गले लगाऊंगा
और मै सभी बंधुओ से चाहूँगा कि इस कदम क़ा समर्थन करे
नफरत से नफरत बढ़ती है
एक बार प्यार के रास्ते पर चल कर देखा जाय

Ravindra Nath ने कहा…

मिश्र जी मैं कद्र करता हूँ आपके विचारों की पर मेरा अब तक का अनुभव बढिया नही रहा है, कोइ भरोसा नही कब यह सज्जन फिर से राग अलाप दें कि मैं मुस्लिम हूँ मुझे स्वीकार करो बिना किसी गुणवत्ता परीक्षण के, मुस्लिम होने के कारण मुझे ग्रहण करो चाहे मेरी गुणवत्ता निकृष्टतम ही क्यों न हो। आज तक इन्होने अपनी स्वीकार्यता अपनी गुणवत्ता के लिए नही मांगी, आप पिछले किसी भी पोस्ट को देख लें।
ईश्वर करे कि मैं गलत होऊ और यह सुधर गया हो।

Ravindra Nath ने कहा…

पवन जी इस दुर्बुद्धि का असली चेहरा सामने आने मे कोइ समय नही लगा, मैने आपके ब्लॉग पर जो टिप्पणियां की थी वही उसके ब्लॉग पर भी की, उसने मेरी दूसरी टिप्पणी को हटा दिया है। आप स्वयं देखें कि मेरी टिप्पणी मे क्या अनुचित है? उसने यह कार्य विद्द्वेश वश किया है जिससे मेरा संशय दूसरों तक न पहुंचे।

मै आपको वो e-Mail अग्रसारित करता हूं जो यह सुनिश्चित करता है कि मैने टिप्पणी की थी और टिप्पणी वही थी जो आपके ब्लॉग पर है।

"पलाश" ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
"पलाश" ने कहा…

@ ravindra ji one thing i like to say
ensaan k fitarat aur aadat alag alag ensaano ke sath badali rahati hai , bahut kam log hi duniya mai hote hai jo apane aayaam kud banaate hai ..
blog world is a very holly place for writer and reader ..
yahan aa ker bahut log badal jate hai .. aur naa bhee badale to usse humko kya fark padane waala hai ..
jo es duniya ko jo degaa duniya se wahi paaygaa bhee .
now it depends on he person that what he/she wants to the world ..
our work is to write good . read good ..