बीता रात का तीसरा पहर
तुम नहीं आयेआधा हुआ चंदा पिघलकर
तुम नहीं आये
मै अकेला हूँ यहाँ पर
यादो की चादर ओढ़कर
रात भर पीता रहा
ओस में चांदनी घोलकर
ओस में चांदनी घोलकर
फूल खिले है ताजे या तुम
अपने होठ भिगोये हो
हवा हुयी है गीली सी क्योंशायद तुम भी रोये हो
अब सही जाती नहीं प्रिय
एक पल की भी जुदाई
देखकर बैठा अकेला
मुझ पे हसती है जुन्हाई
बुलबुलें भी उड़ गयी है
रात सारी गीत गाकर
किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.
किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

