सोमवार, 27 दिसंबर 2010

और ज़िन्दगी नए पड़ाव तय करती है.

तुम जलती हो ,
जो धूप मै देता हूँ.
तुम भीगती हो,
जो पानी मै उडेलता हूँ.
तुम कांपती हो,
जो शीत मै फैलाता  हूँ.
सबकुछ समेटती हो,
जो मै बिखेरता हूँ.
तुम सहती हो
बिना किसी शिकायत के

मेरी धरती,
तुम रचती हो,
सृष्टि गढ़ती हो
और मै तुम्हारा आकाश
तुम्हे बाहों में भरे हुए
चकित सा देखता रहता हूँ
तुम हंसती  हो
निश्छल हंसती  जाती हो
हवाए महक जाती है
रुका समय चल पड़ता है
और ज़िन्दगी नए पड़ाव
तय करती है.

16 टिप्‍पणियां:

एस.एम.मासूम ने कहा…

सबकुछ समेटती हो,
जो मै बिखेरता हूँ.
तुम सहती हो
बिना किसी शिकायत के
.
अति सुंदर पवन जी

अनूप शुक्ल ने कहा…

और ज़िन्दगी नए पड़ाव
तय करती है.

सही है! मान लिया। अच्छा है।:)

आलोकिता ने कहा…

mast hai

ashish ने कहा…

धरती और आकाश युगों युगों से एक दुसरे के पूरक रहे है . सुंदर रचना .

अजय कुमार झा ने कहा…

वाह क्या बात है सच है कि जीवन मंजिल तक पाने से पहले जाने कितने पडाव तय करती है ...

मेरा नया ठिकाना

ehsas ने कहा…

जितनी सुन्दर कविता है उतने ही बेहतरीन शब्द संयोजन है। आपका आभार।

chandra ने कहा…

धरती आकाश के बहाने पति पत्नी के संबंधो का सटीक चित्रण

हरी धरती ने कहा…

हरी धरती एक आन्दोलन है जो पर्यावरण संरक्षण से समर्पित है

Abhinav Chaurey ने कहा…

अति सुंदर कविता. प्रकृति हम सबकी माँ के स्वरूप है जो हमारी गलतियों को मुस्कुरा कर सहती और सुधारती रहती है.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

पवन भाई, जिंदगी के पडावों को आपने बखूबी समझा है।

---------
साइंस फिक्‍शन और परीकथा का समुच्‍चय।
क्‍या फलों में भी औषधीय गुण होता है?

DEVESHWAR AGGRAWAL ने कहा…

very nice.

Dr Kiran ने कहा…

nice explaination

वीना ने कहा…

तुम हंसती हो
निश्छल हंसती जाती हो
हवाए महक जाती है
रुका समय चल पड़ता है
और ज़िन्दगी नए पड़ाव
तय करती है

सुंदर रचना, सुंदर शब्द संयोजन....

वीना ने कहा…

ब्लॉग फॉलो करने के साथ ही आपके फॉलोअर का आधा शतक पूरा हो गया....बधाई...

daanish ने कहा…

आकाश और धरती के सुन्दर उदाहरणों से
जिंदगी का फलसफा खूब बयान किया आपने ...
काव्य शैली प्रभावित करती है ...
बधाई

arganikbhagyoday ने कहा…

सुंदर रचना !