सोमवार, 27 दिसंबर 2010

और ज़िन्दगी नए पड़ाव तय करती है.

तुम जलती हो ,
जो धूप मै देता हूँ.
तुम भीगती हो,
जो पानी मै उडेलता हूँ.
तुम कांपती हो,
जो शीत मै फैलाता  हूँ.
सबकुछ समेटती हो,
जो मै बिखेरता हूँ.
तुम सहती हो
बिना किसी शिकायत के

मेरी धरती,
तुम रचती हो,
सृष्टि गढ़ती हो
और मै तुम्हारा आकाश
तुम्हे बाहों में भरे हुए
चकित सा देखता रहता हूँ
तुम हंसती  हो
निश्छल हंसती  जाती हो
हवाए महक जाती है
रुका समय चल पड़ता है
और ज़िन्दगी नए पड़ाव
तय करती है.

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

तात ये सोने का पदक मै कर रहा हूँ तुमको अर्पण

मेरे  पिताजी कानपुर में नौकरी करते थे. मेरी शुरुआती शिक्षा जौनपुर में ही हुई थी. मेरे ताउजी जो मेरी पहली पाठशाला  मार्गदर्शक माँ पिता गुरु मित्र सभी कुछ  रहे. तकरीबन मेरे सारे सवालों के जवाब उनके पास रहते. वो अक्सर मुझे टोपर विद्यार्थियों की बाते बताते. एक दिन मैंने उनसे पूछा कि आप तो दर्ज़ा दो तक की पढाए किये है आपको लगता नहीं कि आप भी टापर होते. उन्होंने कहा था  जिस दिन तेरे गले में स्वर्णपदक  पड़ेगा उसी दिन मै सब कुछ टाप कर जाउंगा. मै रात में सपना देखता कि मेरे गले में गोल्ड मेडल है और ताउजी कि आँखों में मेरे लिए आह्लाद का भाव.
मुझे १९ अक्टूबर  २००४ का दिन अभी भी बखूबी याद है. परास्नातक में मैंने यूनिवर्सिटी  टॉप किया था.
किरण ताउजी को लेकर पहली पंक्ति में बैठी थी. बार बार उदघोशक महोदय बता रहे थे कि परास्नातक में यूनवर्सिटी में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले पवन कुमार मिश्र को स्वर्णपदक  दिया जाने वाला है. ताउजी कि आँखों में  वही सपने वाले  आंसू झिलमिल कर रहे थे. मै उनके दिल से
निकले आशीषो की बारिश में खुद को भीगते देख रहा था.


(कानपुर यूनिवर्सिटी के वी.सी. प्रो एस.एस. कटियार नगरप्रमुख श्री अनिल शर्मा  और केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल  जी,  दीक्षांत समारोह के दौरान) 




मांस के लोथड़े को
तुमने इंसान में परिवर्तित किया
रक्त बनकर मेरी नसों में
मुझे गतिमान किया 
नीति कला दर्शन और जीवन का कर्मयुद्ध
ज्ञान का बोध तुम्ही से हुआ मेरे महाबुद्ध 
मेरी नन्ही उंगलियों को पकड़कर
जमीन पे "क" लिख दिया था.
वही पर  ऐ तात मेरे
प्रात मुझको दिख गया था
कभी पिता का अनुशासन  
कभी माँ क़ा दुलार बने
इतने विस्तृत थे कि जिसमे
मेरा सारा संसार बने
तुम्हारे गले में बाहे डालकर
मै झूलता था मगन होकर 
आज तुम्हारे दिल की ख्वाइश
पूरी करता हिचकिचा कर
तात ये  पदक सोने क़ा  मै 
कर रहा हूँ तुमको अर्पण 










रविवार, 19 दिसंबर 2010

और कोई भी बुलबुल अब गाती नहीं है........













याद है उस दिन इसी जगह
जीभर के हमने देखा था
संध्या को अंगड़ाई लेते
इक टहनी पर चाँद टंगा था

तुम्हारे जूडे में मैंने वो
चाँद तोड़कर टांक दिया था
और अधखिले  बेला की
गीली वेणी से बाँध दिया था

सारी रात मोगरे पर
मधुर  चांदनी झरती रही
और पेड़ की फुनगी पर
बुलबुल पंचम में  गाती रही

आज फिर उसी पेड़ के पास
उसी टहनी के नीचे आया  हूँ
लेकिन चाँद गुम है और
मोगरा कुम्हलाया देख रहा हूँ       

कुछ बेला की सूखी पंखुरी
अभी भी  धरती पर बिखरी  है
और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत  नहीं गाती  है

और कोई भी बुलबुल अब
प्रीत के गीत  नहीं गाती  है........

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

आये है जीने के लिए या मृत्यु के लिए जीते है

प्रत्येक बार अंतरात्मा जन्म लेता और प्रत्येक बार सांसारिक पदार्थो से मन प्राण और शरीर की रचना होती है. यह रचना भूतकाल के विकास और उसके भविष्य की आवश्यकता के अनुसार होती है. इसी बात को लेकर मन में कुछ घुमड़ रहा था, सोचा आपसे भी चर्चा करू. सुझावों व टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है












मेरे से इतर क्या संभव है
वह परिभाषा जो मै होती है
मै सृष्टि की रचना हूँ
या सृष्टि मुझमे ही बनती है

विराट में निहित एक बिंदु
या विराट बन गया बिंदु
सागर में बूँद समाई है
या बूँद में बसे महासिन्धु

आये है जीने के लिए
या मृत्यु के लिए जीते है
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.


.................... सुधी पाठको के उत्तर की प्रतीक्षा में

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

राम कहानी..........
















इस दुनिया में सबकी
अपनी राम कहानी है,
कही छलकते पैमाने है
 कही आँख का पानी है।

चौथेपन में सत्ता का रस
 छक कर मतवाले पीते है,
गिरती पड़ती ठोकर खाती
 घायल नयी जवानी है।

पढ़े लिखो की दुनिया में
 अनपढ़ का गुजारा कैसे हो,
गले लगा कर गला दबाना
 आदत बहुत पुरानी है।

रातो को नींद नहीं आती
दिन भर घबराया रहता ,
हाथ आज खाली खाली औ'
 बिटिया हुयी सयानी है।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

और अफज़लो की सजा बदल रही है.











महबूब-ए-मुल्क की हवा बदल रही है,
ताजीरात-ए-हिंद की दफा बदल रही है.

अस्मत लुटी अवाम की कहकहो के साथ,
और अफज़लो की सजा बदल रही है.

बारूदी बू आ रही है नर्म हवाओ में,
कोयल की भी मीठी ज़बा बदल रही है.

सुबह की हवाखोरी भी हुई मुश्किल,
जलते हुए टायर से सबा बदल रही है.

सियासत ने हर पाक को नापाक कर दिया,
पंडित की पूजा मुल्ला की अजां बदल रही है.

कहने को वह दिल हमी से लगाए है,
मगर मुहब्बत की वजा बदल रही है.

दुआ करो चमन की हिफाजत के वास्ते,
बागबानो की अब रजा बदल रही है।

निगहबानी करना बच्चो की ऐ खुदा,
दहशत में मेरे शहर की फ़ज़ा बदल रही है.

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

भूली बिसरी सुधियों के संग एक कहानी हो जाये














भूली बिसरी सुधियों के संग एक कहानी हो जाये,
तुम आ जाओ पास में मेरे  तो रुत रूमानी हो जाये।

मन अकुलाने लगता है चंदा की तरुनाई से,
रजनीगंधा बन जाओ तो रात सुहानी हो जाये।

रेशम होती हुई हवाए तन से लिपटी जाती है,
पुरवाई में बस जाओ तो प्रीत सयानी हो जाये।

मन बधने सा लगता है अभिलाषाओ के आँचल में,
प्रिय तुम प्रहरी बन जाओ थोड़ी मनमानी हो जाये।

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

जो मंगल गीत बना उसको निश्चित मातम बन जाना है.











अनमोल पलों को खोकर हम

कुछ नश्वर चीजे पाते है
और उस पर मान जताते है
यह अभिमान क्षणिक  है बंधू
समय का कौन ठिकाना है
जो मंगल गीत बना उसको
निश्चित मातम बन जाना है.


घनघोर घटाए आती है
पल भर में प्रलय मचाती है
लेकिन अगले ही क्षण उनको
अपना अस्तित्व मिटाना है.

जैसे सागर की लहरे
तट पर आती मिट जाती है
इस धरती पर सबको वैसे
आना फिर मिट जाना है.

जो आज हमारा अपना है
कल और किसी का होगा वह
सारे जग की यही रीत है
उस पर क्या पछताना है.

जग ठगता है हर पल पग पग
क्यों रोते हो ऐसा कह कर
देकर धोखा अपने तन को
एक दिन तुमको भी जाना है....

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

'कौवे' ने फिर काँव काँव किया बड़े दिनों के बाद.

अरे!

'कौवे' ने फिर काँव काँव किया  बड़े दिनों के बाद
कोयल के घोंसले को अपना बताना कौवों का जगजात फितूर है.
जनाब जमाल साहब मै ये नहीं चाहता था पर ना लिखना मुनासिब ना समझा.
आप कैसे विद्वान है जो सवाल को बदगुमानियत का दर्ज़ा देते है.
एक किस्सा सुनाये आपको..
चिडयाघर में एक चुटकुले पर दो घोड़े हस रहे थे गधा चुप था चौथे या पाचवे दिन गधा एकाएक हसने लगा तो पहले घोड़े ने दूसरे से पूछा कि आज बिना बात के यह गधा क्यों हस रहा है तो गधे ने खुद जवाब पोस्ट किया कि मुझे चुटकुला आज जा कर समझ में आया.
इतने दिन बाद अपर्णा जी  के कम्मेंट पर पोस्ट लिखने का सबब क्या है?
मुझे मालूम है कि अभी पूरा गिरोह चाव चाव करेगा एक नहीं दस दस कमेन्ट मुझ पर किये जायेगे
जमाल साहब 'अजीत' के अंदाज में मुह में राम बगल में छुरी रखकर प्यारी बाते कहेगे.
.....और भास्कर जी क्या कहे आपको आप भी इरादा नहीं समझ पाते.
जनाब जमाल अब आप अपने इरादे जरा स्पष्ट शब्दों में बता दे.
हां या नहीं में जवाब दे (केवल हा या नहीं )
१. सम्पूर्ण भारत इसलाम का अनुयायी बन जाय
२. आपने एक बार टिप्पणी की थी कि ओबामा की दादी को सम्पूर्ण विश्व के लिए यही दुआ मांगनी चाहिए.(शायद तौसीफ जी की पोस्ट थी जिसमे ओबामा की दादी चाहती थी की ओबामा इसलाम कबूल करले). आपकी दिली इच्छा पूरे विश्व को इसलाममय देखने की है.
३. ईश्वर ही अल्लाह का पर्याय है.
एक बात मै आपको स्पष्ट कर दू और आपके पूरे गिरोह को कि 'अल्लोप्निषद' या 'भविष्यपुराण' अकबर के समय में रचे गए है. ये 'ओरिएन्तेद' रचनाये है जिनका प्रयोग आप जैसे विद्वान ही कर सकते है.
सुधी पाठक गण नीचे लिंक को पढ़कर जमाल जी के विचार देखे और अपर्णा जी के कमेंट्स फिर उसमे क्या बद्गुमानियत है बताये.

http://vedquran.blogspot.com/2010/03/blog-post.html
Monday, March 1, 2010 कौन कहता है कि ईश्‍वर अल्लाह एक हैं

आम तौर पर लोग यह समझते हैं कि गांधी जी ने बताया है ‘‘ ईश्‍वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान ‘‘ या फिर लोग कहते हैं कि साईं बाबा ने कहा है कि
सबका मालिक एक
और अल्लाह मालिक
लेकिन हकीक़त कुछ और है...हकीकत क्या है? बताओगे ?
वैदिक साहित्य तो इसका उद्घोश तब से कर रहे हैं जब मुसलमान भारत में आये भी नहीं थे ।

अल्लोपनिषद इसी महान सत्य का उद्घोश है ।भारत की हिन्दू मुस्लिम समस्या के खात्मे के लिए भी यह अकेला उपनिषद काफ़ी है और भारत को विश्‍व गुरू बनाने के लिए भी ।
अल्लो ज्येष्‍ठं श्रेष्‍ठं परमं पूर्ण ब्रहमाणं अल्लाम् ।। 2 ।।
अल्लो रसूल महामद रकबरस्य अल्लो अल्लाम् ।। 3 ।।
अर्थात ’’ अल्लाह सबसे बड़ा , सबसे बेहतर , सबसे ज़्यादा पूर्ण और सबसे ज़्यादा पवित्र है । मुहम्मद अल्लाह के श्रेष्‍ठतर रसूल हैं । अल्लाह आदि अन्त और सारे संसार का पालनहार है । (अल्लोपनिषद 2,3)
इस पर अपर्णा जी की टिप्पणी  है......
'आप जिस उपनिषद की बात कर रहे है , कृपया उसके रचयिता का नम भी बता दीजिये ।
और रही बात ईशवर और अल्लाह के अलग होने की , तो हो सकता है आप ने दोनो को साक्षात अलग अलग देखा हो , और यह आपका परम सौभाग्य रहा होगा ।
हो सकता है । आपका प्रयास सफल हो हम तो यही दुआ करते है । आप अपने जीवन में अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने में सफल हो जायें क्योकिं हमे तो इसकी तनिक भी जरूरत नही। हम सूरज को आइना नही दिखाते । क्या नवीन है और क्या पुरातन शायद यह जानने के लिये आपको अभी और अध्धययन की आवश्यकता है ।'

यहाँ मै अपने सुधी पाठकों को एक बात और बताना चाहूँगा कि मैने बृहस्पतिवार, ११ नवम्बर २०१० को जमाल साहब को एक पत्र लिखा था एक पत्र-पुष्प अनवर जमाल के नाम 

आज तक जमाल साहब तक शायद यह पत्र पहुँचा ही नही या वह अभी जवाब लिख ही रहे है ? जो भी हो अभी तक हमारा इंतजार जारी है

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

ऋषि कलाम: मेरे हीरो

'कलाम' शब्द की ऊर्जता से  मै अपनी चेतना के प्रारंभिक दिनों से ऊर्जित होता आया हूँ. यह शब्द मुझे गीता के श्लोक  और कुरआन की आयतों की तरह पवित्र और आह्लादकारी लगता है. मै कलाम साहब  लिए 'ऋषि' शब्द का प्रयोग करता हूँ. मुझे मार्गदर्शन देते हुए मेरे हीरो अव्यक्त रूप में हमेशा मेरे पास रहते है. मै इन पर ज्यादा कुछ लिख नहीं पाऊंगा. लेखन से परे का शब्द है 'कलाम'. मै इस समय गुड खाने वाले गूंगे के सरीखा हूँ जो मिठास बता नहीं पायेगा.  लेखनी अपने आप डोली है जिसे नीचे पिरो दिया है.

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आप मिसाइल मैन है या
एक मिसाल ,
जो हम जैसो के लिए बन गए है।
लेकिन,
आपकी सटीक परिभाषा दूंगा
एक मशाल के रूप में ।
आपने ता-उम्र जलकर
रोशनी दी है
सौ करोड़ से अधिक आत्माओं के लिए
आप बनगए है
अक्षय ऊर्जा स्रोत।
आपकी रहस्यमयी मुसकान
मुझे चुनौती देती है
और प्रेरित करती है
'दिया' बन जाने को
हताशा के अँधेरे में ,
और
भय की ठिठुरन में
'अग्नि' बन जाने को।
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बुधवार, 1 दिसंबर 2010

किन्तु मुझको है भरोसा, आओगी तुम मुस्कराकर.











बीता रात का तीसरा पहर
तुम नहीं आये
आधा हुआ चंदा पिघलकर
तुम नहीं आये

मै अकेला हूँ यहाँ पर
यादो की चादर ओढ़कर
रात भर पीता रहा
ओस में चांदनी घोलकर

फूल खिले है ताजे या तुम
अपने होठ भिगोये हो
हवा हुयी है गीली सी क्यों
शायद तुम भी रोये हो

अब सही जाती नहीं प्रिय
एक पल की भी जुदाई
देखकर बैठा अकेला
मुझ पे हसती है जुन्हाई

बुलबुलें भी उड़ गयी है
रात सारी गीत गाकर
किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी





















बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी,
बंद हुए सब मयखाने पीने की आस रही बाकी.

सैय्यादो की बस्ती में पंछी किससे फ़रियाद करे,
फरमान मौत का सुना दिया इलज़ाम लगाना है बाकी.

कालिख भरी कोठरी से बेदाग़ गुज़रना मुश्किल है,
अब तक कोरे दामन पर तोहमत का लगना है बाकी.

दावा है उनका पहुचेगे इक दिन चाँद सितारों तक,
लेकिन पहले वह तय करलो जो दिलो में दूरी है बाकी.

पूरब में उड़ाती हुयी घटाओ  इक दिन मेरे घर आना,
बीत गए सावन कितने पर मेरा आँगन है बाकी.

बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी,
बंद हुए सब मयखाने पीने की आस रही बाकी.