शनिवार, 18 दिसंबर 2010

आये है जीने के लिए या मृत्यु के लिए जीते है

प्रत्येक बार अंतरात्मा जन्म लेता और प्रत्येक बार सांसारिक पदार्थो से मन प्राण और शरीर की रचना होती है. यह रचना भूतकाल के विकास और उसके भविष्य की आवश्यकता के अनुसार होती है. इसी बात को लेकर मन में कुछ घुमड़ रहा था, सोचा आपसे भी चर्चा करू. सुझावों व टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है












मेरे से इतर क्या संभव है
वह परिभाषा जो मै होती है
मै सृष्टि की रचना हूँ
या सृष्टि मुझमे ही बनती है

विराट में निहित एक बिंदु
या विराट बन गया बिंदु
सागर में बूँद समाई है
या बूँद में बसे महासिन्धु

आये है जीने के लिए
या मृत्यु के लिए जीते है
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.


.................... सुधी पाठको के उत्तर की प्रतीक्षा में

14 टिप्‍पणियां:

Kailash C Sharma ने कहा…

आये है जीने के लिए
या मृत्यु के लिए जीते है
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.

बहुत गहन प्रश्न उठाये हैं. मननीय सुन्दर प्रस्तुति .

ashish ने कहा…

आये है जीने के लिए
या मृत्यु के लिए जीते है
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.

जीवन के गूढ़ रहस्य पर प्रश्नचिन्ह लगाती पंक्तिया अच्छी लगी . उत्तर तो ज्ञानी जन देंगे

meri awaaj ने कहा…

जिंदगी
जिन्दादिली का नाम है , जिंदगी को जीकर जीना आता है ,

मृत्यु सरिता में नहाकर जीव , अपना नया शुद्ध जीवन पाता है

जिंदगी से क्या कहें वह तो स्वयं अपना यहाँ ,जीवन जीने आती है

हर एक पल अपने में समेटकर हमें अपना बनाती है

Harshkant tripathi"Pawan" ने कहा…

मृत्यु सायद वही है जिसको हम जीवन कहते है. विचारणीय पोस्ट""""""

बेनामी ने कहा…

jivan mratyu ka roop hai . mratyu naye jivan ki kadi hai . mratyu sayad vahi hai jise ham jivan kahte hai.
-----------------------DEVESHWAR AGGRAWAL"DEEPAK"

निर्मला कपिला ने कहा…

विराट में निहित एक बिंदु
या विराट बन गया बिंदु
सागर में बूँद समाई है
या बूँद में बसे महासिन्धु
ये प्रश्न तो शायद आज तक कोई नहीः हल कर पाया।
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है
गहरा विचारमंथन। उम्दा रचना के लिये बधाई।

chandra ने कहा…

मेरे से इतर क्या संभव है
वह परिभाषा जो मै होती है
मै सृष्टि की रचना हूँ
या सृष्टि मुझमे ही बनती है
photo jabardast hai

"पलाश" ने कहा…

मृत्यु जीवन का अंत नही ,एक नये जीवन का प्रारम्भ है ।एक वो जीवन जिसे हम सशरीर जीते है , उसकी आयु सीमित होती है , मगर जब जीवन तन से मुक्त होता है तो वह एक अनन्त जीवन को जीता है । जिसे हम अमर होने की संज्ञा देते हैं।

आपकी इन पंक्तियों से मै इक्तेफाक रखती हूँ

कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.

chandra ने कहा…

अपने रूमानी कविताओं के लिए इतना लम्बा गैप मत किया करिए डाक्टर साहब हम लोगो की तबियत बिगड़ने लगती है
इंतज़ार ज्यादा हो गया
फोटो माशालाह

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

चन्द्र भाई सराहने का शुक्रिया
आपके ब्लॉग पर विसित किया था वहा कुछ पोस्ट नहीं है क्या अभी रीडर ही है आप
कुछ आप भी लिखा करो खुद को अच्छा लगेगा

आलोकिता ने कहा…

मेरे से इतर क्या संभव है
वह परिभाषा जो मै होती है
मै सृष्टि की रचना हूँ
या सृष्टि मुझमे ही बनती है

विराट में निहित एक बिंदु
या विराट बन गया बिंदु
सागर में बूँद समाई है
या बूँद में बसे महासिन्धु

आये है जीने के लिए
या मृत्यु के लिए जीते है
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.
विचारणीय रचना है |

संजय भास्कर ने कहा…

उम्दा रचना के लिये बधाई।

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
बहुत देर से पहुँच पाया ............माफी चाहता हूँ..

arganikbhagyoday ने कहा…

बहुत सुन्दर!