रविवार, 19 दिसंबर 2010

और कोई भी बुलबुल अब गाती नहीं है........













याद है उस दिन इसी जगह
जीभर के हमने देखा था
संध्या को अंगड़ाई लेते
इक टहनी पर चाँद टंगा था

तुम्हारे जूडे में मैंने वो
चाँद तोड़कर टांक दिया था
और अधखिले  बेला की
गीली वेणी से बाँध दिया था

सारी रात मोगरे पर
मधुर  चांदनी झरती रही
और पेड़ की फुनगी पर
बुलबुल पंचम में  गाती रही

आज फिर उसी पेड़ के पास
उसी टहनी के नीचे आया  हूँ
लेकिन चाँद गुम है और
मोगरा कुम्हलाया देख रहा हूँ       

कुछ बेला की सूखी पंखुरी
अभी भी  धरती पर बिखरी  है
और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत  नहीं गाती  है

और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत  नहीं गाती  है........

24 टिप्‍पणियां:

Manish ने कहा…

कुछ बेला की सूखी पंखुरी
अभी भी बिखरी हुई है
और कोई भी बुलबुल
अब गाती नहीं है ..............

meri awaaj ने कहा…

अब भी बुलबुल गाती है , अब भी मीना हंसती है

नज़रों को जरा सहेजे अब भी वो रुत आती है

मत रुत को बदनाम करो वो तो आती जाती है

आती है खुशी लाती है जाती गम दे जाती है

ये गम और ख़ुशी एक दूजे के पूरक है

एक दूजे से हाथ मिलाये एक दूजे के पीछे है

मै कैसे कहूं किसी को कुछ , जब नियति ही है मतवाली

शत्रु की दुआ जहरीली ,मित्रो की रसीली गाली

आलोकिता ने कहा…

BAHUT SUNDAR RACHNA.

बेनामी ने कहा…

VERY NICE..........

DEVESHWAR AGGRAWAL "DEEPAK"

chandra ने कहा…

मै तो रीडर हूँ लिखते तो आप हो
आपके बिम्ब वाकई एक पिक्चर सामने बना देते है
पढने वाला उसी में जीने लगता है
बहुत सुन्दर गीत लिखा है

mohammad ने कहा…

very nice sir

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कुछ बेला की सूखी पंखुरी
अभी भी धरती पर बिखरी है
और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत नहीं गाती है

उनके बिना ऐसा ही होता है ... ये एहसास ही ऐसा है ... अछा लिखा है बहुत ही ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

आपकी इस सुन्दर और सशक्त रचना की चर्चा
आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
http://charchamanch.uchcharan.com/2010/12/375.html

वन्दना ने कहा…

ओह! दर्द और विरह दोनो बखूबी उकेरे हैं।

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

भावों का सुन्दर प्रस्तुतीकरण.

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर!

ashish ने कहा…

सुन्दर और भाव प्रवण अभिव्यक्ति . उम्मीद तो हमेशा ही रहती है की बुलबुल गाएगी .

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

mahendra verma ने कहा…

सारी रात मोगरे पर
मधुर चांदनी झरती रही
और पेड़ की फुनगी पर
बुलबुल पंचम में गाती रही

कविता बहुत पसंद आई...शब्दों और भावों का सुंदर संयोजन।

Poorviya ने कहा…

आज फिर उसी पेड़ के पास
उसी टहनी के नीचे आया हूँ
लेकिन चाँद गुम है और
मोगरा कुम्हलाया देख रहा हूँ

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

प्रिय शास्त्रीजी आपका हार्दिक धन्यवाद

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

मन की भावनाओं का अच्छा शब्द चित्र !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरती से लिखा है ...सुन्दर अभिव्यक्ति

past life therapist ने कहा…

मन को छूने वाली रचना लिखते है. पवन भाइ, नस्तर सा चुभो जाती है आपकी हर रचना,

past life therapist ने कहा…

nice

"पलाश" ने कहा…

बुलबुल फिर गीत गायेगी
कुमुदिनी फिर मुस्कायेगी
पूनम का चाँद फिर निकलेगा
मोगरा फिर से महकेगा

हमारी शुभकामनाये

एस.एम.मासूम ने कहा…

कुछ बेला की सूखी पंखुरी
अभी भी धरती पर बिखरी है
और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत नहीं गाती है
..
बहुत सुंदर पवन जी दिल को छु गयीं यह पंक्तियाँ

arganikbhagyoday ने कहा…

बहुत सुन्दर!

बेनामी ने कहा…

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