मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

महीना दिसम्बर हुआ










कोहरे का घूंघट ,
हौले से उतार कर ।
चम्पई फूलों से ,
रूप का सिंगार कर ॥

अम्बर ने प्यार से   ,
धरती को जब छुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

धूप गुनगुनाने लगी ,
शीत मुस्कुराने लगी ।
मौसम की ये खुमारी ,
मन को अकुलाने लगी ॥

आग का मीठापन जब ,
गुड से भीना हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

हवायें हुयी संदली ,
चाँद हुआ शबनमी ।
मोरपंख सिमट गये ,
प्रीत हुयी रेशमी ।।

बातों-बातों मे जब ,
दिन कही गुम हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

सोमवार, 21 नवंबर 2011

क्यों न कबड्डी को राष्ट्रीय खेल बना दिया जाय क्या ख़याल ?




ज"जियो खिलाड़ी मार दे टंगड़ी 
     शानदार रहे भारत की पगड़ी 


कबड्डी हमारा परंपरागत खेल है हम विश्वविजेता है. महिला एवं पुरुष दोनों वर्गो में चैम्पियन.
क्यों न कबड्डी को राष्ट्रीय खेल बना दिया जाय क्या ख़याल ?

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

देह का मोह छोडे और इसे मानव कल्याण मे समर्पित करे.



कुछ समय पहले मै जब मृत्यु के बाद देह के बारे में सोचता था तो यह पाता था की जब जानवर मरते है तो उनके भी शरीर की कुछ न कुछ उपयोग मानव कल्याण में आ ही जाता है किन्तु  जब मानव मरता है तो उसके मरने पर ताम झाम के साथ उसे जला या दफना दिया जाता है. इस ताम झाम की कीमत मृतक के परिवार वालो को काफ़ी महगी भी पड़ती है. फिर मैंने सोचा की म्रत्यु के बाद इस नश्वर शरीर को इस तरह से मानव कल्याण में लगाया जाय . विचार आया की यदि मै मृत्योपरांत देहदान करू तो शायद  इससे बात बने . मैंने अपने मन की बात किरण से बतायी तो वह भी सहर्ष तैयार हो गयीं. अलबत्ता माँ ने विरोध किया किन्तु उन्हें किसी तरह से मना लिया. मैंने अपने संगठन अखिल भारतीय अधिकार संगठन के डॉ आलोक चांटीया जी से बात की और एक देहदान का कार्यक्रम तय हो गया. संयोग से उसी दिन ऐरो की ५ वी स्थापना दिवस भी था. और मृत्योपरांत  भी मानव कल्याण की मेरी साध को पूर्णता मिली
१२ नवम्बर को  सभा की अध्यक्षता  सी एस जे एम् मेडिकल कालेज के एनाटामी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ ए के श्रीवास्तव ने की. लखनऊ के गणमान्य नागरिक और पत्रकार  बंधुओ ने कार्यक्रम में शिरकत कर हमारे हौसलों में इजाफा किया.
इस अवसर पर ऐरो का झंडा रिंगटोन और एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया .

मै यहा एक अपील करता हू कि देह का मोह छोडे और इसे मानव कल्याण मे समर्पित करे. 


                                              दीप प्रज्ज्वलन, डॉ आलोक चांटीया, मै



शाम को डॉ जाकिर भाई के साथ अवध की सैर भी हुयी खास तौर पर नाका कोतवाली की चाय तो बहुत मजेदार थी. इस पूरी यात्रा में मेरे सारथी की भूमिका में मेरे सुहृदय राघवेन्द्रप्रताप जी थे.



सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

दियना करे उजास

















खेतों में बागो में दियना करे उजास,
मीठी सी लौ भर रही चारो ओर मिठास.

दसो दिशाओं में घुली भीनी-भीनी गंध,
कण-कण पुलकित हो उठे लूट रहे आनंद.

नयी फसल लेकर आयी घर में गुड औ धान,
लईया खील बताशों से अभिनंदित मेहमान.

गेरू गोबर माटी से लिपा पुता है गाँव,
घर से भगे दलिद्दर सर पे रखकर पाँव.

झांझ मजीरा ढोलक बाजे झूम रही चौपाल,
नाचे मन हो बावरा देकर ताल पे ताल.

फूटी मन में फुलझड़िया पूरण होगी आस,
परदेसी पिऊ आ गए गोरी  छुए  अकास.

दीवाली ने कर दिया ज्योतिर्मय संसार,
सबके आँगन में खिले सुख समृद्धि अपार.

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

जनप्रतिनिधि को चुनने से पहले विचार करे: प्रश्नावली


१. क्या आप अपने प्रतिनिधि/प्रत्याशी  के शैक्षिक योग्यता के बारे में जानकारी रखते है
                           हां/नहीं
२.क्या आप अपने प्रतिनिधि/प्रत्याशी के पास उपलब्ध परिसम्पत्तियो के बारे में जानकारी रखते है 
                           हां/नही 
यदि हां तो परिसंपत्तियों के स्रोत जहा से उसने धन अर्जन किया है, के बारे में जानकारी रखते है?
                           हां/नही 
३. क्या आपका प्रतिनिधि/प्रत्याशी आपसे सीधा संवाद करता है व सहज रूप से उपलब्ध रहता है?
                           हां/नही
४. क्या आपका प्रतिनिधि/प्रत्याशी आपकी समस्यायों से सरोकर रखता है?
                              सरोकार रखा है/ केवल दिखावा करता है.
५. क्या आप का प्रतिनिधि/प्रत्याशी विकास हेतु मिलने वाली धनराशी का सही सही विवरण  देता  है?
                             हां/नही 
  यदि देता है तो क्या आप यह मानते है कि विवरण  सही है?
                             हां /नही 
६.जन लोकपाल का विरोध करने वाला आपका प्रतिनिधि हो सकता है ?
                             हां /नही 
७. आपके मतानुसार जनप्रतिनिधि/प्रत्याशी कैसा होना चाहिए?
.........................................................................................................................................
.........................................................................................................................................

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

मेरी आदिशक्ति से एक प्रार्थना


हर बार नवरात्रो मे मेरी आदिशक्ति से एक प्रार्थना होती है इस बार मैने उस शक्ति के एक स्वरूप  शारदे से अपने मन की बात कही है.















आज सुन मेरी तू पुकार मातु शारदे 
अरज ये कर स्वीकार  मातु शारदे 
जाग जावे  हिंद  के परिंद  अब निंद से
ऐसी एक भर हुंकार मातु शारदे

भारत की कीरती बनी रहे सदा सदा 
आन बान शान पर जान मेरी हो  फिदा
मेरे तन औ वतन की मिट्टी मिले इस तरह 
खाक होने पर भी कभी होवे ना हम जुदा 

सदियो से जमे हुये खून को उबाल दे
नस नस मे वो अंगार भर शारदे 
द्रोहियो के मुंड को जो खंड खंड कर दे 
ऐसी एक प्रचंड तलवार कर शारदे

राम के ही वास्ते जिये मरे हुसैन अली
हिफाजते रहीम चले आवे बजरंग बली
आरती अजान औ रसूल भगवान मे
माँ के जैसा भावमयी प्यार भर शारदे

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

"उम्मीदवार कैसा हो जिसे हम निश्चित वोट देगे" .

कल एक मीटिंग के दौरान यह बात सामने आई की मतदाता मतदान के समय उम्मीदवार को भूल हवा के रुख के साथ अपना मत देता है.यह हवा मंडल कमंडल वादी, जातिवादी व्याक्तिमूलक या सत्ता विरोधी लहर जैसे स्रोतों से चलती है. निष्कर्ष यह है कि मतदाता मात्र साधन या माध्यम होकर रह जाता है. इस सन्दर्भ  में मैंने एक प्रयोग करने का निश्चय किया है. कानपुर की एक विधानसभा गोविन्द नगर मेरा अध्ययन क्षेत्र है. एक प्रश्नावली बना रहा हूँ  जो "उम्मीदवार कैसा हो जिसे हम निश्चित वोट देगे" के शीर्षक से है. इस प्रक्रिया में आपके सुझावों की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि  मेरा मानना है कि सीखने के क्रम में अनुभव बड़ा  काम आता है..अतः प्रश्नावली के प्रश्न कैसे हो अवगत कराईयेगा. समय सीमा २४ सितम्बर है.




शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

भगत सिह की अध्यक्षता मे मेरा अभिभाषण

11 सितम्बर का दिन मेरे लिए अविस्मरणीय  रहा जब मैने ऐसे मंच से अपने विचार रखे जिसकी अध्यक्षता सरदार भगत सिंह  कर रहे  थे. मौक़ा था जनराज्य पार्टी द्वारा आयोजित  राष्ट्रीय अधिवेशन. यह मेरे जीवन का अद्भुत अवसर था जब मैं इस चिर युवा महापुरुष को जीवंत रूप में महसूस कर रहा था. 
अधिवेशन का मुख्य विषय भ्रष्टाचार पर अन्ना के आन्दोलन का प्रभाव  का आकलन था. उपस्थित वक्ताओं और श्रोताओं के बीच  मेरे इस बात को लेकर सहमति थी कि अन्ना के आन्दोलन से सरकार का कोइ पुर्जा हिला नहीं वरन भ्रष्टाचार को लेकर सत्ता धारी व विपक्ष में अभूतपूर्व एकता स्थापित हो गयी है. स्वामी रामदेव को डंडे के जोर से तो अन्ना को पुचकार कर, टीम में फूट डाल कर सरकार अपने मकसद में कामयाब होकर मूछों पर ताव देकर राज कर रही है.
अब अगला कदम क्या हो इस पर विचार विमर्श किया गया. मंत्रणा के पश्चात ये तय किया गया कि अब समय आ गया है जब  भगत सिंह और स्वामी विवेकानंद के   साथ वैचारिक साम्यता के आधार पर हम काम करे और राजनीती का रुख सकारात्मक दिशा में मोड़े. 
भ्रष्ट नेताओं की चुनौती स्वीकार करते हुए  यह तय किया गया कि हम राजनीति में सहभागिता करे.


नजर टेढ़ी जवानो की भिची जो मुट्ठिया हो फिर
भगत आजाद अशफाको  की रूहे झूम जाती है,
जय हिंद के जयघोष से उट्ठी सुनामी जो  
तमिलनाडु से लहरे जा हिमालय चूम आती है 
                                                       तेरे नगमे मेरे होठों पे कलमा के सरीखे है 
                                                      तेरे साए हूँ इस बात का अभिमान करता हूँ 
                                                      तेरी सुर्खी रहे कायम दो मुट्ठी राख से मेरी 
                                                      सलामे हिंद अपनी जान मै कुरबान करता हूँ 

....जय हिन्द 



शनिवार, 10 सितंबर 2011

बरस बीते मौन के



लगभग ३ महीने बाद मुखातिब हुआ हूँ.इस दौरान काफी कुछ सीखने समझाने और अनुभव करने का अवसर प्राप्त हुआ. मैंने साइंस ब्लागर असोसिएशन पर कुछ वैज्ञानिक प्रयोगों की जानकारी दी है.  विगत तीन महीने मेरे जीवन मे अहम रहे .आप लोगो से आगे मै शेयर करूंगा 
अभी आप मेरी पुरानी कविता का आनंद लीजिये 







झुरमुटों से छन के आयी
किरन आसमान से
बांसुरी बोल पड़ी
स्वागत मेहमान के

गुंजर बिहस उठे
आख़िरी पहर में
महक उठी रातरानी
मुग्ध स्वर बिहान के

पांखुरी चटकने लगी
मेरे उपवन के
अंखुवे निकले फिर
पतझारे बन के

सुधिया मुसकराने लगी
बीत गयी रैन के
डोली धरती और
बरस बीते मौन के

गुरुवार, 9 जून 2011

प्रिय मित्रों आज से मै ब्लागजगत से अवकाश ले रहा हूँ.

प्रिय मित्रों आज से मै ब्लागजगत से अवकाश ले रहा हूँ. मुझे लगता है कि इस समय देश में जो हालात बन रहे है उस पर आभासी दुनिया में लिखने की बजाय वास्तविक दुनिया में कार्य करूँ तो मेरी प्रवृत्ति के ज्यादा अनुकूल होगा. भाइयो बहनों आज तक मैंने ब्लागिंग को सामाजिक  परिवर्तन, सम्बन्ध  साहित्य साधना, नकारात्मकता का प्रतिरोध और सौहार्द्रता के साधन के रूप में प्रयोग करता रहा. ब्लागिंग के सहारे कानपुर यूनिवर्सिटी में नक़ल और भ्रष्टाचार के खात्मे का जो कार्य किया गया शायद उसकी मिसाल दूसरी मिले.मैंने गंगा पर वर्क किया नतीजा सामने रखा. पर्यावरण के पहलुओं पर बारीक अध्ययन आप लोगो के सामने रखा. विश्वविद्यालयों के करप्शन पर जडमूल चोट की.(अ )धार्मिक खलीफाओं की क्लास ली.साहित्य सर्जना की.कानपुर ब्लागर्स असोसिएसन  की स्थापना में भूमिका निभाई. किन्तु  मुझे लगता है कि ग्राउंड लेवल पर  वर्क करने की और ज्यादा जरूरत है. आज सुबह जाकिर भाई से वार्तालाप के पश्चात मैंने गहन चिंतन किया और पाया कि यह सही वक्त है जब मुझे जमीनी स्तर पर  उतर कर और ज्यादा अनुभव बटोरने चाहिए.
इसके लिए मै   भारत भ्रमण, शोध अध्ययन, लोगो से मुलाकात साक्षात्कार,  सामाजिक परिवर्तन हेतु आंदोलनों का हिस्सा बनूगा. इस दौरान मै विभिन्न पुस्तकों  के अध्ययन व पुस्तक लेखन का कार्य करूंगा. एक बात मै स्पष्ट कर दू कि मै एक ब्रेक  ले रहा  हूँ जिसका मकसद साधना द्वारा  स्वयं का विश्लेषण करना और ऊपर उल्लेखित कार्यों को करना है.

 भविष्य में ब्लागजगत में फिर से आप लोगों से मुलाक़ात होगी इसी कामना के साथ अनुमति ले रहा हूँ.

आपके प्यार के लिए आभार 
आपका 
...पवन 

गुरुवार, 2 जून 2011

अपर्णा त्रिपाठी वापस ब्लागजगत में: पलाश के फूल फिर खिलेंगे

आगे बढ़ते बढ़ते अगर सामने बड़ा गड्ढा दिखे तो उसे पार करने के लिए पीछे की तरफ जाना होता है. मगर इसका ये मतलब नही कि आगे जाने का इरादा ही छोड़ दिया. इसका मतलब होता है कि और मजबूती से हम आगे बढ़ने को है. इस दौरान मन में तमाम संशय भ्रम इत्यादि पलते है किन्तु ये सब अपनों के संबल शुभकामनाओं और आशीषों से ख़तम हो जाते है. २३ मार्च को जब अपर्णा ने अपनी लेखनी को अकेडमिक ब्रेक दिया तो कुछ ऐसी ही परिस्थितिया थी. मुझे अपनी बहन पर गर्व है कि वह इन सभी बाधाओं को सफलतापूर्वक पार करते हुए अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया. मुझे यह बताते हुए बड़ी खुशी हो रही है कि एम् एन आई टी इलाहाबाद की सत्रीय परीक्षा में अपर्णा को ए ग्रेड मिला.
जब विपरीत परिस्थियों  में सभी फूल मुरझाने को होते है पलाश तभी अपने चटख रंग  बिखेरते हुए खिलता है. जल्द ही यह पलाश ब्लागजगत में अपने रंग बिखेरते आप सबके सामने होगा.


मंगलवार, 17 मई 2011

जेठ की दुपहरी में बूँद बूँद पिघला सूरज










जेठ की दुपहरी में
बूँद बूँद पिघला सूरज
आग की नदी
क्षितिज से उतर कर
बहने लगी धरती पर
दहकने लगे पलाश
अमलताश से आम  तक
जा पहुची पीली  ज्वालायें
आंवा हुए दुआर ओसार
झौंस गए कुआं तलाव
आग की नदी ने
सोख लिया नमी
हवाओं की, दिल की
अब चारों ओर
बंजर अंधड़ सांय सांय
करता घूम रहा है
किसी प्रेत की तरह









बुधवार, 4 मई 2011

जबकि रात अपने शवाब पर है.



 








नीली झील में
नहाकर चाँद
बरगद की शाखों पे
जाकर बैठ गया.

दिन भर की भागा दौड़ी
से थकी हुयी नदी
मीठी नींद  सो रही है.
रेत के बिछौने पर

अंगडाई लेती रात के
गेसू को कांपती
उँगलियों से बिखराती
सुलझाती हवाएं

धवल चांदनी को सोखते
बेला के फूल
और  झरते महुए
झूमते है गाते है  

तुम आयी  नही
अभी तक
जबकि रात अपने
शवाब पर है.

















गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

नीम का पेड़

खट्ट-खट्ट चिर्र-चिर्र की आवाजे अंततः आने लगी. नीम के पेड़ पर चल रही आरी मेरे दिल को चीरती जा रही थी. मैंने कान बंद कर लिए और घर के अन्दर जाकर अपना सामान  बांधने लगा. माँ ने देखा तो पूछा
ये कहा की तैयारी हो रही है?
वापस कानपुर जा रहा हूँ माँ.
क्यों?
अब मै इन कसाइयो के साथ नही रह सकता.
कसाई किसे कह रहा है तू?
यहाँ जितने लोग है सब कसाई हैं.
छी: ऐसी बाते न करो बेटा, माँ डाटते हुए बोली, जिन हाथों में तू पला बढ़ा अब पढ़ लिख कर उन्ही को कसाई बोल  रहा है.
ये कसाई नही तो और फिर क्या हैं? देखो न नीम को कैसे बेदर्दी से कटवाया जा रहा है. माँ इस पेड़ की आवाज़ सुनो इसकी कराह  और पुकार सुनो.माँ याद है जब मै छोटा था और मुझे "माता" आ गयी थी तब इसी नीम की लौछार तुम मेरे ऊपर फिरा-फिरा  कर शीतला देवी से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करती थी. तब क्या तुमने सोचा था कि  इसे ऐसे काट दिया जाएगा.माँ कम से कम तुम तो स्वार्थी मत बनो.माँ कुछ कहती तभी  बड़े भाईसाहब वह से गुजरे बोले,
माँ इससे मत उलझ.यह बौरा गया है.
हां भईया मै वाकई बौरा गया हूँ इसलिए कि मै स्वार्थी नही हूँ.इसी पेड़ पर दादी ने जीवनपर्यंत जल चढ़ाया. इसी पेड़ के नीचे शालीग्राम रखे गए थे धर्म की प्राथमिक शिक्षा तो हमने यही से पायी थी.
"अरे पगले तभी तो हम लोग  यहाँ मंदिर बनवा रहे है. मंदिर के सामने "नंदी" बैठाने के लिए जगह नही थी इसीलिये इसे काटना पडा.यह तो पुण्य कार्य है.
हुंह मंदिर की परिभाषा जो आपकी है भईया वो मेरी नही है.दसियों साल से इसी पेड़ के नीचे शिवजी (शालीग्राम) विराजमान रहे और पेड़ उनपर छाया करता रहा तो तब क्या यहाँ मंदिर नही था. आज आप कंकर पाथर जोड़ कर इन महादेव को दीवार में बंद कर रहे हैं तो अब ये मंदिर हो जाएगा.
अरे भाई साहब इससे कहा बहस करके अपना दिमाग खराब कर रहे हैं. ये तो शुरू से ही.....मेरे दूसरे भाई बड़े भाई को खीच कर ले जाने लगे
मै आवेश में चिल्ला कर बोला ये देखो मेरे दांत कितने मजबूत है. तुम्हारे भी, बड़े भईया के,पूरे घर के, दादा अस्सी साल के है लेकिन उनके भी दांत सलामत है ये सब इसी नीम की दातुन की वजह से है.

हा हा हा अब तो कोलगेट का जमाना है बच्चू कोलगेट किया करो. तू इतना पढ़ा लिखा होकर गंवारों की बात करता है. पता नही क्या पढता है.
वे लोग चले गये.माँ भी अपने काम में लग गयी. मै अपना बैग लेकर  पिछवाड़े के दरवाजे से बाहर निकल गया.








आधी रात में पूरे  चाँद की
उतरी थी चांदनी.
तुम्हारे फूलों पर,
और उन फूलों से होकर
 मेरे दिल में उतर गयी थी.
तुम्हारे आगोश में रखे,
शिव को देख कर प्रकृति में,
सृजनकर्ता को पहचाना.
और तुम्हारी चंवर डुलाती,
लौछारों के कोमल स्पर्श से,
प्रेम की अनुभूति जाना. 
ओ साथी !
आज मैने घर छोड़ दिया
तुम्हारी आने वाली
फस्लों को बचाने की खातिर











मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

डोली धरती और बरस बीते मौन के











झुरमुटों से छन के आयी
किरन आसमान से
बांसुरी बोल पड़ी
स्वागत मेहमान के

गुंजर बिहस उठे
आख़िरी पहर में
महक उठी रातरानी
मुग्ध स्वर बिहान के

पांखुरी चटकने लगी
मेरे उपवन के
अंखुवे निकले फिर
पतझारे बन के

सुधिया मुसकराने लगी
बीत गयी रैन के
डोली धरती और
बरस बीते मौन के









मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

एक महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दे

एक महत्वपूर्ण सूचना: कृपया ध्यान दे


















ब्लॉग  और पत्र पत्रिकाए साहित्य की दो अलग अलग विधाए है किन्तु दोनों का उद्देश्य एक है जहा इलेक्ट्रानिक माध्यम (ब्लॉग) में पाठको की प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है वही प्रिंट माध्यम में प्रतिक्रियाये न के बराबर मिलती है लेकिन प्रिंटेड साहित्य पढने का गुनने का अपना एक अलग आनंद होता है. इसीलिये हम सोचते है की हमारे द्वारा लिखी गयी रचनाओं को किसी पत्र या पत्रिका में स्थान मिले. "मीडिया और आप" की लोकप्रियता का शायद यह एक प्रमुख कारण है. इस बात को मद्देनज़र रखते हुए राष्ट्रीय हिंदी मासिक "माटी" जिसका कि मै प्रबंध सम्पादक हूँ , समस्त ब्लागर्स की   श्रेष्ठ रचनाये   आमंत्रित करती है. आपकी रचनाये कृतिदेव अथवा यूनीकोड  में टंकित होनी चाहिए आप उसे मेरे ई मेल pkmkit@gmail.com  पर भेज सकते है.

रविवार, 3 अप्रैल 2011

इस नवरात्रि पर मातारानी को सबसे अच्छी भेंट:माँ के नाम पर गाली देना बंद करे


इस नवरात्र के पावन अवसर पर मै सभी से एक बात कहना चाहता हूँ कि माता को प्रसन्न करने के लिए व्रत रतजगे कन्याभोज पूजा पाठ इत्यादि सब  तब तक व्यर्थ है, केवल पाखण्ड मात्र है जब तक मन साफ़ नही है इस नवरात्र में यदि आप अगर माता रानी की पूजा करना चाहते है तो सबसे पहले एक काम करिए  कि   माँ  को गाली देना बंद करे . नारी को लक्षित समस्त प्रकार की गालियों का उन्मूलन के अलावा कोई भी माध्यम नही है जिससे आपकी आराधना सफल हो . इस बार आप सब गाली न देने का व्रत करे और इसे पूरे जीवन पर्यंत निभाये इससे अच्छी पूजा और भेंट माँ  नवरात्री में और हो ही  नहीं सकती  


मेरी प्रार्थना 

अपनी दुर्बलताओ से जीतू शक्ति देना जगदम्बे
दुनियावी जालो  से निकलू संबल देना माँ अम्बे

जयकारा रतजगा जागरण कभी नहीं कर पाऊंगा
मन ही मन  में एक बार बस एक बार तुम्हे बुलाऊंगा

मेरी मद्धिम  सी पुकार पर तुमको आना होगा
मै सोया रहता हूँ माते  मुझे जगाना होगा

भले बुरे का परिचय देना और अंधेरो में ज्योति
गहरी पीड़ा से मुक्ति नहीं सहने की देना शक्ति

अंधियारों में दीपक बन  जल जाने की इच्छा है
मानवता की सेवा में बलि जाने की इच्छा है

सदा रहे आशीष तुम्हारा छोटी सी ये अर्जी  माँ
मुझमे मेरा जो कुछ है वो तेरा ही  निमित्त  है माँ

                            मुझमे मेरा जो कुछ है वो तेरा ही  निमित्त  है माँ


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

एक आह्लादकारी क्षण

 उत्तर प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा मेरे लिखे गए कुलगीत का विमोचन हुआ साथ ही साथ संगीत बद्ध प्रस्तुति भी. यह क्षण मेरे लिए आह्लादकारी  था. जब मेरी एक ग़ज़ल कविताकोष में सप्ताह की रचना चुनी गयी थी तब भी मन में ऐसे ही कुछ भाव थे.


मैंने कविताये १३ वर्ष की उम्र से लिखना शुरू किया. मुझे याद है की मै अपने गेहू के खेत में लोट लोट कर नीला आसमान निहारता था और मन में एक एक अजीब किस्म की अनुभूति महसूस करता.
मेरा गाँव जहाँ मेरा बचपन बीता हरियाली से पटा हुआ है वही हरियाली मेरी रचनाओं में मुखर होती है.
 अब जबकि मै कंक्रीटों के जंगल में रहने लगा हूँ मुझे वही दिन हूक हूक कर याद आते है.और मुझमे कविता फूटने लगती है.मेरी पहली कविता बसंत ऋतु पर थी. इसके बाद मैंने जीवन की विषमताओ, देशकी स्थिति पर तमाम रचनाये की.
तरुणाई का असर मेरी लेखनी पर भी पडा जिनसे मेरे पाठक गण अच्छी तरह रूबरू है.  कविता या गजल  के अतिरिक्त मैंने गद्यसर्जन भी किया  है जो अभी तक एकाध जगह के अलावा कही मैंने पोस्ट नही किया है.  भविष्य में अवश्य करूंगा.
 बस  आप सब का स्नेह और प्यार ऐसे मिलता रहे ईश्वर से ऐसी कामना करता हूँ.


सोमवार, 21 मार्च 2011

तरुनाई का प्यार मुझे फिर याद आया.










अरसे  से गुम   मौसम
 फिर वापस आया
 तरुनाई का प्यार
 मुझे फिर याद आया.

बीते पल के तहखाने में 
रखा हुआ  बक्सा खोला
टूटी पेन सूखे दावात
और  फटा बस्ता खोला


एक मुड़े कागज में
तेरा नाम लिखा पाया

कुछ कटी पंक्तियाँ गानों की
अंतिम पन्ने पर
एक कहानी  झलक रही 
स्याही के धुंधले  धब्बे पर 

सूखे गुलाब की पंखुड़ियों में
तेरा अक्स उभर आया  

आँखों से  तकरार और
फिर एक  कोमल मनुहार 
भोली बातों में खिलता था 
छहों दिनों का प्यार 

 वो दुखदायी रविवार
मुझे फिर याद आया

तरुनाई का प्यार
मुझे फिर याद आया.

  









गुरुवार, 17 मार्च 2011

फागुन में धरती झूम रही है एक उदास शाम के जैसी








       


              1.
फागुन में धरती झूम रही है
मस्त नशे में घूम रही है
जग से छुपकर क्षितिज पार
नभ  के अधरों को चूम रही है.


टेसू ने ओढ़ाई  लाल चुन्दरिया
हल्दी रोली   से सजी गुजरिया  
अंग अंग हो गया बसन्ती
वैजन्ती मन में फूल रही है


हुलसित   मन तन  रंग रंगा
चंग ढोल संग बजा मंजीरा
चौताल  मचाया   हुरियारों ने   
दसों दिशा में   गूँज   रही  है.


              2.
इन  रंगों की बारिश लेकिन  
मुझ को  नही भिगो पाती  है
हर बार के जैसे ये होली
मुझे   बेरंगा करके जाती है

एक  उदास शाम के  जैसा  
जीवन  ढलता जाता  है
मै अब भी खोजता वह रस्ता  
जो मेरे गाँव को जाता है















रविवार, 13 मार्च 2011

...मुझमे तब कविता रचती है









रात रात भर महुए जब
धरती पर रस बरसाते है
फगुनाहट की मस्ती से 
गाँव गिराँव  हुलसाते  है
             
                 खेतों  में मधुगीत बसे जब
                 आँखे सपने बुना करती है
                मुझमे तब कविता  रचती है

दूर क्षितिज के आँगन से
एक राह निकलती दिखती है
नदी पहाड़  जंगल चलकर
मुझसे  होकर   जाती  है
                
                     कितने मिलते  कितने बिछड़े
                     सुधियाँ मन पुलकित करती है
                     मुझमे तब कविता रचती है

होठो पे  एक मुस्कान मिले
ज्ञान को जहा मान मिले
 मानवता विकसित होती हो 
ममता करुणा की  छाव तले
                        
                             योगी और निरोगी हो सब 
                             अभिलाषा  मन में उठती है
                             मुझमे तब कविता रचती है

बरसे चंदा की धवल धारा
नदियों का  आँचल भर जाए
लदे फदे तरु खिले पुष्प हो
मस्त कबीरा मौज में गाये
                           
                              पायल रुनझुन बंशी की धुन
                               ह्रदय में अमृत  भरती है
                               मुझमे तब कविता रचती है


                            




          

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

आओ बन फूलों की ओर













आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर
जहां  सुबह की लाली है
मादक मोहक सांझ ढली है

जीवन निःसार नहीं है
जीवन भार नही है
यह उत्सव है अभिशाप नही
नीरसता संताप नही

आओ चले जले धुए से
खिले हुए गजरे की ओर

धुला हुआ सारा आकाश है
खिली हुई यह धरती है
चन्द्र रश्मियाँ सदियों से
यौवन में अमृत भरती है  

कंक्रीटो की दीवारों से
आओ जरा प्रकृति की ओर

समा जाय इस स्नेहमयी में
जैसे पंछी नील गगन में
बच्चे माँ के आँचल में
धारा सागर के जल में

जैसे आती नरम हवायें 
पूरब से पच्छिम की और

आओ बन फूलों की ओर
सावन के झूलों की ओर



सोमवार, 7 मार्च 2011

कुछ बच्चे है इस दुनिया में जो रात में भूखे रोते है















जिनके उपभोगसे होता है
धरती का तापीय परिवर्तन
कभी नहीं जो सो सकते है
बिना किये वातानुकूलन

मोटे गद्दों पर  सोने वालों
क्या कभी जान पाओगे
कुछ लोग भी है इस दुनियामे
जो फुटपाथों पर सोते है

सूखे के इस मौसम में
आँखों का पानी भी सूखा
कुआ ताल नदिया सब  सूखी  
गले के संग ह्रदय भी सूखा

मिनरल वाटर को पीने वालों
क्या कभी जान पाओगे
कुछ लोग भी है इस दुनिया में
दो बूँद को रोज़ तरसते है

नन्ही जर्जर काया जब
रोटी के लिए बिलखती है
उन बच्चों की माताओं की 
सूखी छाती फटती है

भारत निर्माण के निर्माताओं
क्या कभी जान पाओगे
कुछ बच्चे है इस दुनिया में
जो रात में भूखे रोते  है