गुरुवार, 25 नवंबर 2010

'काफ़िर है वो जो कायल नहीं इसलाम के'

एक प्यारी सी  बात
'काफ़िर है वो जो कायल नहीं इसलाम के'

दूसरी  प्यारी बात
'लाम* के मानिंद  है गेसू** मेरे घनश्याम के,
 काफ़िर है वो जो कायल नही इसलाम के'

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* उर्दू में लाम  ل   के आकार का होता है कृष्ण के बाल** भी इसी तरह मुड़े हुए थे.

27 टिप्‍पणियां:

अमित शर्मा ने कहा…

"हैं वो काफिर जो बन्दे नहीं इस्लाम के"

'लाम' के मानिंद हैं काकुल मेरे घनश्याम के
हैं वो काफिर जो बन्दे नहीं इस 'लाम' के
(मेरे घनश्याम के केश 'लाम' की तरह घुंघराले हैं. जो इन घुंघराले बालों वाले के दास नहीं वे काफिर हैं। )

आनंद आ गया जी इस समस्या पूर्ति मे.................शायद सारी समस्याओं का हल भी ऐसे ही निकल आये तो जिंदगानी थोड़ी मस्तियानी से कट जाये

बेनामी ने कहा…

ये प्यारी नहीं आरी जैसी बाते है ज़नाब.आप बार बार इस्लाम से छेड़खानी कर रहे है. बर्र के छत्ते में उंगली डाल रहे है.
इस्लाम जिंदाबाद

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

रघुपति राघव राजाराम पतित पवन सीताराम
ईश्वर अल्ला तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान्
शायर चकबस्त और फिराक साहब ने काफ़िर शब्द का एक सामान्य एक्स्प्लैनैशन किया था. जो सौहार्द्र का प्रतीक बन गया. जैसा कि मै बार-बार कह रहा हूँ कि......
सत्यम एकः अर्थात सत्य तो एक है. इसी एक सत्य को राम कहो रहीम कहो क्राइष्ट कहो, कोई फ़र्क नहीं पड़ता . फर्क तब पड़ता है जब मात्र राम या रहीम को ही हम सत्य मानने लगते है. इसी को मूढ़ मति कहते है. इन्ही मूढ़ मतियो ने दुनिया को नरक बना रखा है.
बेनामी आप भी इन्ही मूढ़ मतियो में एक है. आपकी जड़ता पर क्रोध नहीं तरस आता है. भगवान आपको सन्मति दे.

chandra ने कहा…

कितनी प्यारी व्याख्या है
मै तो काफ़िर नहीं हूँ. जो भी व्यक्ति इंसान से प्रेम करता है काफ़िर नहीं हो सकता उसको काफ़िर कहने और समझने वाला खुद काफ़िर है. इंसानियत जिंदाबाद

chandra ने कहा…

ye to kahana hi bhool gaya tha____

रघुपति राघव राजाराम पतित पवन सीताराम
ईश्वर अल्ला तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान्

Dr Kiran ने कहा…

बात बहुत छोटी सी थी दुनिया से अदावत कर बैठे
अल्लाह की इबादत छूट गयी काफ़िर से मुहब्बत कर बैठे

सुज्ञ ने कहा…

लाम प्रतिक है,आस्था के भक्ति रस का,
करूणावान मानवता काफ़िर कदापि नहिं।

Tausif Hindustani ने कहा…

उर्दू में ل ऐसे होता है क्या ये S जैसा है ,

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

तौसीफ जी प्रूफ-सुधार के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Bhai Wah!!!!!!!!!!!!!

Tausif Hindustani ने कहा…

मेरा केवल ये कहना है जब हम कोई भी वस्तु खरीदते है उसकी खोजबीन मोल तोल करते हैं .अपने साथियों से राय करते हैं , वस्तु जितनी बड़ी हो हमारा दायरा उतना ही बढ़ जाता है , हमारा उद्देश्य केवल अच्छे वस्तु की प्राप्ति होती है ,

हमारे जीवन में , विशेषकर हम हिन्दुस्तानी अपने से धर्म को कभी जुदा नहीं करते चाहे किसी भी देश में हो , हमारे लिए धर्म से बड़ा शायद ही कुछ मायने रखता हो ( मुल्क की बात अलग है क्योंकि जब मुल्क ही नहीं रहेगा तो धर्म का पालन कैसे कर पाएंगे )
हमें एक सच्चे धर्म की तलाश में हमेशा रहना चाहिए और उसपर विचार करते रहना चाहिए

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बक़ौल मुहम्मद अल्लामा इक़बाल-
मैं जो सर-ब-सज्दा कभी हुआ तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम-आशना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में...

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

@ तौसीफ जी
सच हमेशा सापेक्ष होता है. समय की तरह वैभिन्नता को समेटे. और रही बात धर्म की तो
परहित सरिस धरम नहि भाई पर पीड़ा सम नहि अधमाई.
तलाश उसकी होती है जो खो गया हो. जो मिला ही नहीं उसकी क्या तलाश. कोई अँधा अगर किसी वस्तु की तलाश करे तो व्यर्थ, पहले उसे पात्र बनना पड़ेगा. उसी तरह ईश्वर को पाने के लिए पहले ज्ञान रूपी नेत्र आवश्यक है.
एक बात और जिस पर हम विश्वास करते है वही हमारे लिए पूर्ण सत्य है किन्तु दूसरे के लिए वाह सत्य हो जरूरी नहीं.
फसाद की जड़ में यही बात होती है कि जिसे हम माने उसे दूसरे भी माने.

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

@ फिरदौस खान साहिबा
मेरे कूचे में आने का शुक्रिया
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर
या वो जगह बता दे जहा पर खुदा ना हो.......

बेनामी ने कहा…

mr.tauseef, aankho par chadha KALA CHASHMA to hataao to sachcha dharm dikhega nahi to kala andhera hi tumhe dharmik lagega.

past life therapist ने कहा…

दिल बहुत खुश हो गया भाई पवन जी, मेरे कन्हा की इतनी अच्छी सी मूरत आपने लगाई है. धर्म तो मैं नही जानता मगर कन्हा के बाल तो वाकई लाम जैसे हैं

past life therapist ने कहा…

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर
या वो जगह बता दे जहा पर खुदा ना हो.......
गालिब की इन अशररो पर कुर्बान

Tausif Hindustani ने कहा…

तलाश उसकी होती है जो खो गया हो. जो मिला ही नहीं उसकी क्या तलाश.
ये कैसी लोजिक है ,
आपके इस थ्योरी पर तो बहुत सारी बातें उलटी पड़ेंगी ( मेरा उद्देश्य बहस करना नहीं है वरना आपके इस लेख का उद्देश्य ही धारा
से हट जायेगा )
बेनामी जी ज़रा नाम लिखते तो कुछ टिप्पणी करता ,

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

प्रिय तौसीफ जी
मै शायद 'मोर एनालिटिकल' हो गया था. मेरा तात्पर्य अर्जित करना और तलाश (serch) में फर्क से था.
धर्म और ईश्वर दोनों इंसान में मौजूद है. बस जरूरत है जानने समझने की.
--

किलर झपाटा ने कहा…

बहुत ही बढ़िया बात कही

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

मुहब्बत है मुझे मोहन के नाम से
तालीम ये मिली है मुझे इस्लाम से

Shah Nawaz ने कहा…

शेर वाकई अच्छा बन पड़ा है... वैसे यह शेर असल में कुछ और था..

अपर्णा "पलाश" ने कहा…
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अपर्णा "पलाश" ने कहा…

मजहब से हमको बस ये ही सबक मिला
मोहब्बत कर उससे भी जिसे तुमसे हो गिला

खुदा के दर पे आके , पी ले चाहे जितनी
नशा तो तुझको मोहब्बत का ही होगा

radhey radhey ने कहा…

जयति श्रीराधिके सकलसुखसाधिके तरुनिमनि नित्य नवतन किसोरी ।कृष्णतनु लीन मन रुपकी चातकी कृष्णमुख हिमकिरिनकी चकोरी ॥१॥
कृष्णदृग भृंग बिस्त्रामहित पद्मिनी कृष्णदृग मृगज बंधन सुडोरी ।कृष्ण-अनुराग मकरंदकी मधुकरी कृष्ण-गुन-गान रास-सिंधु बोरी ॥२॥

vivek pandey ने कहा…

बहाने से खून मिलता है क्याकिसीको नफरत की आग जलाने से मिलता है क्या किसी को ,

लहू तो सब एक है तो बहाने से मिलता है क्या किसी को

vivek pandey ने कहा…

बहाने से खून मिलता है क्या किसी को नफरत की आग जलाने से मिलता है क्या किसी को ,

लहू तो सब एक है तो बहाने से मिलता है क्या किसी को