रविवार, 30 जनवरी 2011

प्यार की फ़स्ल उगाये ज़मी रहे दिल शाद मौला


 नए साल पर  मैंने अपने अमन के वास्ते  चन्द गुजारिशे की थी.. यह  गुजारिश मेरे अहले वतन और मिरे प्यारे हमवतनो की खातिर है.    देश में इस समय ज़मीं की नमी ख़तम होने को है तो मुहब्बत की ऐसी बारिश की दुआ मांगी थी  कि सदियों सदियों तक दिलो से गीलापन ख़त्म ना हो. आँखों में पानी बना रहे. 
नफरत और भ्रम ये दो चीजे ऐसी है जिससे देश आज तबाही के मुहाने पर आ गया है मै ईश्वर से आशीवार्द  के रूप में इन चीजो को ख़तम करना मागता हूँ क्युकी इनसान अब अपना ज़मीर बेच कर उपदेश देने लगा है .
मेरे मन की मुराद पूरी कर मौला.

नए साल पर पूरी कर मेरे मन की मुराद मौला
मिरे वतन के सीने पर ना हो कोई फसाद मौला

बच्चों का आँगन ना छूटे, बूढ़े नींद चैन की सोवें
बहने चहके चिडियों सी माओं की गोद आबाद मौला  

रोटी कपडा मकान हर इक  शख्स को हासिल हो
प्यार की फ़स्ल उगाये ज़मी रहे दिल शाद मौला 

अली खेले होली, सिवई खिलाये घनश्याम ईद की
गंगा जमुना का पानी अब और नाहो बरबाद मौला

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

To Dr Anwar Jamal On अब बताईये कि आपको मेरी किस बात पर ऐतराज़ है ?


प्रिय जमाल जी
आपसे बात करने के बाद पाया कि आप वैसे तो बिलकुल नही है जैसे कि आप प्रोजेक्ट करते है. आपको जानने के लिए मैंने पुरानी पोस्टे पलटी तो पाया आप बेहद खूबसूरत खयालो वाले हिन्दोस्तानी है. फिर क्या वजह है जो लोग अनवर जमाल से हिचकिचाते है. कुछ खगालने क़ा प्रयास किया है. मेरा मोबाइल फोन ख़राब हो गया था. इससे पहले मैंने आपकी बाते ध्यान से सुनी और कई बातो (बल्कि यू कहे कि ९९ %) पर सहमत भी था. बस एक परसेंट क़ा अंतर है यह एक परसेंट क़ा अंतर ९९ % पर भारी  पड़ता है.
आपका कहना है कि आप हिन्दू मुस्लिम एकता(मानवीय एकता ) के हिमायती है.
इस बात से मै भी इत्तेफाक रखता हूँ.
लेकिन इसका आधार में आप डार्विन वाद में ढूढ़ते है.
आपका कथन है
१.सभी धर्मो के धरम ग्रन्थ मिलावटी है केवल कुरआन सही है .
२.दूसरी क़ौमों और मुसलमानों में जो बुनियादी अंतर है वह यह है कि दूसरी क़ौमों के पास वह ईशवाणी आज सुरक्षित नहीं है जो उनके ऋषियों के अंतःकरण पर अवतरित हुई थी लेकिन मुसलमानों के पास वह सुरक्षित है, न केवल उनके लिए वरन् सारी मानव जाति के लिए. इसी ईशवाणी पवित्र कुरआन में हिन्दुओं के ऋषियों का सच्चा चरित्र आज भी पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रहा है। इसी ईशवाणी पवित्र कुरआन में हिन्दुओं के ऋषियों का सच्चा चरित्र आज भी पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रहा है।
३. सनातन धरम क़ा लेटेस्ट वर्जन इसलाम को है.
४. आज दुनिया का कोई भी आदमी बिना कुरआन की मदद के अपने ऋषि से जुड़ ही नहीं सकता।
मुझे घुमाफिरा कर कहने की आदत नही आप सुनिए
१.ये धरम क़ा डार्विन वादी व्याख्या अंत में जीवन संघर्ष की ओर ले जाती है जहा योग्यतम ही जीवित रहता है. इस संघर्ष में नैतिकता समाप्त हो जाती है और जंगल राज लागू हो जाता है.
२. मै मानता हूँ कि सनातन धार्मिक साहित्य में क्षेपक आ गए है. किन्तु ये क्षेपक सभी सनातनी वैदिक धरम मर्मज्ञों को मालूम है और वे इन्हें समय समय पर शुद्धि करते रहते है. वैदिक परंपरा इस्लामिक परम्परा से तकरीबन ४००० वर्ष पुरानी है अतः प्रक्षेप जुड़ना अस्वाभाविक नही है.
३. गीता विशुद्ध रूप से सनातन, वैदिक ईश वाणी है जिसके आधार पर कोई भी व्याख्या तार्किक रूप से संभव है
४. आप घुमाफिरा कर एक ही बात कहना चाहते है कि सारे धरम अब शुद्ध नही सिवाय इसलाम के और इसलिए सभी को मुक्ति पाने के लिए सही धरम को अपनाना चाहिए. यहाँ आपका सीधा सीधा इशारा इसलाम कुबूलियत की तरफ होता है.
५.आपसे बात करते समय मैंने तुरंत कहा था कि आपकी आवाज बहुत अच्छी है लेकिन आप की लेखनी ऐसी नहीं. आप लिखते समय किसी भी टापिक क़ा छीछालेदर कर देते है. ऋषियों के बारे में या लूत के बारे में या जील के बारे में. एक उदहारण से समझाने की कोशिश करता हूँ. अगर किसी से पूछा जाय कि विवाह सम्बन्ध क्या होता है तो उत्तर मिलेगा घरेलू जीवन में प्रवेश की इकाई. विद्वान व्यक्ति इसी तरह लिखते और समझते है किन्तु क्या जरूरी है कि विवाह संबंधो की परिभाषा में मैथुनिक संबंधो को छिछियाते हुए बताये जाय जबकि इन्ही संबंधो के आधार पर विवाह टिका होता है. आशा करता हूँ आप मेरा मतलब समझ रहे होगे.
६.आपने अलबक़राः, 284 क़ा उदाहरण देकर बताया " हम उस (ईश्वर) के रसूलों (ऋषियों) में से किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।"
यहाँ आप खुद मिलावट कर रहे है ईश्वर या ऋषी आपकी अवाधारनाये है ना कि कुरआन या हदीस की. यह व्याख्या ओरिएन्तेद है. ये बात तो सही है कि ईश्वर भेदभाव नहीं करता लेकिन सिर्फ ऋषियों के संधर्भ में ही नही waran सम्पूर्ण प्राणिमात्र में. इस बात में कोई नई बात नहीं है किन्तु आप गलत चीज़  में सही बात फिट करने क़ा प्रयास करते है.
७. हिदुओ और अंग्रेजो की समस्या ही नही पूरे विश्व में यही समस्या है कि अपनी ढपली के सुर को बेहतरीन मानते है.
मुझे इस बात की अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि आपने माना कि हर धरम एक ही सत्य की बात करता है. फिर भेदभाव क्यू इसके उत्तर में मैंने पावर इक्सर्साइज की बात कही थी.
मुझे इस बात की अत्यधिक खुशी है कि आप एक नेक मुसलमान है और इसलाम की तन मन धन से सेवा कर रहे है लेकिन प्रिय अनवर जी मै एक परसेंट भी भेदभाव नही चाहता ये एक परसेंट भेद गुरील्ला और आदमी की प्रजाति के लिए जिम्मेदार है.
आप ज्ञानवान है कोई शक नही. किन्तु ज्ञान क़ा सही उपयोग कीजिये मानवता आपकी आभारी रहेगी.






बुधवार, 26 जनवरी 2011

मत करो जाने की तुम बात.















चंदा ने ओढाई प्रीत की चूनर
धरती है लजियात,
मत करो जाने की
तुम बात.
अम्बवा के तले अमराई झरे
महुए की गमक चहु ओर फिरे,
कोयलिया बिलखात
मत करो जाने की
तुम बात.
रस घट फूटा भीगा यौवन
तरुण हो रहे कण  कण,
पुलक उठे है पात
मत करो जाने की
तुम बात.
मुग्ध हुए है हर सिंगार
बन  सेज पिया की,
चंचल नैनो की चितवन
बोलती बात हिया की.
यह मधुमास की रात
मत करो जाने की
तुम बात.





मंगलवार, 25 जनवरी 2011

मेरे महबूब बेतार बात हो तो अच्छा











दिल से दिल की   बात हो तो अच्छा
बात में  तेरे  जज्बात हो तो अच्छा

तारो को टूटते देखा  मैंने अक्सर,
मेरे महबूब बेतार बात हो तो अच्छा

कब तलक  टुकडो बसर ज़िदगी होगी
अब बदल जाए ये हालात तो अच्छा

ज़माने  से  ये आँखे भरी    भरी सी है
टूट के हो प्यार की बरसात तो अच्छा

लुकाछिपी क़ा खेल फ़साना बन जाएगा
इंतज़ाम मुलाक़ात के हो जाय तो अच्छा









रविवार, 23 जनवरी 2011

कागजो से शौच बनाम पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली का आयोजन run for saving environment

                                                                  
मैंने अपने नए ब्लॉग http://haridhari.blogspot.com/ जो पर्यावरण संक्षण के लिए समर्पित है पर इस पोस्ट को छपा था किन्तु तकनिकी कारणों से यह हमारीवानी पर दिखाई नहीं दे रही है अतः सुधी पाठको के लिए इसे यहाँ दे रहा हूँ.
 आजकल पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली निकालने का बड़ा चलन है. सवाल यह है कि इस दौड़ में भाग कौन लेता है? इसमें बड़े बड़े पूजीपति उद्योगपति अभिजात्य तबके के लोग जोर शोर से भाग लेते है. ये लोग खुद तो दौड़ कर क्या दिखाना चाहते है. हरी धरती के सबसे बड़े शत्रु यही लोग है. शौच के लिए पानी नहीं उत्तम कोटि के कागजो का प्रयोग करते है फिर पेड़ो को बचाने के लिए रैली का आयोजन करेगे.
दुनिया में मात्र ७ % अभिजात्य देशो से ५० % कार्बन का उत्सर्जन होता है. सच यह है कि सुविधाभोगी वर्ग प्रजातंत्र के सहारे सामान्यजन को अपराधबोध से ग्रस्त करता है. और इस शोर शराबे में मूल प्रश्न दबे रह जाते है.
पर्यावरणीय समस्या की गहन पड़ताल अंततः स्थापित तत्कालीन व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है. यह स्वाभाविक है कि ऐसा कोई भी प्रयास स्थापित शक्तिकेंद्रो(सरकारे) के हितो के अनुकूल नहीं हो सकता. ऐसी स्थिति में ये शक्तिकेंद्र या तो पड़ताल की दिशा मोड़ने का कार्य करते है या दमन का सहारा लेते है. वर्तमान पर्यावरणीय विमर्श में ये दोनों स्थितिया देखी जा सकती है.
हरी धरती शौच हेतु या जहा कपडे का या जल के प्रयोग प्रयोग से काम होता है वहा इस प्रकार के कागजो के प्रयोग न करने का आवाहन करती है. क्योकि इन कागजो को बनाने में जितना पानी खर्च होता है जितने पेड़ काटे जाते है उसका दसवा हिस्सा पानी भी इन कार्यों  में खर्च नहीं होता है.

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

चाँद जागता रहा, रात हुई माधुरी







धूप फागुनी खिली
बयार बसन्ती चली,
सरसों के रंग में
मधुमाती गंध मिली.

मीत के मन प्रीत जगे
सतरंगी गीत उगे ,
धरती को मदिर कर
महुए  हैं  रतजगे.

अंग अंग दहक रहे
पोर पोर कसक रहे,
पिय से मिलने को
रोम रोम लहक रहे.

अधर दबाये हुए
पुलक रही है बावरी,
चाँद जागता रहा
रात हुई माधुरी.











रविवार, 16 जनवरी 2011

आदमी गायब है औ' हैवान नजर आता है





आजकल हर आदमी परेशान नज़र आता है
यह उजड़ा शहर मुझे शमशान नजर आता है.

इक पल  में जाने कैसे  बदल जाती है ज़िंदगी  
हालात से बेबस हुआ इनसान नजर आता है

शक होता है पड़ोसी की शराफत को देख कर
ईमान की बाते करता बेईमान नजर आता है

बस्तियों में ढूंढता हूँ मै दिलो में ढूंढता हूँ
आदमी गायब है औ'  हैवान नजर आता  है

धधक रही है भट्ठिया नफ़रतकी लकडियो से
मातम में डूबा सारा ज़हान नजर आता है.






बुधवार, 12 जनवरी 2011

ऐ खुदा तुझ पे एहसान कर रहा हूँ













तेरी दी हुयी ज़िंदगी   जी रहा हूँ
ऐ खुदा तुझ पे  एहसान कर रहा हूँ

ऊंचे मकान वालो पर इतनी इनायत क्यूँ
मुझ पर तेरी नज़र टिके अरमान कर रहा हूँ

मस्जिद बनेगी तेरी जरा सब्र और कर
माँ की दवाई बंद कर मै दान कर रहा हूँ

 नाराज ना हो खून में डूबा नहीं खंज़र
काफिर औ' मुसलमान में पहचान  कर रहा हूँ

हुक्म की तामील में  इतनी  जल्दी भी क्या है
काजी  के फतवे क़ा  का मै ध्यान कर रहा हूँ
                
ऐ खुदा तुझ पे  एहसान कर रहा हूँ

रविवार, 9 जनवरी 2011

सभी खुरापतिये ब्लागरो से रामबाण निवेदन है कि खुरापात बंद करे. नहीं तो..................

बहुत दिन तक मै चाँद पर रहा धरती पर लौटा तो देखा बस्तिया जल रही थी,(जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी).  मै तो अमन की हालात में गया था. फिर यह बमचक क्यों मचा है. थोड़ी बहुत खोजबीन के बाद पता लगा कि वही पुराने नीरो टाइप के बन्दे है,जिन्हें घरफूंक तमाशा देखने से ज्यादा आनंद और कही नहीं मिलता.
जनाब सनवर कमाल  पानी पी पी के चिल्ला रहे थे कि.... हम नहीं सुधरेगे .... ये गया बमगोला धरम क़ा  अब आग और भभकेगी अरे ये तो बात कम बन रही है ... ये गया दूसरा बमगोला औरतोवाला अब महामजा  आया (वैसे ये लेटेस्ट अजमाया तरीका है). खूब चिल्लपों मची.
मुंडे मुंडे मति  भिन्ना यही भिन्न भिन्न पूरे ब्लॉगजगत  में सुनायी दे रही है. एक बात और १९१६ में जो गलती हुई थी उसे ये लोग बार बार दुहरा रहे है.
ऐसा लग रहा है कि गंगा क़ा पानी अब कचरे की झील से ज्यादा नहीं है. मै तो पहले बी. एन शर्मा से त्रस्त था अब तो लगता है ब्लोगरो में शर्मा जी की आत्मा प्रवेश कर गयी है. एक नया मुहावरा देखने को मिला "मै तुझे खुजाऊ तू मुझे खुजा "  अरे भाई  टिप्पणी   देने के माध्यम से यदि ब्लॉग विजिट हो तो उसमे क्या  बुराई है .
कुल मिला कर लब्बो लुआब यह है कि वंचित महसूस करने वाले लोग (असल में इन्हें चाहिए कुछ और तो ब्लॉग को ही माध्यम  बना रहे है) ब्लॉग जगत को गिद्धों की तरह नोच नोच कर खाए जा रहे है.
एक जगह की रोशनी किसी के घर के जलने से नहीं आ रही है. यह तो अमन क़ा पैगाम है. एक शमशेर  मासूम जी के नाम
"मेरी हिम्मत को सराहो मेंरे हमराह बनो
मैंने एक शमा जलाई है अंधड़ो के खिलाफ"
अब किसी को इस बात से रंज होगा कि ये वो लाइन नहीं है ये है. भईया अपने में मस्त रहो ना कोई जरूरी  है कि मेरे लिए वो बात सही हो जो आपके लिए सही हो. व्यर्थ में विलाप किस हेतु?

निदा फाजली साहब से कुछ सीख लिया जाय

सब की पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाये गीत

पूजा घर में मूर्ती, मीरा के संग श्याम
जितनी जिसकी चाकरी, उतने उसके दाम

मिट्टी से माटी मिले, खो के सभी निशां
किस में कितना कौन है, कैसे हो पहचान

सभी खुरापतिये ब्लागरो से रामबाण निवेदन है कि  खुरापात बंद करे. नहीं तो..................
भैये....
ब्लॉग जगत की आग हम सब के दिलो से होती हुई घरो तक पहुच जायेगी और सब कुछ स्वाहा हो जायेगा अरे अगर आपको बात करनी है तो.........

कुछ फूलों की बाते हो कुछ प्यार की बाते हो
कुछ तितली की बाते हो कुछ मनुहार की बाते हो


ज्ञान की बाते हो कुछ विज्ञान की बाते हो
हँसी ख़ुशी की बाते हो कुछ मुस्कान की बाते हो


नीले आसमान के नीचे बरगद की शाखों के पीछे
कुछ धूप की बाते हो कुछ छांव की बाते हो


मीठी लोरी को सुनकर माँ के आँचल में छुपकर
सपनो की बाते हो कुछ परियो की बाते हो


कुछ फागुन का रंग चढ़े कुछ सावन की बरसाते हो
कुछ बचपन की बाते हो कुछ यौवन की बाते हो

उम्मीद है कि मुझे फिर धरती रूपी ब्लॉग पर ये फसाद नहीं देखने को मिलेगे
इति सिद्धम

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

प्री-टेक्निक युग की खुदाई












नीम का पेड़
छोटे -छोटे शालिग्राम
कुए का ठंडा पानी
और पीपल की नरम छांह

सुबह का कलेवा
'अग्गा राजा दुग्गा दरोगा'
गन्ने का रस और दही
साथ में आलू की सलोनी

गेरू और चूने से
लिपे पुते घर में
आँगन और तुलसी
दरवाजे की देहरी

ताख में रखा दिया
उजास का पहरिया
बाबा की झोपड़ी
और मानस की पोथी

लौकी की बेले
छप्पर पर आँखमिचौनी खेले

आमो का झूरना
महुए का बीनना
अधपके गेहू की
बाली का चूसना

बगल के बांसों की
बजती बांसुरी
खेत खलिहान में काम करते
बैल हमारे परिवार के

और पास में चरते
गोरू बछेरू घर के

प्री-टेक्निक युग की खुदाई में
मिली ये सारी वस्तुए
जिनको मैंने खोया था
कई बरस पहले
कई बरस पहले...............